6/05/2008

सोने के नथ वाली मछली


धूँये का मोटा बम्बा आँगन के आसमान को उमड़ घुमड़ ढक रहा है । मुँह में , आँखों में उसके कसैलेपन से पानी आता है । पीछे आँगन में कुन्नी का चूल्हा जब तक जलता नहीं बरामदे तक ऐसे ही रोज़ धुँआ धुँआ शाम होती । अम्मा आँखों में कड़वाहट भरे चूल्हे के पास चुकु मुकु बैठतीं । लकड़ी के बुरादे को ठोक ठोक कर चूल्हे के पीपे में भरा जाता । ये रोज़ शाम की कवायद थी । आँगन के कोने पर चाँपाकल वाले चबूतरे के पास तुरत मांजे बरतनों का चमचमाता ढेर सजा रहता , कढ़ाई और देगची पर मिट्टी का लेवा लगाकर मुनिया की माई करीने से उलट कर कतार में सजा कर जाती। जबतक माई बर्तन माँजती तब तक मुनिया बहती नाक और झोलंगी फ्रॉक पहने कोने में पीढ़े पर बैठे गोल गोल ढेले सी आँख से टुकुर टुकुर ताकती । अम्मा लगभग रोज़ कांसे की कटोरी में लाई चना उसे पकड़ाती जिसके बाद अगले दस मिनट तक मुनिया पूरे मनोयोग से अपने मुड़ी को कटोरे में गोत लेती ।

बाबू शाम को अपनी टुटली साईकिल पर कैंची चलाता पिछवाड़े दरवाज़े से बाउजी की आँख बचा कर दाखिल होता । अम्मा उदास आँखों से हारकर उसे देखतीं , बुदबुदातीं .. जाने कब सुधरेगा । दिन में किसी वक्त शर्मा मास्टर साहब बता गये होते कि बाबू पिछले तीन दिनों से स्कूल नहीं आया ।

बाबू पिछले तीन दिनों से बुची बाबू के बगीचे के पोखर में डुबकी मार रहा है , करौन्दा तोड़ रहा है , हरी टहनी में सुतली पिरा कर मछली मार रहा है । किसी पेड़ के नीचे छाँह में उतारी कमीज़ से मुँह ढके औंधे मुँह झपकी मार रहा है। शाम को बदन मरोड़ता भोला चेहरा बनाये घर में घुसते ही निम्मी पानी पिला , थक के आये हैं के गुहार से अपने खूब पढ़्वैया होने का ऐलानिया डुगडुगी बजाता है ।

आज बाउजी हाथ गोड़ तोड़ेंगे , अम्मा हारी हुई हैं , निम्मी डरी दुबकी है । रात सच में बाउजी बेंत से बेमत्त पीटते हैं । अम्मा अंत में बरदाश्त न कर पाने की हालत में बाउजी के बाँहों पर झूल जाती हैं । निम्मी किवाड़ के पीछे से झट भाग के आती है । बाबू इतनी पिटाई को मुँह भींचे शहीदी बहादुरी से अब तक झेलता अम्मा के छाती से लगते ही हिलक कर रोने लगता है । बाउजी होंठों के कोरों से बह आये गुस्से के फेनिल झाग को आस्तीन से पोछते निकल जाते हैं | अब रात देर से लौटेंगे ।

अम्मा रोते डाँटते बाबू के पीठ पर मार से उभर आये निशानों पर हल्दी लगायेंगी , बाबू भी सुबक सुबक रोयेगा ।
रात खटिया पर लेटे , छत की कड़ी ताकते और खपड़े के छत के फाँक से झाँकते अंजोरिया रात के तारों को निहारते बाबू शेखी बघारेगा , अरे बाउजी की मार भी कोई मार है । देख निम्मा..... अपनी बाँहों की मछलियाँ निम्मा को दिखायेगा । दो साल में बाउजी से ज़्यादा ताकत आ जायेगी फिर देखना कैसे बाउजी बेंत उठाते हैं । निम्मी अविश्वास से मुँह बिचकायेगी ..तब इतना रो काहे रहे थे ? बाबू खिसियानी हँसी हँस कर बात मोड़ देगा । बुची बाबू का बगीचा जो चारों ओर ऊँचे बाड़ से घिरा है उसमें चौकीदार की आँख बचाकर घुस जाने की बहादुरी के किस्से सुन निम्मा हैरान होगी , पोखर तो कोई रहस्यमय पोखर है । सुना उसमें कोई दसेक किलो की मछली है जिसके सोने की नथिया चमचम चमकती है ।

हाँ रे बाबू सच देखा तुमने ?

