3/14/2010

इतनी परछाईयाँ किस बात की ? beyond the still silhoutte

I can feel the blisters in my soul.He laughs at me, his eyes crinkling at the edges. I feel hurt, I feel abandoned. You betrayed me, I complain. My voice is a little girl’s voice. I tell him, wear always white.He says, little girl, comb your hair. I wake up disoriented and feel like a bird in flight in unknown skies. He is more with me now than he ever was. His going is coming back to me. I push away the face bathed in pain and reach for the voice which smiles always.


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किसी बात की बेकली में दिल टूटता है , सपना देखा था रात में , पानी हरहराता उफनता पानी और देहाती औरतें सर पर गठरी टिकाये कमर भर उफनते पानी में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर नदी पार करती , पुल इतना नीचे क्यों है ? चश्मा पहने बुज़ुर्ग पीछे से पूछते आते हैं , कमरे में पिता लेटे हैं कहते हैं , पास आओ । मेरी तरफ मुड़ते हैं , मुस्कुराते हैं । मैं पास आती हूँ कहती हूँ ज़्यादा मत मुड़िये गिर जायेंगे , वो कहते हैं इस साड़ी में अच्छी लग रही हो , मैं बार बार कहती हूँ वो भी बार बार कहते हैं , अच्छी लग रही हो अच्छी । मैं जानती हूँ पिता को गये साल से ज़्यादा हुआ । छोटे पीले फूलों वाली सूती साड़ी मेरे गिर्द लिपटी है । बाहर बारिश हो रही है , अँधेरा है , अंदर रौशनी है । मेरे चेहरे पर आँसुओं की नमी है । मैं सपने से निकलना नहीं चाहती , वहाँ पिता की मुस्कुराहट का सुकून है , गर्मी है । पिता को गये कितने दिन हो गये हैं ।

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He held me close and smoothed my hair then kissed me on my forehead. I held up my face and then kissed him back smack on his lips. He laughed then held me aside, then pulled me close again and tickled my armpits. I squealed in merriment then laughed and laughed with so much joy. I was all of five.

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तुमने जो देखा वो बस सपना था , हवा और पानी । याद है बचपन में खरीदा था उन्होंने तुम्हारे लिये गुलाबी पत्थरों वाली ब्रेसलेट । तुम्हारी याद में है और मज़े की बात कि और किसी के भी स्मृति में नहीं । तुम्हें उस झिलमिलाते पत्थर की हरी नीली आभा याद है , कलाई पर उसका स्पर्श याद है , कितना गहरा । माँ कहती है तब तुम इतनी छोटी थी , इतनी । सिर्फ पाँच साल । तुम्हें कैसे याद होगा ।

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He spread the marmalade on the bread and fed me. He wiped my face with his fingers and said, now dream. I looked at him; my love for  him shining in my eyes. The black crow sat on the sill and crowed madly. I knew he would come today. I knew for sure. In the night the pebbles hit the window glass.

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काले कौव्वे अब कहीं नहीं दिखते । अब छत की मुँडेर नहीं होती । आसमान अब सिर्फ खिड़की के फ्रेम में जड़ा एक चौकोर पेंटिंग है , धूसर , फीका और उदास । काले कौव्वे सब कहाँ गये ? मैं पूछना चाहती हूँ पर मुझे उनकी भाषा नहीं आती । सपने में बूढ़ा कौव्वा कहता है गंभीरता से , एक रात और बीत गई। सुबह मैं डीकोड करती हूँ सपना , भाषा , समय ।

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His photo hung in my room. The sunlight streamed through the window and fell on the photo. He seemed to smile, at last. The kettle blew the steam in short small gasps. The aroma of tea hung in the room. It was the fragrance my mother wore. I took out the blue sari from the almirah and draped it round me.


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सपने से जागना फिर एक और सपने में , ओह दिन रात कितने सपने , इतनी परछाईयाँ , किस बात की ?





2/28/2010

छत मिलेगी ? और सपना ?

बाहर सन्न हवायें डोलती हैं , उँगलियों पर दिन निकलते हैं , रात ? रात भर बात चलती है ,सपनों की दुनिया दिन के उजाले की खैरात पर नहीं चलती , सफेद पँखों वाले घोड़े की पीठ पर बेखट सरपट बहती हवा के संग किसी और छोर निकल जाती हैं

अँधेरी रात में बाँसुरी की धुन चाँद तक पहुँचती है , बेकल बेचैन फिर धीमे अपने में मगन थकी उतरती है , खिड़की पर रुकती है , कहती है , आओ चलो , साथ मेरे , हमदम मेरे

 ऐसी मोहब्बत का क्या करना , एक उसाँस भरती है , ज़िंदगी , जिसमें दुख ही दुख हों ? सुख का भी दुख ? ऐसी मोहब्बत का क्या करना ,  भला !

बन्द आँखों पर पीले पत्ते झरते हैं , बाँहों पर चलती है तितली , नींद अपनी खोह में छुपाता फुसफुसाता , एक बून्द शहद टपकता ज़बान पर , नींद ही नींद में मुस्कुराता सपना कहता ऐसा है
अपना , सब अपना

किसी और ज़माने में दुनिया से सतायी भगायी औरत पहुँचती है लथपथ बदहवास , भागती साँसों को हथेलियों में थामे , जीवन की गर्मी और आत्मा की ताप को छाती में छुपाये बचाये , पूछती है , अब कहो छत मिलेगी ? और सपना ?

