11/16/2007

तलाश है अब एक नये स्क्रिप्ट की

लपकते शोलों की लपट किस्सागो की आँखों में चौंध भर देती । अरेबियन टेल्स वाली शाहज़ादी हो जैसे । लुढ़कते पुढ़कते ऊन के गोलों सा किस्सा दर किस्सा खुलता जाता था , कभी रेशम कभी नीला । सब मुँह बाये भक्क सुनते थे बिना पलक झपकाये , बिना उबासी जम्हाई लिये । कहीं एक पल को भी किस्सा छूट न जाये । बरस बीतता जाता था । किस्सागो किस्सा कह कह नहीं थकता । बस सुनने वाले बदलते जाते थे । तभी उस भयंकर षडयंत्र का पता कहाँ किसी को चला था ? सब उस किस्से की नूतनता पर आह करते , गज़ब ! उँगलियाँ तक सिहर जातीं रोमाँच से , ओह अद्भुत ! अद्भुत । सिर डुलाते वेदवाक्य का जाप होता । किस्सा कोह हँसता मंद मंद । इस शातिर चालाकी पर बाग बाग । फिर किसी होनहार गुनहगार की तरह इसे कैसे ज़ाहिर किया जाय कि सुनगुन में रहा मस्त । फिर मस्ती बेपरवाह हुई मुर्झाई सुस्त । बेचैन हुई आत्मा बेचैन हुआ मन ।

वही किस्सा बरस दर बरस उमर दर उमर हज़ारों लाखों साल , जाने कितने लाईट ईयर्स कहा जाता रहा , शून्य में , समग्र में , जंगलों गाँवों में , भोर के झुटपुटे में , तारों के चमकने में , छाँह में , बचपन की उमगन में , बुढ़ापे की ठहराई में , सघन वन अमराई में । किस्सा जीवन का मरण का , बेचैन तड़पते दमतोड़ खुशी और टूटती काँपती रुलाई का । फिर भी हर जन्म पर वही नये खुशी के नवजात भाव और मृत्यु के गठीले कंठ फोड़ते भय के तराजू पर ऊपर नीचे होती ज़िन्दगी का , वही का वही बरसों बरसों का खेल चलता है अनवरत । सब फैल कर विस्तार में विलीन या सिकुड़ कर एक बिन्दु में समाप्त ? किस्साकोह अब मुस्कुराता नही । खेल का मज़ा हुआ मन्द । वही किस्सा बार बार कितनी बार ? और क्यों भला ?

तलाश है अब एक नये स्क्रिप्ट की , कुछ तड़कता फड़कता दमदार ज़ोरदार । कहा जाये कोई नया किस्सा तरबतर रसेदार । है कुछ आपके पास ? कुछ तेज़ तीखा मिर्चीदार । किस्सागो करता है इंतज़ार ।

11/10/2007

लास वेगास के चकमक रास्तों में चित्तकोहड़ा की तलाश

कल वो अमेरिका से वर्षों बाद दीवाली पर पटना पहुँचे । बचपन शिवपुरी , चित्तकोहड़ा के आसपास बीता । घूमते रहे गलियों में , बाज़ार में । खोज खाजकर घर ढूँढ निकाला । जो देखना चाहते थे नहीं दिखा , जो दिख रहा था आँखें उसे देख नहीं पा रही थीं । अपनी व्याकुलता की कथा सुनाते रहे । लास वेगास के चकमक रास्तों में चित्तकोहड़ा की धूल भरी गलियों को तलाशते हैं । कैसे बतायें क्या ढूँढते हैं क्या आँखें साफ शफ्फाक देखती हैं । जब चिकनी सड़कों पर लम्बी गाड़ियाँ फिसलती हैं , मन लौटता है उस गली जो अब सिर्फ स्मृति में महफूज़ है । उनकी बेकली शब्दों को पार कर उफन रही थी । कसीनो की जगमग , रौशनी और चकमक । छोटे दुकानों पर आलू और चावल की बोरियाँ , दस साल और बुढ़ा गया वही नाख्रुस टेलरमास्टर , एक एक कपड़े के लिये कितना दौड़ाता था , आज देख पहचान कैसा खुश हो गया । भिनभिनाती मक्खियों के ढ़ेर , बजबजाती नालियों से सजी धूल भरी सड़क , सड़क के बीचोबीच पगुराती गाय , औटो ,रिक्शे की गजर मजर । आह यही है होमकमिंग । मोहल्ले का सबसे शानदार घर अरे उसी आनंद का , पढ़ता था जो एक साल आगे , उफ्फ कैसा जर्जर हुआ आज । एक गुस्सा कौंधा । क्यों नहीं सब वैसा ही रहा जैसा मन में साबित साबुत है । कैसी दुखदायी टीस । क्या छूट गया पीछे क्या मिलेगा आगे । छोटे छोटे टूटे वाक्य । वही क्लीशेड इमोशंस । बार बार उस अजब से दुख को पकड़ लेने की नाकाम कोशिश में अटके शब्द । आवाज़ में अजीब हैरानी । कुछ न समझ आने जैसी गज़ब सी बात ।


