2/28/2010

छत मिलेगी ? और सपना ?

बाहर सन्न हवायें डोलती हैं , उँगलियों पर दिन निकलते हैं , रात ? रात भर बात चलती है ,सपनों की दुनिया दिन के उजाले की खैरात पर नहीं चलती , सफेद पँखों वाले घोड़े की पीठ पर बेखट सरपट बहती हवा के संग किसी और छोर निकल जाती हैं

अँधेरी रात में बाँसुरी की धुन चाँद तक पहुँचती है , बेकल बेचैन फिर धीमे अपने में मगन थकी उतरती है , खिड़की पर रुकती है , कहती है , आओ चलो , साथ मेरे , हमदम मेरे

 ऐसी मोहब्बत का क्या करना , एक उसाँस भरती है , ज़िंदगी , जिसमें दुख ही दुख हों ? सुख का भी दुख ? ऐसी मोहब्बत का क्या करना ,  भला !

बन्द आँखों पर पीले पत्ते झरते हैं , बाँहों पर चलती है तितली , नींद अपनी खोह में छुपाता फुसफुसाता , एक बून्द शहद टपकता ज़बान पर , नींद ही नींद में मुस्कुराता सपना कहता ऐसा है
अपना , सब अपना

किसी और ज़माने में दुनिया से सतायी भगायी औरत पहुँचती है लथपथ बदहवास , भागती साँसों को हथेलियों में थामे , जीवन की गर्मी और आत्मा की ताप को छाती में छुपाये बचाये , पूछती है , अब कहो छत मिलेगी ? और सपना ?

  (ज़ामफीर पिकनिक ऐट हैंगिग रॉक .. पैनपाईप)
Gheorghe Zamfir - Picnic At Hanging Rock .mp3
Found at bee mp3 search engine

2/25/2010

रात के बाद


निर्मल कुहनी पर सर टिकाये दीवार का कोना देखती है । गर्मी है उमस है अँधेरा है। साड़ी का पल्ला फर्श पर फैला है जैसे नदी बहती हो , अँधेरी रात में नीली नदी , शरीर बहता है मन बहता है । कमर पर पसीने की झुलस झाँस है । फिर भी दिल में कैसी हुमस है , ऐसे इस तरह लेट लेना , किसी के पैर के नाखून का खुरदुरापन पन तलवे पर महसूस करना , न छूते हुये भी ।
अँधेरे में उसकी आँखें हँसती हैं , उसकी आँखों के कोये से रौशनी झरती है , चकमक जुगनू हँसी वाली रौशनी । अमिय चित्त लेटा बाँहों पर सर धरे धीमे से कुछ गुनगुनाता है । बिना देखे भी देख लेता है उसका हँसना

निर्मल कहती है , फिर ?

अमिय छत देखता कहता है फिर क्या ? फिर कुछ नहीं ।

कमरा उसकी आवाज़ से अचानक भर जाता है । जैसे कभी खाली नहीं था । जैसे आवाज़ की पीठ पर सवार सुख कमरे में हवा और चाँदनी की तरह पसर गया हो । वो किताबों की आलमारी , वो मेज़ वो कुर्सी वो एक अकेला पौधा । कमरा वो नहीं था अब जो होता था हमेशा। धीरे से हाथ बढ़ाकर निर्मल की बाँह एक बार छू लेता है । इस रात , इस बीच रात , यहाँ इस तरह लेटा आदमी अमिय कहाँ है । अमिय में ऐसी ठहरी हुई , भरी हुई खुशी कहाँ होती थी । इसी समय में ये और कोई समय था , इस कमरे में कोई और कमरा ..

क्यों है न ?

निर्मल सोचती धीरे से कहती है , जानते हो जब मैं गाना सीखती थी , तब लगता था इस आवाज़ की हवा पर सवार मैं चिड़िया हूँ , मेरी आत्मा में पँख लग गये हों । अब लगता है अपनी आत्मा को निचोड़ कर बाहर फैला दूँ सूखने को , मेरी आवाज़ वहाँ से टँगी झर जायेगी । और मैं यहाँ , इस कमरे में तुम्हारे साथ बिना आवाज़ के बिना आत्मा के ऐसे ही चुप बेआवाज़ बेआत्मा दफन हो जाऊँगी ।

अमिय गाने के बीच में उठता है पानी पीता है , फिर उसके पास बैठ जाता है । कहता है , सुबह में अभी बहुत समय है । उसकी आवाज़ में पूरी रात है बाकी , अभी


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निS रS मS लS

कोई पुकार रहा है बहुत दूर से । पतली खिंची तार सी आवाज़ है , जैसे आवाज़ से उसका शरीर अलग हो गया हो । उस आवाज़ में धूँआ है और तकलीफ है । दर्द में कोई मुझे खोजता है । नीन्द में कमज़ोर कुनमुनाहट में अकबका कर देखती है , साड़ी गले पर लिपट गई है । शर्मिन्दगी में उठ बैठती है । शेल्फ पर टिकी किताबें सोलेम्ली देखती हैं उसे । कमरे का अकेलापन गूँजता है । उसकी साँस की आवाज़ में धमक है । तानपुरे का तार टूट गया है , तबलची भाग गया और अंतरंग कथा कहानी में तब्दील हो गई है ।

उसने पलक को पँजो के शिखर पर रख कर फूँका , आँख बन्द की , और उनके बीच जितने भी शब्द थे उन्हें फूँक दिया ।


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अमिय कहता है , तुम बीच बीच में ऐसी उदास क्यों हो जाती हो ?