  (ज़ामफीर पिकनिक ऐट हैंगिग रॉक .. पैनपाईप)
Gheorghe Zamfir - Picnic At Hanging Rock .mp3
Found at bee mp3 search engine

2/25/2010

रात के बाद


निर्मल कुहनी पर सर टिकाये दीवार का कोना देखती है । गर्मी है उमस है अँधेरा है। साड़ी का पल्ला फर्श पर फैला है जैसे नदी बहती हो , अँधेरी रात में नीली नदी , शरीर बहता है मन बहता है । कमर पर पसीने की झुलस झाँस है । फिर भी दिल में कैसी हुमस है , ऐसे इस तरह लेट लेना , किसी के पैर के नाखून का खुरदुरापन पन तलवे पर महसूस करना , न छूते हुये भी ।
अँधेरे में उसकी आँखें हँसती हैं , उसकी आँखों के कोये से रौशनी झरती है , चकमक जुगनू हँसी वाली रौशनी । अमिय चित्त लेटा बाँहों पर सर धरे धीमे से कुछ गुनगुनाता है । बिना देखे भी देख लेता है उसका हँसना

निर्मल कहती है , फिर ?

अमिय छत देखता कहता है फिर क्या ? फिर कुछ नहीं ।

कमरा उसकी आवाज़ से अचानक भर जाता है । जैसे कभी खाली नहीं था । जैसे आवाज़ की पीठ पर सवार सुख कमरे में हवा और चाँदनी की तरह पसर गया हो । वो किताबों की आलमारी , वो मेज़ वो कुर्सी वो एक अकेला पौधा । कमरा वो नहीं था अब जो होता था हमेशा। धीरे से हाथ बढ़ाकर निर्मल की बाँह एक बार छू लेता है । इस रात , इस बीच रात , यहाँ इस तरह लेटा आदमी अमिय कहाँ है । अमिय में ऐसी ठहरी हुई , भरी हुई खुशी कहाँ होती थी । इसी समय में ये और कोई समय था , इस कमरे में कोई और कमरा ..

क्यों है न ?

निर्मल सोचती धीरे से कहती है , जानते हो जब मैं गाना सीखती थी , तब लगता था इस आवाज़ की हवा पर सवार मैं चिड़िया हूँ , मेरी आत्मा में पँख लग गये हों । अब लगता है अपनी आत्मा को निचोड़ कर बाहर फैला दूँ सूखने को , मेरी आवाज़ वहाँ से टँगी झर जायेगी । और मैं यहाँ , इस कमरे में तुम्हारे साथ बिना आवाज़ के बिना आत्मा के ऐसे ही चुप बेआवाज़ बेआत्मा दफन हो जाऊँगी ।

अमिय गाने के बीच में उठता है पानी पीता है , फिर उसके पास बैठ जाता है । कहता है , सुबह में अभी बहुत समय है । उसकी आवाज़ में पूरी रात है बाकी , अभी


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निS रS मS लS

कोई पुकार रहा है बहुत दूर से । पतली खिंची तार सी आवाज़ है , जैसे आवाज़ से उसका शरीर अलग हो गया हो । उस आवाज़ में धूँआ है और तकलीफ है । दर्द में कोई मुझे खोजता है । नीन्द में कमज़ोर कुनमुनाहट में अकबका कर देखती है , साड़ी गले पर लिपट गई है । शर्मिन्दगी में उठ बैठती है । शेल्फ पर टिकी किताबें सोलेम्ली देखती हैं उसे । कमरे का अकेलापन गूँजता है । उसकी साँस की आवाज़ में धमक है । तानपुरे का तार टूट गया है , तबलची भाग गया और अंतरंग कथा कहानी में तब्दील हो गई है ।

उसने पलक को पँजो के शिखर पर रख कर फूँका , आँख बन्द की , और उनके बीच जितने भी शब्द थे उन्हें फूँक दिया ।


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अमिय कहता है , तुम बीच बीच में ऐसी उदास क्यों हो जाती हो ?

निर्मल बैठ जाती है , घुटनों को बाँह में समेटे । धीरे धीरे उसका शरीर लय में हिलता है जैसे पहाड़ा रटती लड़की । खूब छलकती हँसी से उमग कर कहती है .. जानते हो

अमिय का चेहरा स्थिर हो जाता है , जैसे चेहरे के भीतर कोई रौशनी जल गई हो भक्क से । उसकी आवाज़ के रेशे में दुलार है , कहता है ..हाँ बताओ न !

तुम्हारे अंदर एक बच्चा है न , उस बच्चे की मैं सौ खून माफ करती हूँ

और मेरे भीतर जो बड़ा है ? उसका क्या ?
उससे बेईंतहा नफरत

ये कहते निर्मल की आवाज़ सपाट हो जाती है

अमिय बेपरवाह गुनगुनाता है , तुम जो मिल गये हो .तो जहाँ मिल गया है

फिर मुस्कुरा कर कहता है .. रात अभी भी ..

निर्मल कहती है , बाकी है ..


गाढ़े अँधेरे में उनकी गाढ़ी हँसी का नृत्य डोलता है

(जेमी वाईयेथ की पेंटिंग़ ..)