निर्मल कुहनी पर सर टिकाये दीवार का कोना देखती है । गर्मी है उमस है अँधेरा है। साड़ी का पल्ला फर्श पर फैला है जैसे नदी बहती हो , अँधेरी रात में नीली नदी , शरीर बहता है मन बहता है । कमर पर पसीने की झुलस झाँस है । फिर भी दिल में कैसी हुमस है , ऐसे इस तरह लेट लेना , किसी के पैर के नाखून का खुरदुरापन पन तलवे पर महसूस करना , न छूते हुये भी ।
अँधेरे में उसकी आँखें हँसती हैं , उसकी आँखों के कोये से रौशनी झरती है , चकमक जुगनू हँसी वाली रौशनी । अमिय चित्त लेटा बाँहों पर सर धरे धीमे से कुछ गुनगुनाता है । बिना देखे भी देख लेता है उसका हँसना
निर्मल कहती है , फिर ?
अमिय छत देखता कहता है फिर क्या ? फिर कुछ नहीं ।
कमरा उसकी आवाज़ से अचानक भर जाता है । जैसे कभी खाली नहीं था । जैसे आवाज़ की पीठ पर सवार सुख कमरे में हवा और चाँदनी की तरह पसर गया हो । वो किताबों की आलमारी , वो मेज़ वो कुर्सी वो एक अकेला पौधा । कमरा वो नहीं था अब जो होता था हमेशा। धीरे से हाथ बढ़ाकर निर्मल की बाँह एक बार छू लेता है । इस रात , इस बीच रात , यहाँ इस तरह लेटा आदमी अमिय कहाँ है । अमिय में ऐसी ठहरी हुई , भरी हुई खुशी कहाँ होती थी । इसी समय में ये और कोई समय था , इस कमरे में कोई और कमरा ..
क्यों है न ?
निर्मल सोचती धीरे से कहती है , जानते हो जब मैं गाना सीखती थी , तब लगता था इस आवाज़ की हवा पर सवार मैं चिड़िया हूँ , मेरी आत्मा में पँख लग गये हों । अब लगता है अपनी आत्मा को निचोड़ कर बाहर फैला दूँ सूखने को , मेरी आवाज़ वहाँ से टँगी झर जायेगी । और मैं यहाँ , इस कमरे में तुम्हारे साथ बिना आवाज़ के बिना आत्मा के ऐसे ही चुप बेआवाज़ बेआत्मा दफन हो जाऊँगी ।
अमिय गाने के बीच में उठता है पानी पीता है , फिर उसके पास बैठ जाता है । कहता है , सुबह में अभी बहुत समय है । उसकी आवाज़ में पूरी रात है बाकी , अभी
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निS रS मS लS
कोई पुकार रहा है बहुत दूर से । पतली खिंची तार सी आवाज़ है , जैसे आवाज़ से उसका शरीर अलग हो गया हो । उस आवाज़ में धूँआ है और तकलीफ है । दर्द में कोई मुझे खोजता है । नीन्द में कमज़ोर कुनमुनाहट में अकबका कर देखती है , साड़ी गले पर लिपट गई है । शर्मिन्दगी में उठ बैठती है । शेल्फ पर टिकी किताबें सोलेम्ली देखती हैं उसे । कमरे का अकेलापन गूँजता है । उसकी साँस की आवाज़ में धमक है । तानपुरे का तार टूट गया है , तबलची भाग गया और अंतरंग कथा कहानी में तब्दील हो गई है ।
उसने पलक को पँजो के शिखर पर रख कर फूँका , आँख बन्द की , और उनके बीच जितने भी शब्द थे उन्हें फूँक दिया ।
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अमिय कहता है , तुम बीच बीच में ऐसी उदास क्यों हो जाती हो ?
निर्मल बैठ जाती है , घुटनों को बाँह में समेटे । धीरे धीरे उसका शरीर लय में हिलता है जैसे पहाड़ा रटती लड़की । खूब छलकती हँसी से उमग कर कहती है .. जानते हो
अमिय का चेहरा स्थिर हो जाता है , जैसे चेहरे के भीतर कोई रौशनी जल गई हो भक्क से । उसकी आवाज़ के रेशे में दुलार है , कहता है ..हाँ बताओ न !
तुम्हारे अंदर एक बच्चा है न , उस बच्चे की मैं सौ खून माफ करती हूँ
और मेरे भीतर जो बड़ा है ? उसका क्या ?
उससे बेईंतहा नफरत
ये कहते निर्मल की आवाज़ सपाट हो जाती है
अमिय बेपरवाह गुनगुनाता है , तुम जो मिल गये हो .तो जहाँ मिल गया है
फिर मुस्कुरा कर कहता है .. रात अभी भी ..
निर्मल कहती है , बाकी है ..
गाढ़े अँधेरे में उनकी गाढ़ी हँसी का नृत्य डोलता है
(जेमी वाईयेथ की पेंटिंग़ ..)