1/26/2008

आई अक्यूज़ ... फिर भी मुझे गुस्सा नहीं आता

एमिल ज़ोला ने 1898 में अल्फ्रेड ड्रेफस के बचाव के लिये लिखा था “ज़ाकूज़ , आई अक्यूज़ , मैं इलज़ाम लगाता हूँ “.... और मुझे अभी ऐसा ही लग रहा है कि जब मैं अक्यूज़ करूँगी तो मेरी उँगली किधर उठेगी ... उस तरफ जहाँ कोई स्त्री अगर पढ़ती है तो किसी को भय उपजता है ( क्यों भला , कितने इनसेक्योर हैं आप , कितनी छोटी क्षुद्र आकाँक्षायें और भय है आपकी कि आप ऑफिस से थक हार कर घर आयें और चाय की जगह नेरूदा की कवितायें मिले , तो आप डर जायें ? वैसे भी नेरूदा कितना पल्ले पड़ेगा , जीवन की किताब तो हम सब पढ़ ही रहे हैं , इतना ज्ञान काफी नहीं ? इससे ज़्यादा ज्ञान की ज़रूरत आपको नहीं लेकिन अगर किसी का क्षितिज़ ज्यादा फैलाव लिये है , कोई दूसरी दुनिया की समझ किसी और को है , किसी का अंतरलोक इतना विशाल है तो आप क्यों डरते हैं ? या अगर कहें डर वाजिब है तो ज़्यादा समझ आता है । आपकी फ्यूडल मानसिकता को क्वेशचन जो किया जा रहा है )

या उस दूसरी तरफ जिस तरफ वो लोग हैं जो इस भय के हास्यास्पद अक्सेपटेंस में ह्यूमर तलाश रहे हैं । नीचे वाली सीढ़ी से चढ़ कर औरत ऊपर , आपसे ऊपर न आ जाये ऐसा ही कुछ भय जिसे हँसी से छुपाया जा रहा है , जैसा कुछ भास हो रहा है । पॉलिटिकल और जेंडर करेक्टनेस के परे ज्ञान और विज़डम की बात , नोंकझोंक और चुहलबाजी ? अपने ऊपर हँस लेने की कला कौशल ? क्या है ये ?

मुझे अमूमन गुस्सा इन चीज़ों पर नहीं आता । हमें हमारा हक चाहिये जैसी नारेबाजी में मेरा विश्वास नहीं । मैं किसी पुरुष के बराबर हूँ मैं ऐसा मानती हूँ ऐसा व्यवहार करती हूँ । ये कोई लड़ाई नहीं सिर्फ अ स्टेट ऑफ बीईंग है । मेरे लिये । किसी और के लिये कोई और तरीका होगा खुद को साबित करने का । उससे मुझे उज़्र नहीं । कोई जरमेन ग्रीयर और सिमोन बोवुआ वाली फेमिनिस्म की बात भी नहीं करना चाहती । लेकिन कोई पुरुष अगर कहे , तुम औरत हो अपनी औकात में रहो , रसोई में रहो , अपने मन को मार कर रहो , बुद्धि और ज्ञान से दूर रहो , दुनिया से दूर रहो .... तो मैं कहती हूँ पहले आप अपनी औकात को पहचाने .... अपनी इनसेक्यूरिटी को पहचानें , अपनी क्षुद्रता को पहचाने , अपने भय का सामना करें , अपने स्व का सामना करें ।

ये हम पर छोड़ दें कि हम तय करें हम क्या हैं कौन हैं । कि हम औरतें सेकेंड सेक्स हैं तो इसका ये मतलब नहीं कि आप पहले हैं , कि कोई खेल एक्स और वाई क्रोमोज़ोम्ज़ मात्र का ही है , कि आपकी बेटी तो घर की राजदुलारी है लेकिन आपकी पत्नी मात्र रसोई की रानी है ? आप ये सब तय नहीं करेंगे कि आप किसको क्या हक देंगे , कितनी ज़मीन देंगे । कि ये तय करने का अधिकार हमारा होगा कि हम क्या और कहाँ तक लेंगे । डरें मत । हमारे अंदर एक उदारता है । क्या आपके पैर के नीचे की ज़मीन खिसक रही है ? क्या आपको लगता है कि आधी दुनिया के बाशिन्दे पूरी दुनिया पर राज करेंगे ?निश्चित करेंगे , तब आप चाय भी बनायेंगे और अगर औकात रही तो नेरूदा भी डिसकस करेंगे ... हमारे साथ । तब तक के लिये ... गुडलक !