हर बार सोने के नथ वाली मछली कुछ और बड़ी हो जाती है , कुछ और वजनदार हो जाती है । बाबू निम्मा की मछली सी आँख में अपने लिये खूब श्रद्धा देखता रात की मार भुला जाता है । सचमुच ।

6/02/2008

उसने और कुछ नहीं कहा

उसने और कुछ नहीं कहा
मैं देखती रही
इंतज़ार करती रही
सुबह हुई
दिन ढला
फिर रात हुई
बारिश में चिड़िया
भीगती रही

बालू में लिखा
मैंने घर
फिर तस्वीर बनाई
एक बगीचा
दो कमरे
बहुत सी खिड़कियाँ
ढेर सारी धूप
कुछ हवा
उसने लकड़ी से बनाया
उन तस्वीरों पर
एक क्रॉस
उसने और कुछ नहीं कहा

उस सफर पर
जिन पर चलकर
मैं पहुँचती भीतर
वहाँ तब उग आये थे
कुछ सूखे दरख्त
पसरी काली चट्टान
नदी का सूखा चौड़ा तल
कुछ काली मिट्टी
तलछट पर
दो बून्द पानी
ज़रा सी काई
और बस
मेरा मन
मेरा मन
उसने मुट्ठी भर रेत
झटके से
बिखेरा
उसने और कुछ नहीं कहा

मैंने सोचा
उफ्फ ये इंतज़ार
मैंने पर काटे उस परिंदे के
हवा में कलाबाजी खाई
धूप का एक गोला निगला
चील की तरह
ऊपर नीले आसमान में
दो गोल चक्कर काटे
सर पीछे फेंककर
ठहाका लगाया
उसने भौंचक
मेरी तरफ देखा
बड़ी दुखी उदास नज़रों से
देखा
पर अब भी
उसने और कुछ नहीं कहा

बस इतना भर हुआ कि
अब हमने जगहें बदल ली हैं
चील अब भी बेखटके
उड़ती है , सुनो !

5/29/2008

वो औरतें

वो औरतें प्रेम में पकी हुई औरतें थीं
कुछ कुछ वैसी जैसे कुम्हार के चाक से निकले कुल्हड़ों को आग में ज़रा ज़्यादा पका दिया गया हो
और वो भूरे कत्थई की बजाय काली पड़ गई हों
या कुछ सुग्गे के खाये, पेड़ों पर लटके कुछ ज़्यादा डम्भक अमरूद की तरह
जिसे एक कट्टा खाकर फिर वापस छोड़ दिया गया हो उनके उतरे हुये स्वाद की वजह से



वो औरतें डर में थकी हुई औरतें थीं
कुछ कुछ चोट खाये घायल मेमनों की तरह
जिबह में जाते बकरियों की तरह
जिनकी फटी आँखों से लगातार बेआवाज़ आँसू बहते हों
या कुछ उन जोकरों की तरह जो हर कलाबाज के करतब पर पाउडर पोते
ठोस ज़मीन पर खड़े अंदर ही अंदर भय से थरथराते हैं

इन औरतों ने पाया कि आखिर एक वक्त ऐसा आया कि
भय और प्रेम इनके अंदर एक हो गया
तब उन औरतों ने
एक जत्था बनाया
खड़िया हाथ में पकड़ा
और लिखा प्रेम अर्थात भय
फिर लिखा
भय अर्थात शून्य और
शून्य अर्थात प्रेम अर्थात मुक्ति


आसमान में अक्षर उभरने लगे
हर अक्षर पर
उनकी उँगलियों की पकड़
मज़बूत होती गई
आग की लपट उँची उठने लगी
भट्टी में शब्द पकने लगे
उन लपटों में आहूति देते एक सुर से गाया
इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम

ओ पवित्र अग्नि जो वर्तमान है हर सृजन में
ये मेरा शरीर , मैं समर्पित करूँ
अपनी आत्मा की गहराई से
इस अग्नि को ये शरीर जो अब मेरा नहीं
कस्मै देवाय हविषा विधेम


बोलती है एक खास लय में साँस रोके दमयंती जिसका नाम पड़ा है अपने
किसी बूढ़ी परदादी के नाम पर
उसी के जिनके डायरी के पहले पन्ने पर से पढ़ती है एक साँस में
दमयंती
कहानी उनकी जो किसी पिछली सदी में थीं
वो औरतें
और जो अगली कई सदियों तक रहेंगी
वो औरतें ...