11/11/2005

क्या फिर वसंत आया है

पेड के नीचे धूप मिली छाँह,
हिलती हुई कुर्सी और गोद में किताब,

बगल में लंबा ठँडा ग्लास
कुछ तीखा कुछ मीठा
तरल सा पेय

पैर के पास मेरा प्यारा कुत्ता
पंछियों के शोर पर एक आँख

खोलता ,फिर सर पँज्रे पर रख कर
आँखें बंद कर लेता

सामने मेरे आगे ,अंत में वृक्षों की कतार
पर उसके पहले हरी मखमली घास
और रंगीन फूलों की बेल


मेरे पीछे मेरे गाँव का प्यारा सा घर,
लाल छत और हरी खिडकियाँ

उजली धूप में खिलता हुआ
मैंने आँखें बंद कर लीं थीं,शांत स्निग्ध स्थिर
पर क्यों
मेरी उँगलियाँ अचानक बेचैन
हो रही हैं थिरकने को

शायद किसी प्यानो की कीज़ पर
क्यों मेरे पैर मचल रहे हैं किसी अनजानी
धुन के संगत को
मेरे मन में मद्धम संगीत का शोर किधर
से आया है ,
क्या फिर वसंत आया है

11/07/2005

कुछ हाइकु..दीवाली के

दीपक कहे
जगमगाये जग
मेरे ही संग

कैसी लगन
जलता रहा दीप
अँधेरा डरा

तेरा चेहरा
फुलझडी सी हँसी
रौशन जहाँ

घर आंगन
जुगनू से चमके
आज दीवाली

मुट्ठी भर
बिखेर दिये तारे
धरती पर

नैन चमके
दीये की रौशनी से
यही है खुशी

आज बिराजे
श्री लक्ष्मी औ गणेश
घर घर में

रंगोली सजी
जोत कलश जला
दीवाली मनी

11/01/2005

वही तन्हा चाँद

मुद्दतों बाद कुछ ऐसा
सा हुआ
रात भर धमनियों में
टपकता रहा
वही तन्हा चाँद

खिडकियों के सलाखों से
कभी झुक कर झाँके
धीरे से पलकों को
कभी छू कर के भागे
आखिर में इस खेल से
थक कर के
फैले हुए बिस्तर पे
सिमट कर के

रात भर पहलू मे
मेरे सोता रहा
वही तन्हा चाँद

गई रात तक
खेली गई जो
आँखमिचौली
उनींदे आँखों की
मदहोश खुमारी
हँस कर कह देती
वो मासूम कहानी
वो नटखट ,नादान
नन्हा सा वो खेल

दिनभर मुझे याद
आता रहा
वही तन्हा चाँद