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हम जब भी कहीं बाहर गये या फ़िर घर में ही कोई उत्सव हुआ , फ़ोटो खींचना उस अवसर का एक ज़रूरी हिस्सा हुआ करता था । हमारे पास एक कैमेरा तो था , बहुत अच्छा पर वही पुराने ज़माने वाला , मतलब कलर रॉल खरीदो फ़िर फ़ोटो साफ़ कराओ । कई बार तो फ़ोटो खीचने के बाद महीनो रील साफ़ होने के लिये पड़ा रहता । फ़िर जब फ़ोटो स्टूडियो में डेवलप होने को दिया जाता तो अचानक से बड़ी बेकरारी हो जाती देखने की कि कैसे फ़ोटो आते हैं । फ़ोटो आता , कुछ दिन बार बार देखा जाता , खासकर उन फ़ोटोज़ को जिसमें हमारी शक्लें ठीकठाक नज़र आती ।फ़िर उनको सँभाल कर रख दिया जाता और हम भूल जाते उनके बारे में । बाद में कभी याद आने पर खोजा जाता और मर्फ़ी के शाश्वत नियम को एक बार फ़िर सही साबित करते हुये बाकी सब फ़ोटो मिल जाते उन खास फ़ोटोज़ के सिवा । धीरे धीरे हमारे पास बक्से भर फ़ोटोज़ जमा हो गये , सगाई , शादी से लेकर बच्चों के पैदा होने के बाद से लेकर हर छोटे बड़े पल का कोडक साक्षी । उन्हें सँभालना क्रमश: मुश्किल हुआ जा रहा था कि इसी बीच माँ ने एक पुलिंदा फ़ोटोज़ हमारे बचपन की हमें भेज दिया । इस तरह हमारी मुसीबत का इजाफ़ा हुआ चला जा रहा था ।
इधर हमने नोटिस किया कि अब हर किसी के पास डिजिटल कैमरा है । आसपास , बँधु पड़ोसी , भाई बहन , नाते रिश्तेदार , हर कोई डिजी कैमरा से लैस घूम रहा है । इन्स्टैंट फ़ोटो और हम अब भी उसी पुराने ज़माने में रिप वैन विंकल हुये घूम रहे हैं ।हमारे ऊपर सीवीयर
इन्फ़ीरीयोरिटी कॉम्प्ले़क्स का भूत सवार हो गया । हमने तय कर लिया है कि अब हम चोपड़ा , खोसला , मिश्राजी , राय जी , वगैरह वगैरह से पीछे क्यों रहें । हम भी खरीदेंगे एक डिजिटल कैमरा ।
तो यहीं से असली कहानी शुरु होती है जिसके लिये इतनी भूमिक बाँधी गई । तो भाईयों आपकी मदद की ज़रूरत है । बतायें कि एक बढिया (ऐडिक्वेट ?)डिजिटल कैमरा खरीदने के लिये क्या ध्यान में रखना ज़रूरी है । इन्टरनेट पर कैमरा पढ पढ कर टोटल कन्फ़्यूज़न का आलम है । कौन सा ब्रांड लिया जाय ? क्या फ़ीचर्स ध्यान में रखना चाहिये ? हमारी ज़रूरत सिर्फ़ घरेलू फ़ोटोज़ खींचनी है , हाँ ओप्टिकल ज़ूम शायद लेनी चाहिये । प्राईस रेंज , दस से पंद्रह (?)या फ़िर बीस । ये भी पता नहीं । अब समझ गये न कितने कन्फ़्यूज़्ड हैं हम ।
फुरसतिया जी ने जहाँ अपना लेख समाप्त किया था , मैं वहीं से आगे बढती हूँ । अनूप जी जितने अच्छे कवि हैं उससे बहुत ज्यादा अच्छे इंसान हैं । उनकी सहज सरल आत्मीयता कहीं गहरे छूती है । मेरा पहला परिचय उनसे ईकविता के माध्यम से हुआ था । उनकी ये कविता पढी और विस्मित रह गयी थी । ऐसा लगा जैसे कविता नहीं दो प्रेमियों की बातचीत किसी ने चुपके से सुना दी हो ।
अब समझ आया है मुझ को ,
हर फ़ूल में क्यों आ रही थी तेरी खुशबू ,
तितलिओं नें काम ये अच्छा किया है ।
और वो नदी जो
तुम्हारे गाँव से
मेरे घर तक आती है
सुना है
रात उस में खलबली थी
मछलियां आपस में कुछ बतिया रहीं थी
कुछ बात कह कर आप ही शरमा रहीं थी
क्या हुआ गर बात तुम जो कह न पाई
शब्द ही तो प्रेम की भाषा नहीं है ?
