12/13/2008

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जाड़े की सर्द रात में खेस ओढ़े बूढ़ा नींद में चमक जाता है । सपसप हवा रात बहाती चलती है और रेल की सीटी कुहासा चीरती जाने कहाँ विलीन हो जाती है । मेरी नींद भी बीहड़ में भटकती कुनमुनाती है । कँधे पर कोई चिंता सवार है , क्या है ? नींद की बेहोशी में भूलता है सब फिर भी कहाँ छूटता है , किसी कसाईन स्वाद सा आत्मा में गहराता है । दिखता है सपने में खुद का कमज़ोर पड़ना , भीड़ में गुम होना ,चमकते शिखर पर अकेले खड़ा होना कहाँ दिखता है ?

कोई चील डैने फटकारती गोल गोल उड़ती है फिर अचानक झपट्टा मारती है । आँख खुलने पर दिखता है छाती पर कोई गोल सुराख , कोई उजली मुस्कान नहीं दिखती है ।

1 comment:

Pramod Singh said...

यह सीधे-सीधे हमारी नकल करना दीखता है. नहीं दिखता?