मैंने असगर वज़ाहत की किताब "मैं हिन्दू हूँ" पढी है । शाह आलम कैम्प की रूहें भी पढी हैं और मैं हिन्दू हूँ भी पढी हैं । मैं हिन्दू हूँ की कहानी में सैफू जो अधपागल है इसलिये हिन्दू हो जाना चाहता है ताकि दंगों के समय मारे जाने से बच जाये । सैफू को जब पी ए सी वाले मार रहे होते हैं तब वह लगातार मार खाते हुये यही कहता रहता है, कि तुमने मुझे क्यों मारा मैं हिन्दू हूँ ।
इन सब कहानियों में क्या है, एक दहशत है, खौफ है, एक समझ है कि, " न हिन्दू लडते हैं न मुसलमान, गुंडे लडते हैं"
असगर वज़ाहत अगर हिन्दू होते तो हिन्दू समाज के डर को लिखते । मुसलमान हैं तो मुस्लिम समाज की दहशत उन्हें दिखाई देती है । पर उसके पीछे की राजनीति भी दिखाई देती है । जिन्होंने नहीं पढी ये किताब, कृपया पढें ।
मामला सारा शायद इसी सब से शुरु हुआ था । बहुत पोस्ट्स लिखे गये, तर्क और भावुकता, नियम और कानून, ये खेमा वो खेमा, हम सही तुम गलत, बहुत सारा आक्रोश, ढेर सारी गलत फहमियाँ, कुछ बचकानापन, अपने को हर कोई सही ठहरा रहा है । और इन सब पोस्ट्स को पढते न पढते हम यही सोच रहे हैं कि शायद भाग एक का पटाक्षेप हुआ ।
जब ब्लॉग लिखना शुरु किया था तब छोटी सी बिरादरी थी । नारद का अपना एक स्थान था । चिठेरों का एक कुनबा था । धीरे धीरे आकार स्वरूप बदलता गया । आज पाँच सौ चिट्ठेकार हैं, अलग अलग सिद्धांत और वैचारिक अभिव्यक्ति को मानने और समझने वाले लोग । तो ऐसे में नारद का स्वरूप क्या हो, जैसी बातें सामने आने लगीं । शायद सबको एक लूज़ कवरिंग देने वाली एक विशाल छतरी जैसा हो । नारद एक एग्रीगेटर है कहना गलत है । नारद एक प्रतीक है । एग्रीगेटर्स कई और हैं और होंगे भी पर हमारे ज़ेहन में नारद का एक खास स्थान है और शायद इसी खास वज़ह की बात है कि आज इस बात से तकलीफ हो रही है कि नारद का स्वरूप विस्तृत होने की बजाय कहीं से छोटा हो रहा है ।
बाज़ार वाले राहुल ने गलत भाषा का प्रयोग किया । बिलकुल सही है ।
माफी माँगी और दूसरे अपने ब्लॉग पर नारद को , बकौल अनूप जी मुँह बिराया । सही है । ये बचकानापन है, थोडी सी बेवकूफी है । जैसे बच्चों की लडाई हो । पर इस मुँह बिराने वाली बात पर नारद ने क्या किया ? एक पत्थर उठा कर फेंक दिया ? इसमें बडप्पन वाली कोई बात न दिखी ।
कई वरिष्ठ चिट्ठाकारों ने पोस्ट लिखी- अभय, अफलातून, प्रियंकर, मसिजीवी, धुरविरोधी
शायद इनके कहे का कुछ लिहाज़ तो करना था । नारद के नियम साफ हैं । लेकिन कभी कभी बडे हित में थोडी बहुत फ्लेक्सिबिलिटी की ज़रूरत पडती रहती है ।
कल अगर कुछ चिट्ठे नारद से बाहर चले जायें, किसको फर्क पडेगा ? न नारद को पडेगा, न उन चिट्ठों को पडेगा । जिनको पढना है वो उन चिट्ठों को बुकमार्क करके रखेंगे । कल कोई नया बेहतर एग्रीगेटर आ जायेगा । शायद कुछ अभी भी हैं ।
मैं न इस खेमे में हूँ, न उस खेमे में । मुझे असगर वज़ाहत साम्प्रदायिक नहीं लगते । बाज़ार वाले की भाषा मुझे अभद्र लगी । उसके गिरहबान पकड कर माफी माँगने की अदा मुझे बचकाना लगी । मुझे अविनाश और गिरिराज का टिप्पणी कीर्तन बचपने का खेल लगी । मुझे नारद के नियमों के उल्लंघन ने परेशान किया । मैंने खुद को संजय बेंगानी की जगह रख कर देखा और खुद को परेशान पाया और मैंने संजय की दूसरे ब्लॉग पर टिप्पणियों के बंदूक के सामने भी अपने को खडा रख देखा और पाया कि मेरी परेशानी और भी बढ गयी ।
लेकिन...
लेकिन इन सब के बावज़ूद मुझे नारद का कहीं से छोटा साबित होना और भी ज़्यादा तकलीफदेह लगा । कल एक, दो या शायद दस बारह या शायद और भी ज़्यादा लोग नारद छोड दें । कल शायद नारद के लिंक की अहमियत अपने ब्लॉग पर गैर ज़रूरी हो जाये । और ये मुझे कोई बेटर टुमौरो जैसा कुछ नहीं लग रहा । शायद मैं तर्क और विवेक के परे भावुकता की भाषा बोल रही हूँ । पर ऐसा एहसास हो रहा है कि ये शायद एक समय के खत्म होने की शुरुआत है और इससे मुझे बेहद परेशानी हो रही है ।