2/27/2008

सब रौशनी का खेल है

पिता की याद स्मृति गह्वर से निकल रेंगती है चीटिंयों की कतार सी। पिता अब फोटो में रहते हैं। कमरे में टँगे एकमात्र बल्ब की रौशनी खूब खेल खेलती है उनके साथ। व्यस्क पत्रिकायें छुपाकर पढ़ता हूँ और किसी आहट पर चौंक कर चोर नज़र उठाता हूँ तो लगता है अभी अभी उन्होंने अपनी दाहिनी आँख मारी। मुझे पता है ये सिर्फ रौशनी का खेल है। पिता ऐसे नहीं कि इस बात पर राज़दारी से आँख मार सकें। आखिर पिता हैं दोस्त यार नहीं। पर अब मैं भी बच्चा कहाँ हूँ। क्या पता जब पिता मेरी उम्र के रहे हों ऐसे ही छुपा कर पढ़ते रहे हों। जेनेटिक्स हम में अपनी थ्योरी ऐसे साबित करवा रही हो। पिता की छुपा कर पढ़ने की आदत , किसी पूर्वज की हुक्ड तोता नाक , माँ का कुछ भी नहीं , नानी का अगले दाँतों के बीच का फाँक।

खैर, तो पिता न रहकर भी बहते हैं मेरी नसों में इस तरह। अगले बीसेक सालों में मैं पिता, जब गुज़रे, तब की उम्र में आ जाऊँगा। शायद शुगर और हाई ब्लडप्रेशर की बीमारी के चपेट में भी आ जाउँगा। और फिर एक दिन बिना किसी के आसपास रहे, सन्नाटे से बिना धूमधड़ाका किये , बिना सेवा सम्हाल काराये खत्म हो जाऊँगा जैसे पिता गये। माँ अब तक अचंभित होकर कहती हैं , ये गये तब मुझे खबर तक न हुई। मैं उस दिन उस वक्त आलता लगा रही थी, नई चूनर की धानी साड़ी पहन रही थी। मुझे भनक तक न पड़ी कि मैं जब इतने उल्लास से शृंगार करती थी ,ये दर्द से तड़पते थे।

कई बार मुझे लगता है कि माँ के दुख से कहीं बड़ा है उनका इस अनजानते भाव से पिता के चले जाने की हैरानी। माँ सब परंपराओं को तोड़ कर अब भी रंगीन कपड़े पहनती हैं , काँच की सादी चूड़ियाँ भी। हल्के फीके रंग , पर रंग रंग , सादी किनारी वाले कोर की सफेद साड़ी नहीं। पिता के गुज़रने के साल हमने सब त्यौहार भी मनाये। दादी गुम्म नाराज़ पर माँ हमेशा की मज़बूत । बस किसी की बात नहीं मानी। कुछ हंगामा नहीं किया , कुछ बोला बहस नहीं किया। मुँह बन्द रखा और सब करती गईं। हमेशा की भीतरघुन्नी। दादी बकझक कर आखिर चुप हो गईं।

माँ जब जब कमरे में आती हैं पिता की आँख हँसती है। मुझे पता है सब रौशनी का खेल है। सोचता हूँ , अपनी पत्रिका दराज़ में छुपाते हुये , एक बार ये बल्ब की जगह बदल कर देखूँ , पिता तब भी आँख मारते हैं , हँसते हैं? कि सिर्फ फोटो में जड़े हमारी यादों में चुपके से रहते हैं। पिता के साथ मेरा खेल भी चलेगा जैसे बचपन में चलता था। रौशनी फिर से अपना खेल कर रही है। अबकी बार उनकी बाँयी आँख बन्द हुई है।

11 comments:

कंचन सिंह चौहान said...

mn ke bhavo.n ka bhavuk chitran

ajay kumar jha said...

pratyakshaa jee,
saadar abhivadan. aapkee yadon ne to hamein bhee jhanjhod kar rakh diyaa. likhatee rahein hum padhte rahengee.

Parul said...

kitni chhoti chhoti baaten...aap kahaani kah baithh tii hain un per...sundar.....

Sanjeet Tripathi said...

"खैर, तो पिता न रहकर भी बहते हैं मेरी नसों में इस तरह। अगले बीसेक सालों में मैं पिता, जब गुज़रे, तब की उम्र में आ जाऊँगा। शायद शुगर और हाई ब्लडप्रेशर की बीमारी के चपेट में भी आ जाउँगा। और फिर एक दिन बिना किसी के आसपास रहे, सन्नाटे से बिना धूमधड़ाका किये , बिना सेवा सम्हाल काराये खत्म हो जाऊँगा जैसे पिता गये।"

इस लाईन से तो सौ फीसदी सहमत।
दर-असल बाबूजी के जाने के बाद से कोई ऐसा दिन नही जाता कि कई बातों पर उनकी याद न आए, वो होते तो ऐसा रिएक्ट करते, ऐसे गुस्सा होते………

Mired Mirage said...

बहुत अच्छा लिखा है ।
घुघूती बासूती

Mired Mirage said...

बहुत अच्छा लिखा है ।
घुघूती बासूती

mamta said...

भावुक चित्रण।

सुजाता said...

भावपूर्ण रचना !

आस्तीन का अजगर said...