तो कविता ऐसे भी की जा सकती है ये समझ में आया । ई कविता में कई जुगलबन्दियाँ चली , कविताओं का आदान प्रदान हुआ ।पत्राचार चलता रहा । फिर 2004 में उनसे मुलाकात हुई । लगा जैसे अपने ही किसी बेहद आत्मीय से मिल रहे हों । फिर इस साल रजनी जी से मुलाकात हुई । ईश्वर ने बडी सुघडता से इनकी जोडी बनाई है । दोनों एक दूसरे के पूरक । सहज आत्मीयता , सौम्य व्यहवहार जैसे छलक पडता था । अनूप जी और रजनी जी की कविताओं के फैन तो थे ही , मिलने के बाद उन दोनों की शख्सियत ने भी गहरी छाप छोडी । ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं ।
अनूप जी की ही वजह से हिमानी और विष्णु से भी परिचय हुआ । हिमानी का भी ब्लॉग शुरु होने वाला है । आप सब खुद उनके बिंदास शैली का और सुंदर कविताओं का आनंद उठायेंगे । विष्णु की हाज़िरजवाबी और हिमानी की मस्ती दोनों देखने वाली चीज़ है ।
16 सितंबर को अनूप जी लखनऊ से वापस आये । सुबह फोन पर बात हुई । हमारे परिसर में क्लब है और उसमें खासा बढिया औडिटोरियम । तो इसी औडी में हिन्दी पखवाडा के अवसर पर एक कवि सम्मेलन होने वाला था उस शाम जिसमें बशीर बद्र , उदयप्रतापसिंह , शैलेश लोढा , आशाकरण अटल , अरुण जेमिनी आने वाले थे । बशीर बद्र और उदय प्रताप सिंह का नाम सुनकर( हम कोई क्रेडिट ले नहीं सकते ;-( ) अनूप जी ने अपने बाकी कार्यक्रम रद्द किये और तय हुआ कि शाम हम मिलते हैं ।
शाम हुई । हॉल में अनूप जी , हिमानी ,संतोष और मैं काव्य रस का आसास्वादन कर रहे थे । इसी दौरान अरुण जेमिनी, जो मंच संचालन कर रहे थे , ने अनाउंस कर दिया कि अगर अनूप भार्गव आ गये हों तो मँच पर आ जायें । ( अब कहिये सेलीब्रिटी कौन है :-) ) पुष्प गुच्छों को ग्रहण करने के बाद अनूप जी मँच पर । हम तो आम जनता थे सो पिछली कतार में बैठे रहे । अंत में अनूप जी का भी काव्यपाठ हुआ । उन्होंने अपनी कविता सुनाई ।
” कल रात एक अनहोनी बात हो गई मैं तो जागता रहा खुद रात सो गई ।”
रात्रि भोजन , जो वहीं पर आयोजित था , के बाद हम बशीर बद्र साहब , जो वहीं परिसर में स्थित गेस्ट हाउस में ठहरे थे , से मिलने हम उनके कमरे की ओर चल पडे ( ये भी अनूप जी का ही कमाल था वरना हमें कौन पूछता )। रत्रि भोज के पहले मैंने और हिमानी ने उनकी किताब पर उनके औटोग्राफ लिये । किताब अनूप जी ही लाये थे ,” धूप जनवरी की ,फूल दिसम्बर के “ । मुझे डबल फायदा हुआ , बढिया किताब मिली और सोने पर सुहागा बशीर बद्र का औटोग्राफ भी । खैर , हम सब बद्र साहब से गुफ्तगू करते रहे , उनकी गज़लें , उनके शेर , हिन्दी में गज़ल , दुष्यंत कुमार की गज़लें ,उनकी पारिवारिक बातें और भी कई बातें । अनूप जी ने भी अपनी ये कविता सुनाई
रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करतेउन्हें झूठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करतेउडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरहबहती हुई नदी की तरहतलाश करनें दो इन्हें सीमाएंखुद ही ढूँढ लेंगे अपनी उपमाएंहोनें दो वही जो क्षण कहेसीमा वही हो जो मन कहे
हिमानी ने अपना एक शेर..
