किसी ब्लॉग का कंटेंट मुझे पसंद न आये तो मैं क्या करूँ ....
फ्लैग कर दूँ?...
अपने ब्लॉग पर विरोध दर्ज़ करूँ और उम्मीद करूँ कि लोग मेरी बात से सहमति प्रगट करें ?
ब्लॉग बैन करने की करवाने की कोशिश करूँ?
उस ब्लॉग को नज़र अंदाज़ करूँ?...
ब्लॉग पब्लिक डोमेन है । इनकी गलियाँ अगर मुझे नहीं भाती मैं वहाँ नहीं जाऊँगी। अगर मेरे घर में कोई गन्दगी फेंकता है मैं चुपचाप उसे कूडे में डालूँगी , लोगों को बुलाकर उसका प्रदर्शन नहीं करूँगी। लेकिन अगर सार्वजनिक तौर पर कोई गाली दे तब? मैं विरोध करूँगी । अभद्र भाषा का प्रयोग किसी भी स्थिति में उचित नहीं। लेकिन बैन भी उचित नहीं। जब संजय बेंगाणी और बाज़ार का मसला हुआ था तब और इस मसले में सिर्फ डिग्रीज़ का ही फर्क है लेकिन किसी के भी बुरा लगने की हद की रेखा अलग हो सकती है। तब जो सही था .. बैन न करना वही आज सही कैसे हो सकता है। भड़ास ने जो किया उसका सिर्फ एक जवाब है ..वहाँ न जाना । किसी इशू को नॉन इशू बना देने का सबसे सही तरीका है उसके असर को खत्म करने के लिये खास तब जब अगला ऐसी भाषा और नीयत पर उतर आये जिसमें गंदगी के अलावा कोई और तर्क न हो। उसी लेवल पर गिरना उसके जैसे ही बनना है और कोई और तरीका सिर्फ भड़ास को हाईलाईट ही कर रहा है।
फिर क्या ? चुपचाप फ्लैग करें । वैसे ये भी किसी तरीके के ब्लॉग होलोकौस्ट जैसा हो जायेगा। मेरे गुट ने आपको फ्लैग किया और आपके ने मुझे। अंतत एग्रीगेटर्स पर कोई ब्लॉग नहीं बचा .. ऐसा बचकाना खेल क्या साबित कर देगा। कोई रिस्पोंसिबल बिहेवियर की परिभाषा तो नहीं ही लिख देगा । शायद फिर एक ही रास्ता बचता है .. अपने ब्लॉग पर विरोध दर्ज़ कीजिये .. आपकी बात सही है तो समर्थन खुद बखुद मिलेगा , मिलना चाहिये ( ये उम्मीद कि लोग फेंससिटर्ज़ नहीं हैं , विज़डम वाले लोग हैं .. बार बार इसके ओपोसिट साबित होने के बावज़ूद उम्मीद अब भी बरकरार है)
और जैसा यशवंत ने लिखा ..किसको- किसको बैन करेंगे ? ऐसे ब्लॉग हाईड्रा ब्लॉग्स हैं , किसी और नाम से उग आयेंगे। आज कम संख्या में हैं .. आपकी नज़र पड़ती है ..कल इतने होंगे कि आपका ध्यान तक न जायेंगा .. फिर किसको बैन करेंगे .. कोई अगर सार्वजनिक टॉयलेट बनना चाहता है .. बनने दें .. टॉयलेट दीवार पर लिखी भद्दी अश्लील ग्राफिटी बनना चाहता है .. बनने दें .. ये उनकी मानसिक दशा दर्शाता है ..हमारी नहीं । हमारी इच्छा कुछ बढ़िया सार्थक पढ़ने की है तो हम वैसी जगह जायें जहाँ ये मिलें , किन्हीं और जगहों से क्या वास्ता ? नालियों की तरफ नाक बन्द कर निकल लें.. लेकिन एक संयत विरोध दर्ज़ करने के बाद।
विरोध करें बैन नहीं। मनीषा और मसिजीवी के साथ इस विरोध में हम सब साथ हैं।
वक़्त की पीर बखानती कविताएँ : मंगलेश डबराल
8 months ago