क्यों हम हमेशा एक तलाश के गुलाम होते हैं । भौगोलिक दूरी को तो कभी पाट भी लेते हैं , समय की दूरी का क्या करें ? कैसे लौटें , कुछ दिन पहले , कुछ महीने पहले , पिछले साल , पिछले कई बरस ? हाय ! मन इतनी चीज़ों को क्यों सहेज रखता है । कोई ब्लैकहोल , कोई ट्रैश बिन कहाँ है जहाँ ये स्मृतियाँ गड़प से बिला जायें ?

एक उम्र पर आकर शायद हम सिर्फ पीछे लौटते रहते हैं । जितना हम वर्तमान में जीते हैं उतना ही अतीत में लौटते हैं । बढती उम्र के साथ ये लौटना डाईरेक्टली प्रोपोर्शनल होता है । मेरे शब्द भी ऐसे ही टूटे फूटे से थे । उनकी हाँ में हामी भरते । हम साथ साथ चित्तकोहड़ा बज़ार जो घूम रहे थे , घूम घूम कर चकित हो रहे थे । अरे ! अब भी बिलकुल वही का वही ? नहीं ? हमारे आहलाद के पीछे पीछे कंठ में एक रुलाई वाली टीस ,मैं भी हूँ , जैसा कुछ याद दिला रही थी । मुझे भी पटना लौटे चार साल बीत चले हैं ।

11/04/2007

ईवनिंग ब्लूज़


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
सड़कों पर साँझ उतर रही है । आसमान धूसर मटमैला है । नीचे एक भूरी बिल्ली उदास आँखों से छज्जे को देखती , झाड़ियों में बिला जाती है । पंछियों का लौटना भी जैसे उदासी का ही कोई राग हो । जैसे खत्म होने को दोहराता हुआ । लौट जाना भी जैसे खत्म होना होता होगा । पेड़ों के पत्तों पर से अँधेरा गहराता है । कुछ देर में नीचे शाखों से होकर ज़मीन तक फैल जायेगा ।

मन उदास बेचैन है । पचास चीज़ें उभचुभ कर रही हैं ,जी किसी में नहीं रम रहा । सामने के घर के छोटे लॉन में कुर्सियाँ लगी हैं । बगल में मेज़ पर क्रिस्टल ग्लासेज़ हैं , वाईन की बोतल । शायद कोई छोटी सी पार्टी । धीमा संगीत उठकर ऊपर मुझ तक आता है । अँधेरे में चुप बैठे सोचती हूँ कितने काम करने हैं , कितने बिलकुल नहीं करने । करने न करने के बीच मन यो यो जैसा डोलता है । कितना पढ़ना , कितना सीखना , कितना संगीत सुनना , कितना खाना चखना पकाना । कितनी दुनिया देखनी है । कितनी यायावरी , कितना पागलपन, कितना मिलना कितना छूटना । कितना कितना करना । मैं चुपचाप ढ़लती साँझ में बिना कुछ किये बैठी समय का बीतना महसूस करती हूँ । एक नशे में धुत्त पागल ऐडिक्ट वेटिंग फॉर अ फिक्स ?