(ये पोस्ट बिना स्माईली वाली पोस्ट है और न तो पॉलिटिकल न जेंडर न मॉरल ...किसी भी करेक्टनेस की कोई कहानी नहीं है यहाँ । )

12 comments:

Lavanyam - Antarman said...

प्रत्यक्षा ,
हर नारी पर स्वयं को देखने की जिम्मेदारी है --
नारी हो तुम, अबला नहीं
सबला हो तुम, हारी नहीं

vijayshankar said...

अगर आप मुखौटा ब्लोगर नहीं हैं तो गालिब के बाद यकीनन मेरे सबसे प्यारे शायर दुष्यंत का एक शेर अर्ज़ है-
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रोशनी में आता हूँ.

यह वही ग़ज़ल है-
मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ.

तब ऐसी नाराज़गी कैसी?

Kakesh said...

आपका अंदाज अच्छा लगा और लिखा हुआ सोचने को बाध्य कर गया. एक पुरुष होते हुए शायद पहचान नहीं पाया कि उस साधारण सी बात के इतने मतलब निकाले जा सकते हैं. यह हमारे पितृसत्तात्मक संस्कारों की ही परिणति है शायद...सीख रहा हूँ ..बदल रहा हूँ ..शायद सुधर जाऊँ कुछ....

Pramod Singh said...

नैतिकता और धर्म को ध्‍यान में रख रही हैं?.. इस तरह से गुस्‍सा करने का कोई तुक है?..

अभय तिवारी said...

वाजिब है..

Tarun said...

अब समझ आया, प्रत्यक्षा को गुस्सा क्यों नही आता। लेकिन बात आपकी सही है हमतो पुरूष और स्त्री दोनों को एक सिक्के के दो पहलू मानते हैं, एकदम बरोबर। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नही दूसरे के बिना पहले का कोई मूल्य नही।

Parul said...

blog jagat me aakar kabhii kabhii taqleef aur dukh hota hai..hamaari saamanya zindagi ki apekshaa YAHAN STRII V PRUSHVAAD kuch zyaada maayne rakhtaa hai... shaayad.

अनिल रघुराज said...

प्रत्यक्षा जी, इतना साफ-साफ, बेलाग अंदाज आपका पहली बार देख रहा हूं। वरना तो छवियों की मरीचिका में खो जाता था।
जबरदस्त। सही मौके पर सही बात। पूरी तरह सहमति।

जो कर सकती है वह स्त्रीयां ही कर सकती है । said...

भारतीये समाज मे जितना भी पतन हो रहा हैं या हो चूका है उसके लिये स्त्री , उसकी सोच , उसके वस्त्र , उसकी नौकरी , उसके विचार जिमेदार है । कल हम गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे हैं पर हमारी मानसिकता आज भी वाही है जो ६० साल पहले थी । आज भी लोगो की सोच मे स्त्री को एडजस्ट करना होगा अपने आचार विचार को पुरुष के biological disorder के साथ । और अगर वह ऐसा नहीं करेगी तो वह समाज मे सुरक्षित नहीं है । नैतिकता का जीमा स्त्री का हैं क्योकि पुरुष बेचारे को तो इश्वर ने biological disorder के साथ पैदा किया हैं । वह बेचारा तो कहीं भी स्त्री को देखता है तो यौनाकर्षण का शिकार हो जाता है । स्त्री की तस्वीर देख कर ही यौनाकर्षण का शिकार पुरुष क्या कर सकता है । जो कर सकती है वह स्त्रीयां ही कर सकती है , ताकि और biological disorder वाले प्राणी पैदा ही ना हों .

Beji said...

In complete agreement!!

Sanjeet Tripathi said...

गज़ब!!
आक्रोशित भी होती हैं आप ये आज मालूम चला!!

Mired Mirage said...

बिल्कुल सहमत हूँ ।
घुघूती बासूती