तू समझ न खुद को खुदा मेरा
ये भरम तेरा है मेरा नही
ये शफ़ा है मेरे इश्क की
जो तूने ऐसा समझ लिया
और मुझ खाकसार को भी मौका मिल गया । हाँ जी मैं ये मौका क्यों चूकती सो मैंने भी अपनी ये कविता सुना दी ।(अब झेलते रहें सब ;-) )
हिमानी का कैमरा ऐन वक्त पर जवाब दे गया और बशीर बद्र के साथ तस्वीर खिंचवाने का अरमान ,अरमान ही रह गया ।( अब इस वाकये का तस्वीरी प्रमाण नहीं है तो क्या , भाई लोग बिना तस्वीर के मानने से इंकार जो कर देते हैं , ऐसे शक्की मिजाज़ प्राणियों के लिये साक्षी स्वरूप अनूप और हिमानी हैं )
अगले दिन एक काव्य गोष्ठी का आयोजन अनूप जी ने हिमानी और विष्णु के साथ ‘ऐम्बियांस’ के ‘लगून क्लब ‘ में किया । यहाँ एकत्रित होने वालों में कुँअर बेचैन ,जगदीश व्योम, कमलेश भट्ट कमल , शास्त्री नित्य गोपाल कटारे , मोना कौशिक ( बल्गारिया से) रेणु आहूजा उमा माल्वीय , श्री गौड थे ।
काव्य चर्चा हुई , इंटरनेट पर हिन्दी का प्रचार , (अनूप जी ने बारहा कैसे इस्तेमाल करें का लाईव डेमो दिया ) हाइकू पर विशेष चर्चा ( चूंकि व्योमजी और भट्ट जी थे तो होना ही था )। हमसब ने एक दूसरे की तारीफ की ;-) कविता पाठ हुई ।( कटारे जी की संस्कृत में काव्यपाठ उल्लेखनीय रही ) और इन सब के बीच हिमानी के कुशल प्रबंधन में चाय , कॉफी और स्नैक्स का दौर चलता रहा । दोपहर के भोजन के बाद तस्वीरें ली गईं । जी हाँ फोटोज़् हैं , अभी दिखाते हैं । कुँअर बेचैन ने औटोग्राफ के साथ फ्री हैंड स्केचिंग की जो कि बेहद खूबसूरत थीं ।
आगे की कहानी फिर आगे , तब तक बशीर बद्र की किताब “धूप जनवरी की , फूल दिसंबर के “ से कुछ पसंदीदा शेर
“अजीब शख्स है , नाराज़ होके हँसता है
मैं चाहता हूँ खफा हो तो वो खफा ही लगे”
“ वो जाफरानी पुलोवर उसी का हिस्सा है
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे “
“ वो हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज़ का शहर है ज़रा फासले से मिला करो”

राकेशजी ने कहा चाय पुराण होनी चाहिये , तो लीजिये हाज़िर है चाय की प्याली । ये भी ई-कविता में चली थी कई दिन । आप भी चाय का लुत्फ उठाईये बाँग घड़ी की,ट्रैफ़िक वेदर बच्चों का स्कूलस्नो, बारिश धूप कार का और वेन का पूलरिस्टवाच,पीडीऎ प्लानर सेलफोने और टाईप्रेजेन्टेशन ओरियेन्टेशन मीटिंग सर पर आईमिनी वेन ट्रक ट्रेक्टर ट्रेलर ट्रेफ़िक जाम हुआ साइन्टरस्टेट टौल रोड और बेक अप अच्छा खासाहैश ब्राऊन काफ़ी बिस्किट और डोनट बेगल हायवाशिंगटन में मिल न पाती अब सुबह की चाय
(राकेश खँडेलवाल )
हर सुबहगर मयस्सर होएक चाय की प्यालीतुम्हारा हँसता हुआ चेहराऔरएक ओस में भीगीगुलाब की खिलती हुई कली
