5/29/2009

समय सपना

मैं सपने देखने के सपने देखता हूँ ।
हवा तेज़ चलती है , सीटी बजाती और गौरैया फुदकती है खिड़की के सिल पर ,रेडियो सिलोन पर पुराने गाने बजते हैं, प्रीतम आन मिलो ....और बाहर सड़क पर सिलबट्टे कूटने वाला फेरी लगाता है सुनसान सड़क पर , अकेला

सब दरवाज़े बन्द हैं , एक परिन्दा तक झाँकता नहीं सिर्फ एक लाल चेहरे वाला लंगूर सफेद चूने लगी छत पर से ताकता है , बिटर बिटर आँखों से , कपड़े तार पर फड़फड़ाते हैं , अबरक लगे दुपट्टे और कलफ की गई पाँच गजी साड़ियाँ और सफेद पजामे के नाचते पैर, बिन बाँह की नीली शमीज़

शायद जब बादल घुमड़ेंगे तब मोर नाचेगा अपने पँख फैलाकर
शायद उसका एक जादू गिर जायेगा , फिर टंग जायेगा उस दीवार पर जिसमें एक खिड़की खुलती है , रंगीन छीटदार परदे के पीछे

बाबू रात को बारह बजे तक लैम्प की रौशनी में पढ़ेगा , माँ रात को एक गिलास हॉरलिक्स रख जायेगी फिर,बिवाई वाले तलवे पर वेसलीन मलेगी , बिंटी पॉंन्ड्स ड्रीमफ्लॉवर टॉल्क अपने गरदन पर छिड़क कर डूब जायेगी उमस भरे नींद में

रात के अँधेरे में बहादुर की जागते रहो गूँजेगी , फिर लाठी की ठकठक और तेज़ सीटी , चाँद साक्षी है ... साक्षी है तब जब टीवी पर देर रात देखता है कोई पेरिस ज़तेम और सोचता है इस समय का हो कर भी इस समय का मैं नहीं

मैं पन्ने पलटता हूँ , ये दुनिया झप्प से ओझल हो जाती है, शब्दों का बोध खत्म होता है , समय खत्म होता है , मैं एक गुमशुदा घर का बाशिन्दा हूँ , एक खोये सपने का मालिक , अपने समय से बिछुड़ा एक अदना सा मुसाफिर

नीलगाय चर जाते हैं सपने हर रोज़ और मैं हर दिन की ऊब को जम्हाई में भर कर पी जाता हूँ , आईने में देखकर कहता हूँ ..यू आर ऐन ऐडिक्ट नीडिंग यॉर फिक्स ऑफ ड्रीम्ज़ एवरी नाईट ..शुक्र है अब भी सपने देखने के सपने देखता हूँ , दीवार पर जबकि काली परछाईयों का शोकगीत है ..

3/30/2009

सफ़ीना ए ग़मे दिल

कभी आप इश्क़ में पड़ जाते हैं , कुछ पढ़ते हैं और मोहब्बत हो जाती है । क़ुर्तुल एन हैदर को पढ़ा था जब दस बारह साल की रही हूँगी । अपरम्परा एक पत्रिका थी जिसके सिर्फ तीन अंक निकले । बड़े लोग जुटे थे इस पत्रिका से और इसके छपने से घरैया संबंध भी था जो खैर महत्त्वपूर्ण नहीं। बस इतना था कि उसके दो अंक हमारे घर पर थे । पहले अंक में ऐनी आपा की ज़िलावतन थी । उस दस साल की उमर में मुझे पहला इश्क हुआ। फिर जहाँ जहाँ कहाँ कहाँ खोज कर उनको पढ़ा .. उनकी कहानियाँ , उनके कुछ उपन्यास , अपरम्परा के दूसरे अंक में रिपोर्ताज ।

आप किसी लेखक को प्यार करते हैं तो उसके बारे में उमग कर बात करना चाहते हैं , उनकी लिखी पंक्तियाँ आप हँस कर एक प्यार भरी हैरानी से दूसरों के साथ बाँटना चाहते हैं । आप इश्क में होते हैं और सबको बता देना चाहते हैं । शब्दों की दुनिया के चमकीले संसार की रौशनी आपकी आत्मा में भरी होती है । हैरानी होती है कि दूसरे उसे देख नहीं पा रहे , शब्दों के जादू की थाह नहीं पा रहे । कैसी नज़र है ? कैसी आत्मा है ? और कैसी गरीबी है । कुर्तुल ऐन हैदर के बारे में बात करते हमेशा ऐसा ही महसूस हुआ । लेकिन कहीं भी उनका नाम लिया , उत्साह से छलकते किताबों का ज़िक्र किया ..

