9/12/2008

मछली की आँख


कुछ उमगता है
फिर बैठता है मन के तल पर,
उस हरियाली को जो फैलता है अंदर ,
उसके नाम अपनी नमी ,
उसके नाम अपनी फसल और उसके नाम
अपनी ज़मीन ।
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किसी रात उन सीढियों पर
पाँव रखकर
उतर जाती हूँ
जंगल में
पेट में
खिल जाती है बीचोबीच
कोई मणि

.............................................................



बारिश का पानी
पेड़ की शाख पर छोड़ता है , क्या ?
जाने क्या क्या
उँगली से पसार दिया था क्यों
तुमने सिंदूर को ,
धो दिया न अपने आँसू ,
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छाती के तल पर पैठती है मछली ,
खोलती है अपनी मछली आँख
बिंध जाती है फिर
हर बार हर बार
टपकता है पानी
आँख से , मन से
कितना सारा
देखते नहीं ? कितना तो हरा है
भरा है
काई में फिर खिलता है
साफ पानी का एक अंजुर
मछली की आँख फिर
आहत क्यों ? देखती मेरी तरफ
...................................

(ऊपर के शब्द मेरे हैं , रविन्द्र व्यास की पेंटिंग है । )

रविन्द्र (हरा कोना ) कहते हैं.... (चित्र और शब्द के संयोजन के विषय में)
....हां, शब्द चित्र अपने में आजाद हैं, उनके साथ लगा चित्र अपने में आजाद होता है। दोनों की सत्ता अलग अलग है। वे भले ही एक साथ लगने पर दोनों के पूरक लगें, लेकिन दोनों अपने अपने माध्यमों में एकदम अलग। हम शायद उन्हें न दिखने वाले लेकिन महसूस होने वाले महीन धागे से जोड़ते भर हैं।

9/10/2008

द रेन सॉन्ग

उसकी आवाज़ फुसफुसाती आ रही थी । मैंने पूछा था ,
क्या ? फिर से बताना
रेन , उसने दोहराया , रेन , फिर बच्चों को समझाते हैं जैसे आवाज़ में कहा , आर ए आई एन ..रेन
बारिश ?
उसने इंसिस्ट किया , नहीं रेन । पर इस बार आवाज़ में एक छिपी हँसी थी ।

अँधेरा था और बाहर बारिश गिर रही थी । और ये लड़की मुझे पागल कर रही थी । दुनिया के किस छोर में बैठी मुझे पागल कर रही थी ।

तुम हो ? उसकी आवाज़ तैरती आ रही थी नीले अँधेरे में । मुझे लगा छू लूँ उसकी आवाज़ को , हाथों से सहला लूँ फिर गप्प से मुँह में भर लूँ । उसकी आवाज़ फिर अंदर गूँजे और हरेक टिम्बर में उसको पहचान लूँ ।
मैं कुछ जवाब देता उसके पहले फोन डिसकनेक्ट हो गया ।

अँधेरे में अँधेरे को देखते मैं सोचता हूँ क्या किसी का नाम रेन हो सकता है ? बाहर अब भी बारिश हो रही है । अकेले में ये रॉंग नम्बर कोई नियति का फेंका हुआ पासा है शायद । सिगरेट की जलती हुई टोंटी से उठता धूँआ मेरे जीभ पर उसकी आवाज़ का धूँआ धूँआ स्वाद है ।

उसकी आवाज़ टूटी टूटी सी खराशदार है , जैसे टोबैको मेरी जीभ पर , जैसे बचपन में देखी वियुमास्टर पर जैंज़ीबार , ( और जैंज़ीबार कहते ही मेरे शरीर में एक सिहरन होती है और मैं इस शब्द को बार बार दोहराता हूँ ) का एक दृश्य गाँव का , उस आदमी का जो नीचे बिछी मिर्चों को या फिर शायद कॉफी बींस ? अब याद नहीं , हाथ से फैलाता मगन है । पीछे घर के बगल में छाया में टिकी साईकिल जो शायद साईकिल ही नहीं थी , बस कल्पना में साईकिल थी , ऐसी उसकी आवाज़ थी , शायद सिर्फ कल्पना में ।


रात के अँधेरे में मैं पुकारता हूँ ज़ोर से
रेन ! रेन !
फिर अपनी आवाज़ को थामता हूँ और स्वाद लेकर कहता हूँ
रेन
तीन बार और कहूँगा तो घँटी बजेगी और उसकी आवाज़ धीमे से फुसफुसा कर कहेगी
तुम हो ?