तोसुबह के इन हसीं लम्हों मेंमेरा पूरा दिनमुक्कमल हो जायेबस यूँ ही
(प्रत्यक्षा)
लेकिन है तकलीफ़ यही, हम किये कामना जाते हैंपर उस सुखद भोर के पल से हम वंचित रह जाते हैंयही त्रासदी, भाग-दौड़ है और दूरियाँ हायइसीलिये तो साथ न पी पाते सुबह की चाय
(राकेश)
बिना दूध की, दूध की, फीकी, चीनीवाली
जैसे भी हो, दीजिये भरी चाय की प्याली
भरी चाय की प्याली, बिस्कुट भी हों ट्रे में
जैसे लोचन मिलें नयनसुख को दो फ्री में
चुस्की ले-ले पियो अगर हो आधी खाली
जैसे साली कहलाये आधी घर वाली
(घनश्याम)
काली हरी और मिलती है जड़ी बूटियों वालीपीच ,संतरा चैरी बैरी कई फ़्लवर वालीकभी ट्वाईनिंग, अर्ल ग्रे तो कभी मिली जापानीलिपटन,टिटली अमदाबादी मिलती हिन्दुस्तानीपढ़ते अखबारों को लेकिन फ़ुरसत वाली हायवाशिंगटन में मिल न पाती अब सुबह की चाय.(राकेश खंडेलवाल)
जिह्वा खोज्रे वही बारबारथोडा कसा चायजितने भी फ्लेवर्स गिना दिये हैं हायमुझे तो भाये वही फ्लावरी आरेंज चायवाशिंगटन की बात को छोडोजब आओगे हिन्दुस्तानतब पिलाएंगे तुम्हे हमअपनी इंडिया वाली चाय
(प्रत्यक्षा)
भूल गया था सिलीगुड़ी की और असामी चायअदरक और इलायची वाली हिन्दुस्तानी हाययेलो लेबल या रेड लेबल या पंसारी वालीमिलती है या जो ढाबे पर साठ मील की प्यालीमिला आपका आज निमंत्रण, रह रह जी ललचायवाशिंगटन से दिल्ली जल्दी आऊं पीने चाय (राकेश)
साठ मील की प्याली तो (;-))मुझे न बनानी आयेगर आओगे आप तो मिलेगीवही पत्ती वाली चाय
(प्रत्यक्षा)
इक कप में इक चम्मच पत्ती डालें, होती बीस मील कीतीन चम्मचें डालें पत्ती, सहज बनेगी साठ मील कीसफ़र हजारों मीलों का मैं तय करके यदि दिल्ली पहुँचूंतब चाहूँगा मिले चाय कम से कम छह सौ साठ मील की.(राकेश )
सुनो !तुम जानती होमुझे चीनी की मनाही हैफ़िरआज चाय में कितनीचम्मच मिलाई है ?मुस्कुराते हुएजवाब आया,जानती हूँ प्राणनाथलेकिन आज हमारीशादी की सालगिरह है,घर में चीनी नहीं थीचाय में बसअपनी प्यार भरीउँगली घुमाई है ।
(अनूप :-)
सीमित रहे चाय तक केवल हम अपना क्या हाल बतायेंउसने मधुपूरित नजरों सेएक बार देखा था मुझकोबस तब से हर चीज मुझेन जाने क्यों मीठी लगती है
(राकेश)
अब तो हमने शुरु कर दियाख्याली पुलाव पकानागर हों आप तैयार हमारीकविताएँ सुनने कोछह सौ साठ मील तो छोडोछह सौ टू दी पावर एक्स की चायहम सीख लें बनाना
(प्रत्यक्षा)
है यकीन चाय के संग अब हमें पकोड़े मिल जायेंगेऔर आप निश्चिन्त रहें हम धैर्य साथ लेकर आयेंगेहम न थकेंगे कविता सुनते, शायद आप सुनाते थक लेंचाय समोसे मिलें स्वयं ही श्रोता वहाँ चले आयेंगे(राकेश )
चाय पर हो गर यूँ लम्बी बात खत मेंतो घर पे आये मेहमान का क्या कहियेयूँ नशा छाया है गर चाय के नाम सेतो जो पीते है इसे उनकी खुमारी का क्या कहिये