ओह , अच्छा ..आग का दरिया हाँ हाँ , फिर बात बदल गई..। जैसे कोई दीवार खड़ी हो ।

उनकी "गर्दिशे रंगे चमन" पाँच सात साल पहले पढ़ी थी । कुछ बहुत कुछ पागल हुई थी । कुछ मित्रों से ज़िक्र किया । इस मुगालते में थी कि कुर्तुल की किताब है , कहीं भी मिल जायेगी । ऐसे भोलेपन का टूटना ही था । तब तक हिन्दी साहित्य समाज की गरीब दिशाहारेपन से वास्ता न पड़ा था । आग का दरिया तक जो उनका मैग्नम ओपस समझी जाती है , उस तक पहुँचने के लिये भी कम तकलीफ नहीं उठानी पड़ी । भला हो श्रीराम सेंटर की पुस्तक दुकान (अफसोस अब वो जगह भी बंद हुई )जिन्होंने मिन्नत करने पर कहीं से एक प्रति उठवाई । ये कहानी अलग है कि उसकी छपाई , कागज़ की क्वालिटी सब , कई कई बार अपने कंगलेपन में आपका दिल तोड़ दें और आप फिर याद करें कि किसी भी और विदेशी भाषा के क्लासिक्स कैसे चमकीले साज सज्जा में आपका दिल जुड़ाते हैं । खैर , वो उनके लिखे के प्रति मेरी अगाध अनुरक्ति है कि उस घटिया कागज़ के बावज़ूद उस दुनिया ने मुझे जकड़ पकड़ लिया , छू लिया । रंगे चमन अब तक खोज रही हूँ। तमाम लोगों को कह रखा , वैसे लोग भी जो उस दुनिया के हैं। हर जगह बड़ी ठंडक दिखी और मुझे इस बात से हैरानी भरी तकलीफ और न समझ में आने वाला गुस्सा ।

आमेर हुसैन, टाईम्स लिटररी सप्प्लीमेंट में लिखते हैं कि आग का दरिया उर्दू साहित्य में वो जगह रखता है जो हिस्पानिक साहित्य में वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड का है । और ये कि अपने समकालीन लेखकों, जैसे मिलान कुंडेरा और मार्खेज़ से उनकी तुलना की जाये तो उनके लेखकीय संसार की वृहत्ता , उनकी दृष्टि , उनका अंतरलोक . समय के पार और उसके परे जाता है । अमिताव घोष कहते हैं कि वो बीसवीं सदी की सबसे महत्त्वपूर्ण भारतीय आवाज़ हैं । फिर वो सबसे महत्त्वपूर्ण आवाज़ क्यों हमें उपलब्ध नहीं है ? क्यों जब हम महत्त्वपूर्ण किताबों की बात करते हैं तो कुर्तुल का नाम अमूमन उस आसानी से नहीं लिया जाता ? किसी ने कभी मुझे कहा था कि वो उर्दू की हैं , डोंट क्लेम हर ऐज़ योर ओन (यहाँ ओन मतलब हिन्दी साहित्य )

एक बार मैने किसी से शिकायत की थी क्यों नहीं उनकी सब चीज़ें एक जगह एकत्रित की जा सकती हैं । मुझे कॉपीराईट रूल्स और पब्लिकेशन के नियम बताये गये थे । मैं नहीं जानती उनकी चीज़ों के कॉपीराईट्स किसके पास हैं, मुझे नहीं पता कि पब्लिशिंग़ हाउसेस उन चीज़ों को नहीं छापता जो किसी और ने छापी हैं पहले से । मुझे सचमुच इन नियमों के बारे में कुछ नहीं मालूम। मैं सिर्फ एक अदना पाठक हूँ जिसको उनके लिखे से बेपनाह मोहब्बत है। मैं सिर्फ ये जानती हूँ कि उन जैसी लेखिका के लिये शायद ऐसे सब नियम तोड़े जा सकते हैं और इस बात का क्षोभ कि मैं सिर्फ अदना पाठक क्यों हूँ । मैं ऐसे किसी समाज का हिस्सा क्यों नहीं जहाँ एक पाठक की हैसियत इतनी महत्त्वपूर्ण हो कि किताबें उनके माँग को ध्यान में रखकर मुहैय्या करायीं जायें ।