तीन बार कहने पर भी फोन नहीं बजता । मैं नीन्द में खर्राटे भरता सपने देखता हूँ फिर बारिश की । फिर हड़बड़ा कर आधी रात उठ बैठता हूँ । पता नहीं क्यों , पर मुझे फे वॉन्ग की याद आती है । शायद सब एक सपना है ।



मैं किसी आवाज़ को थाम कर रेगिस्तान पार कर जाना चाहता हूँ । उस आवाज़ में माँ की आवाज़ की प्रतिध्वनि है , किसी मैदान में खेलते दूर से अचानक हवा में माँ की आवाज़ तिरती आती थी , धीमी बुलाती हुई , जिसमें घर की गर्मी होती थी , चूल्हे के पास ताज़ा सिंकती रोटी पर गर्म चुपड़े घी की महक होती थी , माँ के पसीने और टैल्कम पाउडर की मिली जुली प्यारी खुशबू होती थी और कैसे मैं अचानक अधीर खेल बीच में छोड़ कर भाग आता , पीछे दोस्तों की सम्मिलित गुहार दरवाज़े तक मेरे साथ आती , साथ हाँफते दौड़ते । दरवाज़े के अंदर आते ही सब झटक देता । अंदर के पीले नहाये रौशनी में माँ मुड़कर देखतीं , मुस्कुरातीं , इशारा करतीं , हाथ मुँह धो आने की , फिर आँख मून्द कर तानपुरा सँभालतीं ।


रात के अँधेरे में तानपुरे की टुनटुन सुनाई देती है । माँ को गये कितना अरसा हुआ । हल्के नीले छोटे फूलों वाले खोल से मढ़ा तानपुरा अब भी घर पर माँ के कमरे में सजा है । कई बार वहाँ होने पर , जब माँ की कमी महसूस होती है , मैं तानपुरे के तार पर उँगलियाँ चलाता हूँ , जैसे बचपन में माँ रहम खा कर कभी मुझे गोद में बिठाकर तानपुरा बजवा लेतीं , या कभी सिलाई मशीन की हैंडल चलवा लेतीं । जैंज़ीबार वाला वियुमास्टर अगली बार जब घर जाउँगा , खोजूँगा पर तब तक कॉफीबींस आदमी को मैं बखूबी देख सकता हूँ । उस फे वॉन्ग लड़की को भी जिसका पक्का शर्तिया नाम रेन नहीं है ।

मैं अँधेरे को देखता फोन की घँटी का इंतज़ार करता हूँ ।

9/04/2008

इस दुनिया में कुछ भी वर्जित नहीं


मैं नींद में अचकचाकर बुदबुदाती हूँ कुछ अस्फुट शब्द जो चेतन नहीं हैं , उन अचेतन शब्दों की धरती इन्हीं
जागे सोये दुनिया के बीच की कोई खोयी दुनिया है , दो साँस के बीच का समतल पठार जहाँ पलती है इच्छायें
वो जो कही नहीं जाती , जनमती हैं उसी पल और फिर लटकी रहती हैं हवा में
उलटे

चाँदनी रात में दो लोग देखते हैं आसमान , हाथ साथ बढ़ाकर लोकते हैं इच्छायें , अंदर फिर खिलता नहीं क्यों कोई फूल
होते हैं हैरान , कहते हैं , अब हम बच्चे तो नहीं कि फर्क न कर पायें मिलने और चाहने के बीच

बैलून ग्लास में पीते हैं फेनी समझ कर कोई महंगी शराब उसी अदा से जैसे देखी थी कभी
किसी पुरानी अंग्रेज़ी फिल्म में , पीते हुये मद्धिम संगीत के साथ कुछ घूँट , बेहद मादक
जीते हैं किसी बिलकुल गैरज़रूरी इच्छा को ऐसे और ऐसे
और
रख देते हैं ताक पर लपेट कर लाल गठरी में महफूज़
उन खतरनाक इच्छाओं को जो लटकी हैं उलटी उस दुनिया में , जिनका अस्तित्व नहीं है इस दुनिया में
पर जिसकी गँध तिरती है यहाँ यहाँ और यहाँ

तुम हँसकर बढ़ाते हो ग्लास और कहते हो .... अब , इस दुनिया में कुछ भी वर्जित नहीं


(शगाल की पेंटिंग़ amoureux de vence)