(मनोशी )
कविताएँ सुनने का क्यों किया रेट बढायअभी तो भाई सुनने का रेट सिर्फ है चायवो भी तब जब आपकीभी सुन नी पडे हाय ;-)) (प्रत्यक्षा )
एक चाय के बदले सुनना एक गज़ल काफ़ी हैक्योंकि, सुना डायरी आपकी भरी हुई खासी हैइसीलिये आहिस्ता आहिस्ता बढ़ती है फ़रमाईशअगर सुनायें आप न कुछ भी, सिर्फ़ चाय काफ़ी है. (राकेश)
चलें, आपकी एक शर्तये भी मंजूरपिलायेंगे आपको सिर्फचाय की एक प्यालीक्योंकिहमारे पास तो है एक ही डायरीआपकी तो सुना , पूरी दीवाने गालिब !
(प्रत्यक्षा)
माफ़ी पहले ही मांग ली जाये तो अच्छा है) अब जो ई-कविता में हो रहा हैहोने दीजेलेकिन गालिब को हिचकियाँ आ रही होंगीउन्हें तो चैन से कब्र मेंसोने दीजे ......... (अनूप )
हाँ इसी बात पर एक वाकया याद आ गया , याद नहीं प्रत्यक्षा को भारत यात्रा के दौरान सुनाया था या नहीं । अभी पिछले वर्ष Philadelphia में एक Literary Conference
हुई थी , वहां सलमान अख्तर (जावेद अख्तर के छोटे भाइ और जाँ निसार अख्तर के सुपुत्र) से मिलना हुआ , ये किस्सा उन का सुनाया हुआ है । एक सज्जन जो उर्दु शायरी की थोडी बहुत
जानकारी रखते थे (कुछ Buzz Words भी सीख लिये थे) , सलमान जी के पास आये और कहनें लगे । जनाब आप तो इतनी बेहतरीन गज़ल लिखते हैं , रुबाई लिखते हैं , नज़्म भी
लिखते हैं , क्या बात है , हम तो आप के बहुत कदरदान हैं , ये बताइये कि आप का 'दीवान-ए-गालिब' कब छप रहा है ? आशा है इस Context में प्रत्यक्षा की कविता और अच्छी लगेगी और हाँ जिस सरलता सुगमता से 'राकेश जी' लिखते हैं , उस हिसाब से तो उन के अब तक कई 'दीवान-ए-गालिब' छप
जानें चाहियें. :-)
और क्योंकि बार बार क्षमा न माँगनी पड़े, इसलिये अभी के लिये और आगे की संभावनाओं के लिये मैं अग्रिम निवेदन कर रहा हूँ.एक गज़ल की बात हुई थी आप डायरी तक जा पहुँचेइसी तरह तो लोग उंगलियाँ थाम, पकड़ लेते हैं पहुंचेदीवान-ए-गालिब तो बल्लीमाराँ से है लाल किले तकउसे ढूँढने आप यहाँ अमरीका तक कैसे आ पहुंचे हाँ वैसे जो पास डायरी, कितने मुक्तक? कितनी गज़लें?और बतायें ये भी, कितनी उगा रखीं गीतों की फसलें ?ताकि योजना बना सकें हम, कितना जगना कितना सोनाकितना सर को धुनना होगा, कितना रोलें कितना हंसलें
(राकेश )
maaf karen ..aaj kuchh font ki samasysa hai..isliye ye roman lipi
kahan le aayee aaj hamenye kambakht chai ki pyalishuru shuru me aas jagi thheeshrota ek yun milegakavitayen , muktak sun legaab to asaar madhim lagte hainsar dhun ne ki baat karte hainye haal aapka abhi hua haikavitaon ke baad kya hoga???