'शीशे में शक्ल देखो, और जब लगे कि तुम्हारी शक्ल अपने पिता से कितनी मिलती है, समझ लो तुम बूढ़े हो चले हो' गाब्रियल गार्सिया मारक्वेज ने लिखा है या शायद किसी और ने. बड़े बेटों की एक पूरी दुनिया है जो अपने पिता के साथ संबंधों की असहजता, अनाश्वस्त, गुड़ी मुड़ी सी. बाप को फ्रांज काफ्का की न भेजी गई चिट्ठियों की तरह- जिनमें लिखा था - अगर मैं आपके गले से लगकर रो पाता, तो शायद ये सारी कहानियां न लिखता. पिता को लिखा गया एक ऐसा ही पत्र पेश है, जो बीबीसी के संवाददाता फरगल कीन ने अपने पिता की मौत के बाद लिखा था. ये ख़त इसलिए अहम है कि फरगल के पिता शराबी थे और इसलिए फरगल का बचपन काफी परेशानी में गुजरा था. पर मुगले आज़म के बेटे दिलीप कुमार से लेकर शक्ति फिल्म के बाप दिलीप कुमार तक बाप और बेटे की कितनी अजीब कैमिस्ट्री है और ये कहना कितना मुश्किल हालांकि कितना जरूरी होता है कि वे एक साथ जुड़े हैं और जब दुनिया के साथ अच्छे मनुष्य की तरह पेश आ सकते थे, तो एक दूसरे से क्यों नहीं.फरगल की ये चिट्ठी उनकी उस किताब लैटर टू डैनियल- डिस्पैचेस फ्रॉम द हार्ट का हिस्सा है.
Letter to my father
Cork, December 1995
Eamon Patrick Keane died on 5 January 1990

Behind the bedroom door you are sleeping. I can hear your snores rattling down the stairs
to our ruined sitting-room. Here among the broken chairs, the overturned Christmas tree, we
are preparing to leave you. We are breaking away from you, Da.
Last night you crashed through the silence, dead drunk and spinning in your own wild
orbit into another year of dreams. This would be the year of the big break – of
Hollywood, you said. Oh, my actor father, time was, time was we swallowed those lines,
but no longer.
Before leaving I look into the bedroom to where your hand droops out from under the
covers, below it the small empty Powers’ bottle and I say goodbye. And at seven o’clock on
New Year’s Day we push the old Ford Anglia down the driveway, my mother, brother and I.
We push because the engine might wake you, and none of us can face a farewell scene.
I don’t know what the neighbours think, if anything, when they see a woman and two
small boys stealing away in the grey morning, but I don’t care, we’re heading south with
everything we own.
The day I turned 12, which was four days later, you called to say happy birthday. You
were, as I remember, halfway sober, but you didn’t say much else, except to ask for my
mother who would not come to the phone.
In the background I could hear glasses clinking, voices raised, and you said: “Tell her I love
her”, and then the change ran out, and I began to understand what made love the saddest
word in any language.
Christmas that year you had access to the children. We met in Cork station. I remember
your new suit, your embarrassed embrace, the money you pressed into our hands, and
the smell of whiskey. We found a taxi and the driver stared at us, throwing his eyes to
heaven and shaking his head.
What I see now are many such faces: the waitress at the Old Bridge Café where drinks were
spilled; the couple who asked for an autograph and watched your shaking hand struggle to write, before they beat a mortified retreat. And on through pubs and bookmakers’ shops to
one last café where Elvis was crooning ‘Love Me Tender, Love Me Sweet’ on an ancient radio.
By now, nobody was able to speak.
There was a taxi ride home, we children in the back, you in the front, and what lives
with me still, always, is the moment of leave-taking, Christmas 1972. Because, as the
car drove you away from our lives, I saw through the steamed up windows that your
eyes had become waterfalls.
I was too young to understand what you knew – that we were lost to you, broken away.
Down the years we struggled to find one another but I was growing up and away, and you
were drifting closer to darkness. And at the end I gave up writing, gave up calling. I gave
up. Until one night my cousin called to say you were gone. It was a few days into the New
Year, and your heart simply gave up in a small room in the town in north Kerry where you
were born. I remember that you sent me the collected stories of Raymond Carver for
Christmas. I had sent you nothing, not even a card. Now I would send you a thousand, but
I have no address.

From ‘Letter To Daniel: Despatches from the Heart’
by Fergal Keane (Penguin Books, 1996).
Copyright© Fergal Keane, 1996.
ISBN 0140 262 89X, priced £6.99.
‘Letter to Daniel’ is a collection of writings by
distinguished foreign correspondent Fergal Keane
and originally broadcast by the BBC.
Fergal Keane had a difficult childhood. His father
was dependent on alcohol and did not live with the family.

अनूप भार्गव said...

भावपूर्ण ...

निदा फ़ाज़ली साहब की एक खूबसूरत नज़्म है जो उन्होनें अपने ’पिता’ की मत्यु के बाद लिखी थी :
http://hi.literature.wikia.com/wiki/%E0%A4%A4%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A4%B0_/_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B2%E0%A5%80

हम सब अपने में पिता के अंश को जीते हैं .....

जोशिम said...

खेल में बड़ी धूप-छाँव है...... - थोड़ी सी बारिश भी ! - rgds