7/31/2007

शिकार, जँगल और सूखी धरती

मंगलवारी हाट का दिन था । लाल मोर्रम की ज़मीन रात की बरसा से भीगी थी । सागवान के पत्ते से पानी अब भी टपटप चू रहा था । नीले चिमचिमी को रस्सी से बाँधकर थोडा आड बना दुकानें सज रही थीं ।पेड के तने से लाल चींटों की मोटी कतार व्यस्त सिपाहियों सी मुस्तैदी से काली लकीर खींचती थीं । नीचे ज़मीन पर भुरभुरी मिट्टी के टीले में फिर अचानक से बिला भी जातीं । किसी के पाँव पर चढ गये तो छिलमिला कर उछलने का औचक नृत्य भी दिख जाता ।

मंगरू टोपनो , शिबू कुजूर , बालू , बिरसा ,सब के सब बझे थे । छोटी मछली , रुगडा , कुकुरमुत्ता , केकडा पकडेंगे बजार के बाद । जंगल में आग जला पकायेंगे । हडिया के संग खूब पकेगा छनेगा । पर पहले कमाई तो हो ले । कमर के फेंटे में बाँसुरी बाँधे मँगरू छन छन इंतज़ार करता है । इतवरिया और फूलटुसिया हथेलियों से मुँह दाबे हँसती छनकती मुड मुड के देखती हैं । बालों में बुरुंश के फूल कान के पीछे लटक लटक जाते हैं । पाँवों के कडे काले बादल में बिजली की चमक । मंगरू के दाँत भी चमकते हैं , बिजली की कौंध से ।

हाट की भीड बढ रही है । जमीन पर बिखरी हैं चीज़ें , टोकरी , रस्सी , सूप और दौरी , सींक के झाडू , बालों का नाडा , सीप मोती के हार , जडी बूटी , सूखी मछली , सुतली से बँधे साग के गट्ठर , जंगली डंठल , पत्ते के दोने में भुने हुये फतिंगे और भूरे चींटे , मोटे रस में पगे बेडौल देहाती चींटी सनी मिठाईयाँ , घडियाँ और काले रंगीन चश्मे , छींटदार कपडे और न जाने क्या क्या । गाँव के गिरजे का पादरी फादर जॉन एक्का अपने उजले चोग़े को उठाये ,संभाले गुजर जाता है । पिछले इतवार ही तो मारिया कुजूर के बच्चे का बपतिस्मा कराते बच्चे ने पेशाब की धार से नहला दिया था । । बच्चे को लगभग गिरा ही दिया था फादर ने । तब प्रभु इसु की दयानतदारी कहाँ गायब हुई थी । औरतों का झुंड मुँह बिचकाता है ।

भनभन भनभन आवाज़ इधर उधर घूमती है इस छोर से उस छोर । तेज़ तीखी , मोलभाव करती ,हडिये के नशे में झगडती , उकसाती , दबे छिपे हँसते किलकते और फिर दिन ढलते थकी हारी ,बेचैन थरथराती ,बुझते ढिबरी के काँपते सिमटते लौ सी । अँधेरा होते ही सब सिमटता है । अलाव की रौशनी में उजाड पडे चौकोर गुमटियों के निशान , कागज़ की चिन्दियाँ , पत्तल और कुल्हड । रेजगारी की छनछनाहट ,नोटों की करकराहट । कुछ बुझे उदास चेहरे ,धूसर मिट्टी में सने पैरों के तलवे , रबर की चप्पलें और जंगल में सुनसन्नाटे में खोते पाते अकेले रास्ते । जंगल का जादू कहीं बिला गया है । सच कहीं बिला गया है । जंगल अब कुछ नहीं देता । पानी सूख गया है । पत्थर से आग निकलती है । जानवर सब भी कहीं लुकछिप गये हैं । कोई शिकार बरसों से नहीं हुआ है । तीर और भाले किसी और ही समय के खिलौने हैं । सिंगबोंगा ,सूरज देवता भी रूठ गया है तभी आग बरसाता है । मुँडा ,खडिया , ओराँव ,सब आसमान ताकते हैं । पानी टप टप चूता है आसमान से लगातार लगातार । अंधेरा परत बनाता है इतना इतना कि हाथ को हाथ न सूझे । गाँव के लडके अब अंधेरा पीते हैं । दिन भर रात भर । और कुछ जो करने को नहीं । इतना घुप्प अँधेरा है कि सपना तक नहीं दिखता । मँगरू बाँसुरी बजाये तो भी नहीं ।

हाट की दुकानें हर मंगलवार घटती जाती हैं । ट्रक पर हफ्ते आलू और प्याज़ और बीडी के बंडल के साथ दो तीन लडके भी निकल जाते हैं पैर लटकाये ,थोडी सी लाल मिट्टी नाखूनों में दबाये । एकाध लडकियाँ भी , कलाई और माथे के गोदने को छुपाये ,शहर में चौका बर्तन और मजूरी करने । गाँव का जँगल सच बिला गया । अब तो पूरा शहर ही जँगल है जहाँ आदमी ही शिकार करता है और आदमी ही शिकार होता है ।



लाहा पाहिल धरती लोसोत गे

थो थोले तहेकान

सेकाते धरती रोहोर एना

लोसोत हावेत लागित पँखी राजा

होये माय बेनाव केत

ओना हादार होये तेगे रोहोर एना

(शुरु में धरती दलदल थी

फिर इतनी सूखी कैसे हुई

धरती सूखे सो पक्षी राजा ने

बनाई हवा

और उसकी फूँक से सूखी धरती )

7/24/2007

पार्क में

लडकी हँस देती है जाने किस बात पर । लडकी हँसती है हमेशा जाने किस बात पर । लडका हैरानी से देखता है उसे । ऐसी तो हँसने वाली कोई बात नहीं कही फिर लडकी हँसी क्यों । जब भी लडकी हँसती है लडका हैरान हो जाता है । मैं कोई जोकर हूँ क्या , कुछ कुछ नाराज़गी से कहता है । लडकी कुछ और हँसती है ,संतरा छीलती है , बिखरे बालों को कानों के पीछे समेटती है । लडका सिर्फ देखता है और सोचता है । लडकी पूछती है ,क्या कर रहे हो ? लडका कहता है , सोच रहा हूँ । लडकी इस बार नहीं हँसती । लडकी इसबार हैरान हो जाती है , मेरे साथ हो फिर भी सोच रहे हो ?