निर्मल बैठ जाती है , घुटनों को बाँह में समेटे । धीरे धीरे उसका शरीर लय में हिलता है जैसे पहाड़ा रटती लड़की । खूब छलकती हँसी से उमग कर कहती है .. जानते हो

अमिय का चेहरा स्थिर हो जाता है , जैसे चेहरे के भीतर कोई रौशनी जल गई हो भक्क से । उसकी आवाज़ के रेशे में दुलार है , कहता है ..हाँ बताओ न !

तुम्हारे अंदर एक बच्चा है न , उस बच्चे की मैं सौ खून माफ करती हूँ

और मेरे भीतर जो बड़ा है ? उसका क्या ?
उससे बेईंतहा नफरत

ये कहते निर्मल की आवाज़ सपाट हो जाती है

अमिय बेपरवाह गुनगुनाता है , तुम जो मिल गये हो .तो जहाँ मिल गया है

फिर मुस्कुरा कर कहता है .. रात अभी भी ..

निर्मल कहती है , बाकी है ..


गाढ़े अँधेरे में उनकी गाढ़ी हँसी का नृत्य डोलता है

(जेमी वाईयेथ की पेंटिंग़ ..)

2/19/2010

बारिश और बिच्छू


बहुत पुरानी स्मृतियों में , मेरी नहीं , माँ की स्मृति में , जो जाने कितनी बार दोहराई गई हैं , बरसाती दोपहरों में और कुहासे घिरी ठंडी रातों में , चाय की प्यालियों की भाप के बीच और खाने के बाद सौंफ की खुशबूदार जुगालियों के गिर्द , सोचते और फिर याद करते , अटकते उस बीते समय को पकड़ते , कोशिश करते ... और बिच्छू अब भी मिट्टी की दीवार पर रेंगता है , उसकी छाया दसगुनी बढ़ती है , उसका डंक दीवार पर पसरता है


तो , वो समय ऐसा था ,

इसी तरह उनकी कहानी शुरु होती थी ..

तुम्हारे पिता तब किसी देहात में नियुक्त थे । उन्हें एक नियुक्ति वहाँ बितानी थी और दोस्तों ने हमें आगाह किया था कि छोटे बच्चों के साथ वहाँ कितना कठिन समय हमारा बीतने वाला था जहाँ बिजली नहीं थी और अस्पताल नहीं था । एक डॉक्टर तो थे और उनका एक कम्पाउंडर , छोटा सा दुबला सा आदमी जिसकी आँखें मचकती थीं और एक मलयाली नर्स जिसके तेल भीगे कड़े घुँघराले बाल थे । एक तीन कमरे का झँखाड़ उजाड़ सरकारी डिस्पेंसरी था जहाँ कोई दवा का स्टॉक नहीं होता सिवाय कॉटन के बड़े रोल्स के ।

 
माँ फिर टैंजेंट चली जातीं , कहीं और

मैं उन्हें वापस लाने की कोशिश करती , हाँ हाँ ,लेकिन उन बिच्छुओं का क्या ? ओह ! वो ? पर वो तो हर तरफ थे , जूते में , रज़ाई के भीतर , कमीज़ की तह में , पतलून के पैर में , और एक बार तो उस पजामे में भी जो मैंने तुम्हारे पिता को पहनने को दिया था

और फिर ?

फिर क्या ? वो भाग्यशाली रहे , बिच्छू बस फिसल कर नीचे ज़मीन पर गिरा , उलट गया फिर कुछ पल उलटा तड़फड़ाया , सीधा हुआ और तेज़ी से अँधेरे में बिला गया । बेचारा , शायद तुम्हारे पिता से भी ज़्यादा सहमा डरा हुआ होगा .. माँ एक लम्बी गहरी साँस लेती हैं । दीवार पर परछाईं गहराती है फिर ज़रा काँपती है ।

वहाँ बिजली नहीं थी । हर कमरे के लिये एक लालटेन और तुम्हारे पिता के काम करने के लिये एक पेट्रोमैक्स ।

मुझे एक फोटो की याद है जिसमें पिता अपने काम के बीच ऊपर देख रहे हैं , उनके चश्मे का काला फ्रेम उन्हें बहुत गंभीर दर्शा रहा है एक किस्म की संजीदा खूबसूरती के साथ । उनकी भौंहे प्रश्न में उठी हैं और एक पुराना पेट्रोमैक्स बगल की मेज़ पर रखा है ।

शायद ये वही पेट्रोमैक्स था या उस जैसा कोई और ।

मैं तस्वीर हाथ में रखती हूँ , सहेजती हूँ । अब कोई नहीं है ... न माँ , न पिता । मेरे ऊपर छत नहीं है । आसमान खुला है और हर समय बारिश होती है ।

हड़बड़ी में जीना मुझसे कितनी गलतियाँ करा गया .....