12/03/2008

आज के समय में सब भारमुक्त हैं ..


इतना चौकन्ना रहें ? इतना जितना दो हज़ार साल पहले थे , गुफाओं में ? जंगली नरभक्षी जानवरों की गुपचुप मारक पदचाप से ? उफनते नदी के पानी से ? बेकाबू , बेलगाम आग़ से ? चौकन्ने चौकन्ने , आतंकित ? सहमे ? फिर हमने डर काबू किया , जैसे आग किया , पानी की , तूफानी थपेड़े और कबीलाई हमले किये , प्यार नफरत और मृत्यु की , बीमारी की । हम विकसित हुये । चार पैरों से दो पैर वाले हुये , बड़े माथे से सारिक मस्तिष्क वाले सोचने समझने तौलने वाले बुद्धिमान हुये । जंगल से शहर , देहाती से नागरीय ..क्या क्या नहीं हुये सिर्फ चौकन्ने नहीं हुये ।

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फिर बम फूटे , आगजनी हुई , गोली चली । लोग मरे , पुरुष नारी बच्चे । गलत समय में गलत जगह ? या सही समय में सही जगह । हम बचे , वो मरे ..गनीमत गनीमत । जब कल वो बचेंगे , हम मरेंगे तब उनकी गनीमत । मन ऐसा ही सुन्न हुआ । न गुस्सा , न दुख , न क्षोभ न आक्रोश । ऐसे समय में जीना भी कोई जीना है ? ईश्वर ने हमारी प्रार्थना सुन ली , हमें बख्शा ..या ईश्वर ने हमारी सुन ली ..ऐसी दुनिया से निज़ात दिला दी ..


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चारों ओर किसी प्रहसन का अंतिम भाग खेला जा रहा है ..देख भई खेल, नौटंकी ? तमाशा ..बोल बोल कर गर्दन की नस रस्सी बनी है , कोई न सुने ..क्यों सुने भला ? बस इतना की चौकन्ने रहो , मुड़ मुड़ कर पीछे देखो , अँधियारी रातों में डर सींचों , बिलों में रेंग जाओ , तूफान की आशंका में जहाज़ छोड़ चलो , भागो भागो ..फिर भी चौकन्ने रहो । पुरखों का चौकन्नापन उनकी कब्रगाहों की मिट्टी से उठा ताबीज़ बनाओ ..सातवीं इन्द्रीय विकसित करो ..उस बिल्ली की तरह जो शिकार पर घात लगाये , दबे पाँव , सतर्क चाल हमला करती है ..


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हमारे शब्दकोश से चुन चुन कर उन शब्दों को खारिज़ कर दो जो किसी अन्य भाव को दर्शाते हैं । फिर देखा कि शब्दकोश कुछ आड़ी तिरछी रेखाओं का संकलन मात्र रह गया है ..किसी ने आदेश का पलन किया और सभी शब्दों पर सफेद रंग पोत दिया । अब गनीमत है ..किसी के पास कुछ भी व्यक्त करने को शब्द नहीं ..सब भारमुक्त है सब ..

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9 comments:

neera said...

एक एक शब्द जैसे आत्मा पर मनो वज़न... speechless!

हिमांशु said...

अनुभव अनुभूति से संक्रमित हो जाय तो ऐसी ही भावान्वित भाषा और ऐसी ही प्रभावी अभिव्यक्ति सामने आती है . इस पोस्ट के कोटिशः धन्यवाद .

डॉ .अनुराग said...

इस भारमुक्त होने पर भी मन पर कितना बोझ है !

Parul said...

हम बचे(कब तक??)

रौशन said...

या फ़िर सबके शब्द तैरते हुए आप के पास चले आए
इतना सुंदर संयोजन भावों का और शब्दों का कि हमें लग रहा है हमारे पास शब्द नही हैं तारीफ करने को
शायद वापसी ही है किसी आदिम ज़माने की ओर

अजित वडनेरकर said...

मुक्ति ही तो चाहते हैं सब...
इतने ही मुक्तिकामी हैं तो जन्म ही क्यों लिया ?
इसी क्षण से खुद को मरा हुआ क्यों न मानें...
मृत से अधिक भारमुक्त कौन होगा....

दीपक said...

हम सब हुये मगर चौकन्ने नही हुये !! सही कहा आपने

Manoshi said...

आपका लिखना सबसे ऊपर होता है...क्या कहूँ मैं तो फ़ैन हूँ आपकी, पता ही है आपको...

bhoothnath said...

लेकिन इसका मतलब ही क्या कि हम कुत्ते-बिल्लियों की तरह चौकन्ने हो रहे.....मतलब तो तब होता जब हम वफादार हुए होते....आदमियत....इंसानियत.....के प्रति....
फ़िर क्यूँ गोलियाँ चलती....क्यूँ हत्या....क्यूँ बम गिरते.....क्यूँ अब तक की सबसे सभ्य सभ्यता ने हिरोशिमा.....नागाशाकी.....किया होता....क्यूँ आदमी को आदमी का भय होता.....क्यूँ........क्यूँ.....क्यूँ....अब क्या-क्या लिखूं.....!!चौकन्ना ही होना है तो अब भी कहाँ वक्त बीत गया....हम अपने चरित्र के प्रति....संवेदना के प्रति.....अंततः अखिल सृष्टि के कण-कण के प्रति चौकन्ने हो रहे.....!!!!!