(pratyaksha)
फोंट्स विचारे हिन्दी के भी, कविता पढ् बेहोश हो गयेसहन न कर पाये वे जिसको, हम तैयार हुए सुनने कोइसीलिये तो एक चाय की प्याली और पकोड़े माँगेकुछ तो हमें चाहिये ऊर्जा, आखिर अपना सर धुनने को रचनाओं का असर क्लोरोफ़ार्म सरीखा अभी दिख रहाएनेस्थेशिया के प्रभाव को दूर करेगी केवल चायएक चाय पर एक गज़ल की, पूर्व सूचना इसीलिये तोअगर शर्त मंज़ूर, आयेंगे, वरना ओके टाटा बाय और क्षमा मैं पहले ही माँग चुका हूं.(राकेश )
हम तो यूँ ही डूबे हुये हैं :-oहमें और न डुबाईयेपहले तो ये फॉंट धोखा दे गईअब आपकी बारी भी आ गईले देकर मिला था एक श्रोतावो भी पतली गली से भाग निकला
अब आप व्यर्थ न घबडाईयेहमने अपनी कविता ,मुक्तक, छन्दको कर दिया है तलाबन्दअब आप बेधडक चले आईयेआकर अपने गीत सुनाते जाईयेचाय भी मिलेगी साठ मील कीसाथ में नमकीन पकौडे और मिठाई
(प्रत्यक्षा :-)))
आप डूबेंगे रस में मेरे हमसुखनतब ही कविता का आनंद आ पायेगाएक डुबकी लगा करके मकरन्द मेंछ्म्द थोड़ा अधिक मन को भा जायेगाफ़ोंट्स तो पारखी मित्र ! कविता के हैंजानते, किसे लेंगे आगोश मेंकौन से काव्य के साथ मुस्कायेंगेसाथ में किसके आ पायेंगे जोश में तालों में बंद करो मत तुम कविता को और निखरने दोश्रोता खुद ही मिल जायेंगे , मुक्तक को और संवरने दोरसगुल्ले अन्नपूर्णा के, घंटेवाला के सेम-बीजके साथ चाय की जमनाजी, अपने आँगन में बहने दो (राकेश)
और अंत में अभिनव शुक्ला जी ने कहीं सुनी/पढी हुई एक कविता भेजी थी
चाय का कमाल
चाय चुस्ती को जगाती है सदानींद , सुस्ती को भगाती है सदालक्षमण जी रात भर जागा कियेचाय पीते थे बिना नागा कियेएक दिन थी चाय मिल पायी नहीं युद्धरत थे याद ही आयी नहींकई रातों के जागे थे ,सो गयेलोग ये समझे कि मूर्छित हो गयेवैद्यजी ने जो मँगाई थी दवापवनसुत लाये जिसे होकर हवाचाय थी संजीवनी बूटी नहींसत्य मानो ये बात झूठी नहींद्रोणगिरि की स्थिति है अब जहाँचाय ही उत्पन्न होती है वहाँ
अनाम