पार्क के ठीक पीछे से ,जहाँ से कीकर के पेडों का जंगल शुरु होता है कोई पुरानी भूली बिसरी , लाखौरी ईंटों की मेहराबदार दीवारों की काई लगी इमारत में बंदरों का एक जोडा खोंकियाता है । अधगिरी टूटी दीवार के सहारे टिका , खादी कुर्ते और नीली जींस में भूरी दाढी वाला वो चित्रकार शायद लडके और लडकी की ही तस्वीर बना रहा हो या फिर क्या पता उसका चित्त बंदरों के जोडे पर जुडा हो । सिगरेट की अनगिनत टोंटियों को एहतियातन समेटता वो मुस्कुराता है । उँगलियों को खोल बन्द करता आँखें मूँद लेता है । लडकी होंठों से उँगलियों के रस को पोछती है । लडके को देख हँस देती है । लडका इसबार हैरान नहीं होता । लडका इसबार सोचता भी नहीं । लडका इसबार लडकी को देखकर सिर्फ हँस देता है ।

7/21/2007

रात पाली के बाद

रात की पाली थी । बारह बजते थे लौटते लौटते । फैक्टरी का साईरन दिन में और रात की पाली खत्म होने समय तक कितनी मर्तबा बज जाता था इसका हिसाब फैक्टरी गेट से कुछ दूरी पर पान दुकान की गुमटी वाले बजरंगी को जबानी याद था । ठीक साईरन बजने के घडी भर पहले पता चल जाता । पाली खत्म होने वाला साईरन अलग और शुरु होने वाला अलग । खत्म होने वाले पर बजरंगी की पान बीडी की बिक्री बढ जाती । रेले का रेला , हुजूम का हुजूम विशाल गेट के मुहाने से अजबजाये बाढ की तरह बह आता । साथ साथ आती पसीने ,थकन और ग्रीज़ की खट्टी बिसाई महक । कुछ भीड छिटक कर गुमटी की तरफ सरक आती । कुछ और आगे की टीन टप्पर की दो बेंच वाली चाय दुकान पर जमक जाती । रात पाली के बाद की रुकी ठहरी भीड बडी छेहर सी होती । बस ऐसे ही लोग जो जाने किस वजह घर की बेचैनी में नहीं होते । बीडी का सुट्टा , मुट्ठी में भरे ,छाती धूँकते खाँसते काँखते रहते । दिन भर की बढी दाढी की छाया चेहरे को फीका मलिन कर देती । घडी भर बेंच पर बचैन सिमटते सिकुडते फिर अलस अँगडाई से देह तोडते , झुके कँधों को खींचतान कर सीधा सिकोडते अपने साईकिलों पर हाथ टिकाये अँधेरी सडक को पल भर तौलते फिर ठंडी हवा मुँह से छोडते साँस भरे दम भर को पैडल मार निकल पडते दस पंद्रह की भीड में । हुहुआती सनसनाती हवा में अँधेरे को चीरते बढ जाते अकेली सडकों पर । भीड छँटती जाती , एक एक करके । सेक्टर के मोड पर मालती लता की झाड अपनी महक छाप छाप छोडती तो लगता कि बस अब आ ही पहुँचे । घर में धीमी रौशनी में एक महफूज़ दुनिया इंतज़ार करती है । खाना और गर्म बिस्तर । बदन अब भी टूटता है । नींद उतरती है आँखों और मुँह के रास्ते , खुली बडी जम्हाई में , आँख के निंदाये कोरों के आँसू में ।

दरवाज़ा खुलने में ज़रा सी देर पर मन लहक जाता है गुस्से से । दिन भर की हाड तोड खटाई और ये औरत पैर चढाये फैल से सोती रहे ? दिनभर की खटती औरत , बच्चों से सर फोडती ,चूल्हे से बदन धिपाती अभी घडी भर को ही तो आँख लगी थी ज़रा सी । आँख मलते धक्क से उठती है , धडफडा कर भागती है दरवाज़ा खोलने । पैर लटपटाते हैं छापे वाली साडी में ,चर्र से किनारी फटती है और दरवाज़े पर ही गाली की एक बौछार होती है सो अलग । पर ये तो रोज़ की कहानी है । खाना परोसती है , पँखा झलती है , नींद से झुकती हिलती है ,कुनमुनाते बच्चे को एक हाथ से थपथपाती है । मर्द अलस पड जाता है मसहरी लगे चारपाई पर । औरत निंदायी निंदायी पानी का ग्लास थामे निढाल आती है बिस्तर पर । रसोई समेटना बाकी है अभी , दही जमाना बाकी है अभी , मुन्नु की आखिरी बोतल बनाना बाकी है अभी । गँधाते फलियों और कपडों के ढेर को सरका कर जगह बनाते औरत सोचती है उसकी रात पाली कब खत्म होगी ।