1/10/2008

मछली और सुख

मछली के गलफड़ में फँसा काँटा देखा है कभी ? जितना गहरे जाती है बचने को उतना अँदर धँसता जाता है । बस ऐसे ही काँटा धँसा है छाती में , हर साँस पर भारी होता जाता है ।इतना बोझ कैसे ढोयें दिल चाक चाक होता जाता है । औरत छाती पर हाथ धरे बात करती है अपने आप से । कभी उस छाया से भी जो दीवार से छत और छत से रौशनदान होते खिड़की से बाहर फिर अंदर करती रहती है । औरत सीधी है । उसे सब बातें सीधी दिखती हैं । कुछ टेढ़ा दिखता है तो भी झट से सीट साट करके सीधा कर लेती है जितना बन पड़े उतना भर । आदमी सीधा नहीं है । खूब खूब टेढ़ा है जलेबी जैसा । और जब नहीं है तो अपने किसी स्वार्थवश नहीं है । औरत कितनी भी सीधी क्यों न हो इस बात को ,औरत के पीठ पर भी आँख , वाली बात से इस बात को समझ जाती है । फिर भी इस सीधे टेढ़े का खेल चलता है , उसका सुख और इसका दुख चलता है । सुखी होने के चरम सीमा पर भी हर बार बिना नागा दुख की नदी औरत की छाती को बहा ले जाती है । फिर सब ,पेड़ घर मवेशी टप्पर , सब उपला जाते हैं बहते पानी पर । सपना अपना संग साथ सब तिनके सा डूबता उतराता है । आदमी निर्विकार देखता है । औरत सोचती है ये देखता तो है पर इसे दिखता क्या है ? कुछ दिखता है भी कि नहीं ? मैं दिखती हूँ ? मेरी तकलीफ दिखती है ?

आदमी भात खाते सोचता है अब एक बीड़ी । फिर खुले आसमान के नीचे बाँहों पर सिर धरे खटिया पर चित्त लेटे तृप्ति की साँस लेता है । औरत अंदर कोठरी में खाली ढेंगराये बरतनों से खुरचन समेटती निकालती मुट्ठी भर भात । प्याज़ और मिर्चें के संग खाती उदास होती है । छाती पर पत्थर लटकाये भारी कदमों से डोलती है कुछ पल इधर उधर ,रोकती है छोड़ती है साँस भरती उसाँस देखती है नज़रें एक पल चारों दीवार ! सब सर्द है सब ठंडा । सोचती है काश सरल होता मेरा मन । जैसे सीधी हूँ मैं वैसा सीधा होता मेरा मन , हर वक्त उभचुभ न करता । होने न होने के द्वंद में न फँसता । भात और तरकारी खाकर सुखी रहता । इस न सोचने , न देखने वाले आदमी के संग सुखी रहता । काश । मन उस फुदकती गौरैया जैसा होता । सिर्फ दाना चुगता खुश होता । क्या सोचती होगी ये गौरैया । न स्मृतियों का भार , न भविष्य की आशंका ? न आज के व्यर्थ होते जाने का बोध । न कुछ चुकते जाने का दर्द । औरत क्षण भर सोचती है , लाल काँच की चूड़ियों को सूखी कलाई पर आगे पीछे करती है फिर हँसुआ लेकर बैठ जाती है । मछली काटती है , सिल पर सरसों का मसाला पीसती है , दो बून्द आँसू उस मसाले में गिराती है । रात आदमी मछली के झोल के साथ भात खाता डकारता है । आज मछली बहुत अच्छी बनी ।

6 comments:

Pramod Singh said...

अच्‍छी बनी मछली की तरह काश कभी पूर्णविराम भी ढंग से बने होते.. मतलब ढंग से टंगे होते?

अनूप भार्गव said...

अगर इस चित्र को आदमी और औरत का
’जनरलाइज़ेशन’ न माना जाये तो बहुत अच्छा है ।
आदमी और औरत के नाम जोखू और ईश्वरी की जगह प्रतीक और शिल्पा हो जाने से चित्र कितना बदल जाता है (सभी नाम काल्पनिक हैं) :-)

Parul said...

aapke lekh padhkar aksar sochti huun aap Bihar ki hain,Up ki,yaa Jhaarkhand?

मीनाक्षी said...

न स्मृतियों का भार , न भविष्य की आशंका ? न आज के व्यर्थ होते जाने का बोध । न कुछ चुकते जाने का दर्द ।
काश ऐसा हो पाता !!

Arun Aditya said...

कविता जैसा है आपका यह गद्य। शायद यह विषय की मार्मिकता ही है जिसने गद्य में कविता जैसी अन्तः लय पैदा कर दी है.

Arun Aditya said...

कविता जैसा है आपका यह गद्य। शायद यह विषय की मार्मिकता ही है जिसने गद्य में कविता जैसी अन्तः लय पैदा कर दी है.