मैं याद करती हूँ कि चाँदनी बेगम, सीताहरण या गर्दिशे रंगे चमन मे उन हिस्सों को जहाँ कहानी खत्म होती है और लूज़ली स्ट्रक्चर्ड बातचीत के ज़रिये वो हमें कहीं और ले जाती हैं , वहाँ जहाँ जीवन अपनी संपूर्णता में, अपने कच्चे पक्केपन में धड़कता है । उन हिस्सों को पढ़कर कई बार मुझे लगा है कि उनसे बात करना ऐसा ही होता , अगर मिल लेती तो और अगर वो मुझे प्यार से , ए लड़की इधर बैठो ..कहतीं ।

नेट पर खंगालते मुझे उनके बारे में बहुत कुछ नहीं मिला ..लेकिन रज़ा रूमी के उनसे मिलने की दास्तान मिली, उनकी कुछ औडियो लिंक्स , यहाँ भी , कुछ उनपर लिखे पुराने ब्लॉग लिंक्स मिले ..यहाँ

बस इतना सा ही । कुछ दिन पहले ज़ुबानबुक्स पर सीताहरण का अंग्रेज़ी तर्ज़ुमा अ सीज़न ऑफ बिट्रेयल्स देखकर मन प्रसन्न हुआ था । इस उम्मीद में हूँ कि ऐसे ही "कारे जहाँ दराज़" और "मेरे भी सनमखाने" कहीं मिल जायें ।

उनके बारे में कुछ यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

ये भी तकलीफ की ही बात है कि नेट तक पर उनसे संबंधित कितनी कम सामग्री है । ऐनी आपा होतीं अभी, कहतीं, अच्छा लड़की , तू इतना ही समझती है?

शी वुडंट हैव केयर्ड अ डैम ..

3/26/2009

तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ?

बूढ़ा गरम कपड़ों में लिपटा , पनियायी आँखों से देखता है , जीवन जो बीत चुका । अब और कुछ नहीं है इंतज़ार के सिवा । चाय की प्याली से हाथ सेंकता सोचता है अब भी वही तीस साल का फुर्तीला जोशीला लड़का कुँडली मार कर बैठा है भीतर । क्या होगा उसका मृत्यु के बाद ।


ये वो नहीं, मैं सोचती हूँ । बियाबान चट पहाड़ों के बीच कहीं खो जाती सी , जाने कहाँ जाती सी सड़क पर घँटों चलते शरीर अकड़ जाता है । इतनी ऊँचाई पर साँस की भी दिक्कत । तराई पर अपने कमरे का गर्म सुकून याद आता है । सच पागल हुये थे जो ऐसे जोखिम भरे रास्ते पर चल पड़े । ऐसी कैसी घुमाई । हल्की धीमी उबकाई साँस के साथ चलती है । उस उचाट बियाबान में इस चाय की गुमटी का मिल जाना भगवान का मिलना है । गुमटी के पीछे दो देसी मुर्गियों के बीच एक बाँका मुर्गा कलगी फैलाये शान से देखता है । मुर्गियाँ अच्छी गृहणियों की तरह एक बार हमें देखकर पथरीली चट ज़मीन में फिर कीड़े मकोड़े तलाशने में जुट जाती हैं । टेढ़े बेढ़ंगे दो टाँग पर टिके पटरे पर बैठना खतरे से खाली नहीं पर बूढ़े के इशारे पर हम बैठ जाते हैं , ठंड से सिकुड़ते और लालसा से ओट में जलते चूल्हे की आग की गर्मी और खदबदाते देग से गर्म भाप को आँखों से पीते , हम ताकते हैं .. बाहर की पहाड़ियों की तरफ , फिर भीतर के सफेद गंदलाये अँधेरे की तरफ , फट्टों की दीवार के फाँक से आती हवा से हिलते पिछले साल के कैलेंडर और ताक पर रखे पीतल के बुद्ध भगवान की मूर्ति के सामने लोबान के उठते धूँये की तरफ । बुद्ध अपनी मंगोल आँखों से अनुक्म्पा बरसाते हैं ।


