घोड़ा सरपट दौड़ता , बेसुध , उसके फैले नथुनों से गरम भाप निकलती , महीन छोटे बुलबुले थकान के , लगाम से कसे जबड़े पर माँसपेशियाँ तिड़क जातीं । उसके अयाल हवा में लहराते , उसके खुर कब धरती पर पड़ते कब उठ जाते , धूल गर्द गुबार के चादर के पीछे घोड़ा दौड़ता सरपट । जान लगाये , छाती धौंके । बदन के रेशे पानी में उठते लहर से लहराते । और सवार ? सवार को होश कहाँ था ?
दर्द से चूर , थकान से मदहोश गाफिल , किस बात की खबर । बस इतनी भर की एक साँस बाद दूसरी आ जाये और छाती धड़कती रहे , सँभाल ले इन वहशी साँसों को । अब उसे इतना तक पता न था कि ऐसी धड़धड़ाती धड़कन उसकी थी कि गाल घोड़े के गर्दन से सटाये घोड़े के बेतहाशा हाँफ की खबर उस तक पहुँचाता था । जैसे अब जाकर उसके और घोड़े के शरीर का सुर एक था । थकन की डोर से बँधा , एक लय के साथ उपर उठता नीचे गिरता । सवार का शरीर नम था । घोड़े का शरीर और ज़्यादा नम था । डर एक धड़कन थी , पसीने में मिली जुली , खट्टी , तीखी । सवार घोड़े पर सवार था । डर सवार पर सवार था । पीछे बगूला उठता था । पीछे हाहाकार मचता था । आगे न जाने क्या था । इस घमासान युद्ध का कोई अंत ? कहाँ था ?
बस मायूसी ग़ायब है
2 months ago
