पाँच दिन की भागदौड के बाद सप्ताहांत का इंतज़ार बडी बेकरारी से रहता है. शुक्रवार की शाम से ही लगता है कि अब मुट्ठी में दो दिन का खज़ाना है, जैसे चाहे खर्च करो.
इसबार शनिवार रविवार अच्छा बीता. शनिवार को मेरे बौस की दोनों बेटियों का दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में अरंगेत्रम था. गुडगाँव से दिल्ली जाना, दो बार तो सोचना पडता है पर जब शनिवार की सुबह उनका फोन आ गया तो फिर जाना तय ही कर लिया. मेरी आठ साल की बेटी पाखी को नृत्य और संगीत का बेहद शौक है. बेटा ,हर्षिल, खेल में ज्यादा मन लगाता है. इसलिये जाने वालों में मैं, मेरे पति, संतोष, और पाखी थे.
दोनों लडकियों का भरत नाटयम नृत्य इतना सुंदर था कि तीन घंटे कैसे बीते पता ही नहीं चला. घर आकर पाखी ने एलान कर दिया कि उसे भी नृत्य सीखना है. इसके पहले वह पेंटिंग सीख रही थी और घर भर में उसके कलाकारिता के नमूने बिखरे पडे हैं, कुछ तो दीवारों पर भी. किसी का जन्मदिन हो, कोई त्यौहार हो, कोई उसका प्रिय आया हो,एक मिनट में कार्ड हाज़िर रहता है. कई बार ऐसे ही सुबह सुबह, जब स्कूल की छुट्टी हो, मुझे और संतोष को एक कार्ड मिल जाता है....
"मेरे प्यारे माँ पापा को,आपकी प्यारी बेटी की ओर से जो आपको बहुत प्यार करती है"
ऐसे कई कार्ड हमारे व्यक्तिगत फाईल्स मे संभाल कर रखे हुये हैं. मुझे पता है कि जब वह बडी हो जायेगी तब हमारे लिये ये ही सबसे बडा खज़ाना होंगे.
मुझे याद है मेरे पिता की , बचपन में लिखी हुई एक चिट्ठी. तब शायद वे दस ग्यारह साल के रहे होंगे. कहीं आसाम में कोई जगह टीटागढ, शायद. पत्र में तो उन्होंने टीटाबार लिख रखा था. कोई पेपर मिल था शायद वहाँ. कुछ दिनों के लिये वहाँ थे और वहाँ उनका बिलकुल मन नहीं लग रहा था. उस पत्र में वापस बुलाने की बात लिखी थी. अस्पष्ट सी भाषा और हिज्जे की गलतियाँ. तब हम भी बच्चे थे और उसे पढ कर खूब आनंद लिया था, खूब हँसे भी थे. ये बडा मज़ेदार भी लगा था सोच कर कि पापा भी कभी हमारे जैसे बच्चे रहे थे. फिर कुछ दिनों बाद माँ ने एक तस्वीर दिखाई थी. ग्रुप फोटो था, जिसमें मेरे दादा जी, उनके भाई और कुछ बच्चे. सब पुरुष ही थे उस तस्वीर में. मेरी दादी की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी जब पापा चार पाँच साल के रहे होंगे.
तस्वीर में बडे तो कोट पैट और ब्रिटिश हैट में है. किनारे में एक बेहद मासूम और सुंदर बच्चा ( आज भी बहत्तर साल की उम्र में खासे हैड्सम हैं) कमीज़, धोती और चमचमाते जूतों में खडा. माँ ने हँस कर बताया था कि ये पापा हैं. शायद, जूते नये दिलाये गये थे. ऐसा पापा बताते हैं.
तब उस तस्वीर को देख कर मेरा बालमन अचानक भर आया था. उस बिन माँ के बच्चे और उस गलत सलत हिज्जे वाला पत्र कहीं एक साथ जुड गये थे. पिता पर बहुत प्यार उमडा था. वैसे भी मैं उनके बहुत करीब हूँ. आज भी ऐसे ही कभी कभी अपने बच्चों को दुलार करते पापा की वो बचपन की तस्वीर और उनका 'टीटाबार' वाला पत्र याद आ जाता है.
खैर, शनिवार अच्छा बीता तो रविवार क्यों पीछे रहता. इस बार हम निकल गये सुल्तानपुर बर्ड सैंक्चुअरी की ओर. सर्दी अभी उतनी तो नहीं पड रही पर फिर भी पक्षी कई दिखे. अगले महीने तक शायद और भी आ जायें. जाते वक्त और लौटते वक्त बगीचों से ताज़ा तोडे गये मीठे अमरूद आजभी घर को सुगंधित किये हुये हैं. फार्महाउसेस के दीवारों पर लाल, बैंगनी, सफेद बोगन विलिया के झाड बेहद खुशनुमा लग रहे थे. खेतों में सरसों का पीला गलीचा, खुशगवार मौसम, बच्चों की चहचाहट, नीचे नर्म हरी घास और उपर नीला स्वच्छ आसमान. और क्या चाहिये.
ओमर खय्याम की मशहूर रुबाई याद आ गई. उसका हिन्दी तर्जुमा कहाँ से खोजूँ .शायद बच्चन जी ने किया है. अब खोजूँगी लेकिन एक अदना सा प्रयास मैंने भी किया, पंक्तियाँ सही याद नहीं पर जो भाव याद हैं उनके दम पर ये पेश है.........
(ओमर खैय्याम के प्रसंशकों से क्षमायाचना सहित )
"गीतों की पुस्तक, शाखों के नीचे
मीठा सा पानी ,दो रोटी के टुकडे
पहलू में तुम हो तो वीराना क्या है
मिल जायें ये सब तो जन्नत यहाँ है"
(जिसे कहते हैं लिटरल अनुवाद ,वो नहीं है, बस भाव हैं...और उसदिन की मेरी मनस्थिति को दर्शाते)
लाल्टू जी ने कहा "धन्यवाद प्रत्यक्षा...
बस मायूसी ग़ायब है
2 months ago