कभी तैमूरलंग इसी रास्ते आया होगा , समरकंद , अमु दरिया से ऐटॉक होते हुये दिल्ली । शहरों और गाँवों को लूटते हुये , बाशिन्दों को मौत के घाट उतारते हुये , औरतों को हवस का शिकार बनाते हुये और फिर नब्बे हाथियों पर सिर्फ बेशकीमती पत्थरों को लाद कर और बाकी लूट का माल लिये लौटा होगा बीबी खानम मस्जिद बनाने के लिये ।


मुझे नक्शे देखना पसंद है । उँगली रखकर मैं तैमूर के रास्ते चलती हूँ , हेरात , इस्फाहन , शीराज़ । क्या ज़मान रहा होगा । तैमूर सुनते हैं लंगड़ा था और घोड़ों पर सवार अपने सैनिकों के साथ , दुर्गम दुर्दांत दर्रों और पहाड़ियों से , बर्फीली हवाओं वाली तराई से , कँपकँपाते ठंड में कैसे जोखिम उठाते निकल पड़ा होगा । कैसी अदम्य जीवनी होगी । धूल उड़ाते , भालो और तलवारों और नेज़ों से लैस, चमड़ों के पट्टों की जीन कसे अरबी घोड़े मुँह से झाग उड़ाते उड़ते होंगे , धूल , पसीने , थकन से पस्त , भूरी दाढ़ियों में कहाँ कहाँ की धूल भरे, अपने अंदर की आग जलाये । जीना , मरना फिर जीना । व्यर्थ नहीं , हमेशा किसी सार्थकता की तलाश में । और बेचारी औरतें ? हमेशा पहला निशाना , आतताईयों के , हमलावरों के , लूटेरों के । वही जीवन का तरीका था । अ वे ऑफ लाईफ । कितना ऐडवेंचर , कितनी तकलीफें ।

मेरी उँगली तैमूर के साम्राज्य की सीमाओं पर फिरती लौट आती हैं । अपने खोल के अंदर दुबक जाती हैं। पोरों से मैंने एक संसार छू लिया । किसी ने कहा था , तुम्हारे अंदर वो आग कहाँ है ?
मैं खोजती हूँ , टटोलती हूँ अपने भीतर । इस आग को लेकर मैं भी तैमूर बन जाऊँगी । सब तज कर किधर अपने सपने खोजती निकल जाऊँगी ? अपने मन की भीतरी सब गुफाओं और खोह की पड़ताल कर लूँ पहले , दुबके अँधेरों को पहचान लूँ , अपनी आत्मा से सब संताप मिटा दूँ तब मेरे पैरों की नीचे ज़मीन होगी न , ठोस ज़मीन । मैं अपने पँख चमकते धूप में फैला कर आसमान देखती हूँ । आसमान आज खुशी का नाम है ।


गाड़ी के बोनट पर थोड़ी धूल जमी है । उसका पिछला चक्का बैठ गया है और स्टेपनी , मालूम पड़ता है कि पिछले पंक्चर के बाद बदला गया था , बनवाया नहीं । दोनों पुरुष गहन बहस में जुटे हैं । चाय गुमटी बूढ़ा अपनी पनियायी आँखों से चुप देखता है । उसकी जवान चिपटे सेब गाल चेहरे वाली बहू बिना कुछ समझे हँसती है । कोई गैराज ? मेकैनिक ? पर भी मुँह पर हाथ धरे फिर हँसती है । रियर व्यू मिरर से लटकती घँटी धीमे से हिलती है , पेंडुलम की तरह , फिर स्थिर हो जाती है । मैं अपने दुखते एड़ियों को जूते की कैद से निकालते सोचती हूँ , तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ?

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