2/19/2010

कुसुम कुमारी कुँज बेहारी


सपने के भीतर एक और सपना था , पानी पर तैरती मरी मछली के पेट जैसा , पीला फीका और निस्तेज़ । ऐसा नहीं था कि जागी दुनिया कुछ शोख चटक थी लेकिन सपनों से एक दूसरे उड़ान की कल्पना और उम्मीद तो रखी ही जा सकती थी । शहरज़ाद की हज़ार कहानियों वाली अरेबियन टेल्स की तरह हर रात का नया सपना था और हर सपना दूसरे से अलग ।

अब मसलन कल पिता को देखा सपने में , मुस्कुराते हुये । जबकि असल ज़िन्दगी में कभी मुस्कुराये नहीं । रोते बिसुरते पैदा हुये और वैसे ही गये । या फिर तीन दिन पहले किसी स्कूली साथी को देखा जिसका नाम तक याद नहीं । याद तो शकल भी नहीं , सिर्फ सपने में आभास था कि साथी है । हफ्ते भर पहले किसी नवजात शिशु को देखा और महीने भर पहले खुद को मरते । पिछले साल सिर्फ दूसरों के सपने देखे । अच्छे बुरे डरावने दयनीय । उसके पिछले सिर्फ अपने देखे थे । हर सपने में कोई छोटा सा भी रोल सही । वैसे ही जैसे हिचकॉक अपनी फिल्मों में किसी एक सीन में दिख जाता । सपनों की एक आर्काईव बना रखी है । टैग्ड अंड प्रॉपरली फाईल्ड । जैसे उसके लाईब्रेरी में होता है । सब तरतीबवार क्रॉनॉलिजिकल ऑर्डर में । अँख मून्द कर भी वो कैसी भी शेल्फ तक किसी भी किताब तक पहुँच सकता है ।

मसलन अगर कहा जाय सिंक्लेयर , तो उसे पता है कि पहले सीधे जाकर बायें तरफ वाली दूसरी खिड़की के बगल से मुड़ कर फिर दस कदम चलने के बाद बायें मुड़ते ही जो शेल्फ है उसमें सब “स” वाले लेखक हैं । सिंक्लेयर तीसरी रैक पर बीच में है । उसके बगल में एक तरफ डेविड सिल्कॉक्स हैं और दूसरी तरफ रॉस स्कोगॉर्ड , उनके कुछ बाद में सूसन सॉनटॉग हैं । इसी तरह हिंन्दी सेक्शन में उसे किताबें पता हैं । जुलूस कहो तो आँख मून्दे रेणु तक जा पहुँचेंगे और हैदर कहो तो प्यार से मुस्कुराते कारे जहाँ दराज़ छू लेंगे ।

सपने भी उसी तरह फाईल्ड हैं। पत्नी बैठी सेम की फली, रात के खाने के लिये , काटती कहेगी , पता है बच्ची फुआ का पोस्टकार्ड आया था , बेचारी एकदम अकेली पड़ गईं हैं । पत्नी का बोलना चालू रहता और इधर इनके दिमाग में चार साल तीन महीने और आठ दिन पहले देखे सपने में बच्ची फुआ का रंगीन साड़ी और हाथ हाथ भर लहटी में इतराते डोलना याद आता है । अब मज़े की बात है कि फुआ बेचारी बाल विधवा हैं । गौना के समय पति साँप काटे से सिधारे । तो जबसे साड़ी पहनने की उम्र हुई सफेद के सिवा दूसरा कोई रंग बदन को छुलाया नहीं |

सपने भी देखो कैसी करामात दिखाते हैं । जो होगा नहीं वो दुनिया भी दिखती है या वो ही दिखती है । सब अतृप्त इच्छायें , अपनी सबकी । सब नसीब !

किताबें पढ़ने का शौक भी इसी तरह उपजा । सिनेमा देखने का भी और सपने देखने का भी । अब सब गड़मड़ होता है , किताब सिनेमा सपना । सपने में भी कोई बूढ़ा मछली मारने समन्दर में निकल पड़ता है , किताब का अनाम पात्र डोंगी में उतराता है और खुद किसी दरियाई घोड़े से रास्ता पूछते भूलते भटकते पसीने से तरबतर जागते हैं , हाथ आती एक भी मछली नहीं है । पत्नी चाय का कप चेहरे पर ठेलते बुड़बुड़ाती है , रात में सपना ? दिन में सपना? पर उसका क्या बुड़बुड़ाना और क्या हँसना । उसके नसीब में सपने कहाँ ?

लाईब्रेरी के टूटे काँच वाली खिड़की पर फट्टा ठोकते कीलों की गिनती याद रहती है । ये याद रहता है कि “ब” वाली शेल्फ खिड़की के पास है और बारिश के दिनों में झपाटे से पानी हवा के साथ किताबों पर पड़ती है । बटरोही , बालशौरी रेड्डी , बाबू देवकी नंदन खत्री , बिमल मित्र और बंकिम बाबू ..सब भीग कर गलगला गये हैं । ऊँची छत पर शहतीर से टिका लम्बे डैने वाला पँखा घों घों आवाज़ से धीमे धीमे घूमता है । ठीक नीचे मेज़ पर फैलाये भीगे किताबों के पन्ने फड़फड़ाते हैं । उनके भीतर कैद सपना हुलकता है , कहता है देखो मुझे देखो , किताब कहती है पढ़ो पढ़ो । पत्नी आजिज आ कर कहती है , मैं मायके चली , तुम सँभालो अपना राजपाट ।

किताबों के बीच , सपनों के बीच आदमी सोचता है , यही ठाठ हैं अपने , यही सपनों की यारी, यही मेरे अजीज़ मेरे हमनफ़स हमनवां । बड़े प्यार से बड़े जतन से किताबों को पोछता छूता है । ऐसी खुशी ऐसी ! जैसे मीठे शराब के नशे की धीमी दम तोड़ती नब्ज़ उतरती उदासी । नसीब में सपना है , किताब है , सपने का सपना है ..

बाबू देवकी नंदन खत्री “कुसुम कुमारी” के बीच से झाँकते आँख मारते हैं , एक और गया , गुलफाम !

5 comments:

Arvind Mishra said...

एक स्वप्न मीमांसा स्मार्ट इंडियन के यहाँ चल रही है .....

डॉ .अनुराग said...

उम्र के साथ शौंक कम नहीं होती.....अजीब तरह से घुल मिल जाते है .... सपने आर ई एम् ओर नॉन आर ई एम् स्लीप के दरमियाँ मेमोरी सेल को इफेक्ट करने लगते है पर किताबे ....बीच बीच में बाहर आकर जिंदगी का रिफ्रेश बटन दबा जाती है .....
एक ओर "प्र्त्यक्षाना "अंदाज....

अनिल कान्त : said...

लाजवाब अंदाज़ !

सुशीला पुरी said...

सपने के भीतर भी एक सपना पलता है .

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 20.02.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/