11/07/2005

कुछ हाइकु..दीवाली के

दीपक कहे
जगमगाये जग
मेरे ही संग

कैसी लगन
जलता रहा दीप
अँधेरा डरा

तेरा चेहरा
फुलझडी सी हँसी
रौशन जहाँ

घर आंगन
जुगनू से चमके
आज दीवाली

मुट्ठी भर
बिखेर दिये तारे
धरती पर

नैन चमके
दीये की रौशनी से
यही है खुशी

आज बिराजे
श्री लक्ष्मी औ गणेश
घर घर में

रंगोली सजी
जोत कलश जला
दीवाली मनी

11/01/2005

वही तन्हा चाँद

मुद्दतों बाद कुछ ऐसा
सा हुआ
रात भर धमनियों में
टपकता रहा
वही तन्हा चाँद

खिडकियों के सलाखों से
कभी झुक कर झाँके
धीरे से पलकों को
कभी छू कर के भागे
आखिर में इस खेल से
थक कर के
फैले हुए बिस्तर पे
सिमट कर के

रात भर पहलू मे
मेरे सोता रहा
वही तन्हा चाँद

गई रात तक
खेली गई जो
आँखमिचौली
उनींदे आँखों की
मदहोश खुमारी
हँस कर कह देती
वो मासूम कहानी
वो नटखट ,नादान
नन्हा सा वो खेल

दिनभर मुझे याद
आता रहा
वही तन्हा चाँद

10/24/2005

वो तुम थे क्या ??

मैंने देखा था

रेलगाडी की खिडकी से

रात के गहराते निविड अँधकार में

दूर बियाबान जंगल में

एक रौशनी टिमटिमाती थी



कौन होगा उस अकेले सुनसान घर में

तन्हाई के बेलों से लिपटे दर में



कहीं वो तुम थे क्या ??



अँधेरे की चादर को हटा कर

देखूँ जरा

उस सूने घर की खिडकी से

झाँकू जरा



पर जब तक मैं हाथ

आगे बढाती

उँगलियों से पर्दे को

जरा सा हटाती

उस निमिष मात्र में

गाडी बढ गयी आगे

कहीं जो पीछे छूटा

वो तुम थे क्या ??

प्रत्यक्षा