धूँये का मोटा बम्बा आँगन के आसमान को उमड़ घुमड़ ढक रहा है । मुँह में , आँखों में उसके कसैलेपन से पानी आता है । पीछे आँगन में कुन्नी का चूल्हा जब तक जलता नहीं बरामदे तक ऐसे ही रोज़ धुँआ धुँआ शाम होती । अम्मा आँखों में कड़वाहट भरे चूल्हे के पास चुकु मुकु बैठतीं । लकड़ी के बुरादे को ठोक ठोक कर चूल्हे के पीपे में भरा जाता । ये रोज़ शाम की कवायद थी । आँगन के कोने पर चाँपाकल वाले चबूतरे के पास तुरत मांजे बरतनों का चमचमाता ढेर सजा रहता , कढ़ाई और देगची पर मिट्टी का लेवा लगाकर मुनिया की माई करीने से उलट कर कतार में सजा कर जाती। जबतक माई बर्तन माँजती तब तक मुनिया बहती नाक और झोलंगी फ्रॉक पहने कोने में पीढ़े पर बैठे गोल गोल ढेले सी आँख से टुकुर टुकुर ताकती । अम्मा लगभग रोज़ कांसे की कटोरी में लाई चना उसे पकड़ाती जिसके बाद अगले दस मिनट तक मुनिया पूरे मनोयोग से अपने मुड़ी को कटोरे में गोत लेती ।
बाबू शाम को अपनी टुटली साईकिल पर कैंची चलाता पिछवाड़े दरवाज़े से बाउजी की आँख बचा कर दाखिल होता । अम्मा उदास आँखों से हारकर उसे देखतीं , बुदबुदातीं .. जाने कब सुधरेगा । दिन में किसी वक्त शर्मा मास्टर साहब बता गये होते कि बाबू पिछले तीन दिनों से स्कूल नहीं आया ।
बाबू पिछले तीन दिनों से बुची बाबू के बगीचे के पोखर में डुबकी मार रहा है , करौन्दा तोड़ रहा है , हरी टहनी में सुतली पिरा कर मछली मार रहा है । किसी पेड़ के नीचे छाँह में उतारी कमीज़ से मुँह ढके औंधे मुँह झपकी मार रहा है। शाम को बदन मरोड़ता भोला चेहरा बनाये घर में घुसते ही निम्मी पानी पिला , थक के आये हैं के गुहार से अपने खूब पढ़्वैया होने का ऐलानिया डुगडुगी बजाता है ।
आज बाउजी हाथ गोड़ तोड़ेंगे , अम्मा हारी हुई हैं , निम्मी डरी दुबकी है । रात सच में बाउजी बेंत से बेमत्त पीटते हैं । अम्मा अंत में बरदाश्त न कर पाने की हालत में बाउजी के बाँहों पर झूल जाती हैं । निम्मी किवाड़ के पीछे से झट भाग के आती है । बाबू इतनी पिटाई को मुँह भींचे शहीदी बहादुरी से अब तक झेलता अम्मा के छाती से लगते ही हिलक कर रोने लगता है । बाउजी होंठों के कोरों से बह आये गुस्से के फेनिल झाग को आस्तीन से पोछते निकल जाते हैं | अब रात देर से लौटेंगे ।
अम्मा रोते डाँटते बाबू के पीठ पर मार से उभर आये निशानों पर हल्दी लगायेंगी , बाबू भी सुबक सुबक रोयेगा ।
रात खटिया पर लेटे , छत की कड़ी ताकते और खपड़े के छत के फाँक से झाँकते अंजोरिया रात के तारों को निहारते बाबू शेखी बघारेगा , अरे बाउजी की मार भी कोई मार है । देख निम्मा..... अपनी बाँहों की मछलियाँ निम्मा को दिखायेगा । दो साल में बाउजी से ज़्यादा ताकत आ जायेगी फिर देखना कैसे बाउजी बेंत उठाते हैं । निम्मी अविश्वास से मुँह बिचकायेगी ..तब इतना रो काहे रहे थे ? बाबू खिसियानी हँसी हँस कर बात मोड़ देगा । बुची बाबू का बगीचा जो चारों ओर ऊँचे बाड़ से घिरा है उसमें चौकीदार की आँख बचाकर घुस जाने की बहादुरी के किस्से सुन निम्मा हैरान होगी , पोखर तो कोई रहस्यमय पोखर है । सुना उसमें कोई दसेक किलो की मछली है जिसके सोने की नथिया चमचम चमकती है ।
हाँ रे बाबू सच देखा तुमने ?
हर बार सोने के नथ वाली मछली कुछ और बड़ी हो जाती है , कुछ और वजनदार हो जाती है । बाबू निम्मा की मछली सी आँख में अपने लिये खूब श्रद्धा देखता रात की मार भुला जाता है । सचमुच ।
