2/05/2006

यादों की गठरी और सन्दूक भर तस्वीरें

मां-पापा,१९५९ में

एक दूजे के लिये

कुछ दिन पहले एक पोस्ट लिखा था उसमें जिक्र किया था अपने पिता के बचपन के बारे में . उनको जब बताया इस बारे में तो वो बहुत खुश हुये . फिर मैने उनको कहा अगर बचपन की अपनी वो फोटो खोज पायें तो मजा आ जाये .

मुझे याद है बचपन में एक सन्दूक हुआ करता था जिसमें सारी तस्वीरें रखी जातीं थीं .कभी कभी हम लोग सन्दूक निकाल कर , किसी छुट्टी की दोपहरी में एक एक तस्वीर देखते थे.






आम छाप शर्ट, सोना जल प्रपात,१९५९
आम छाप शर्ट, सोना जल प्रपात,१९५९

फिर पिता का तबाद्ला कई जगह होता रहा .सारे सामान के साथ वो सन्दूक भी जगहों की सैर करता रहा.उसमें से कुछ तस्वीरें माँ ने हमें भी सौंपी ,कभी किसी खास अवसर पर. जैसे मेरे बेटे के पैदा होने के बाद ,एक बार उन्हो‍ने मेरे पाँच छ: महीने की उम्र वाली एक तस्वीर मुझे दी थी.साथ में मेरे उसी उम्र के कुछ कपडे भी, बिलकुल नये से. कितने प्यार से संभाल कर रखा था उन्होंने . उस प्यार की गँध ,उस नीली फ़्रॊक में कितने वर्षों से रची बसी थी. अपने दो महीने के बेटे को मैंने कई दिनों तक वो नीला झबला पहनाया था.

अभी भी कुछ दिन पहले एक पैकेट कूरियर से आया जिसमें चिट्ठी के अलावा मेरे बचपन की कुछ और तस्वीरें थीं. मेरे बच्चों को बहुत मज़ा आया उनको देखने में .

खैर, जब माँ और पापा को कहा था वो तस्वीर खोजने को तो मुझे बहुत उम्मीद नहीं थी कि ये मिल ही जायें. पर दो दिन बाद ही उनका फ़ोन आ गया. कई बक्सों और सन्दूकों को खंगालने के बाद उन्होंने आखिर वो तस्वीर खोज निकाली थी. फ़िर तुरत कूरियर भी कर दिया.

पापा नये जूतों में,१९३५,दरभंगा

६ साल की उमर नये जूते की चमक

ये पैकेट जब खोला , तस्वीरें देखीं तो आँखें भर आईं. बस आँसू उमडते गये. बच्चे परेशान हैरान. संतोष उस वक्त घर पर नहीं थे, वरना मुझे संभाल लेते. खूब रोयी उस दिन. पता नहीं क्या लग रहा था . कुछ छूटने का सा एहसास था, कुछ पाने का सा एहसास था, एक मीठी उदास सी टीस थी. फ़िर कुछ देर बाद जी हल्का हुआ. रात में संतोष ने उन्हें फ़ोन किया और हँसते हुये मेरे रोने के बारे में बताया. मैं क्यों रोई ये मैं उन्हें क्या बताती पर शायद उन्हें पता होगा .

पापा ने उन तस्वीरों के साथ एक पत्र भी भेजा था,

" संस्मरण पढ कर मज़ा आया.कविताओं को धीरे धीरे (अपनी कुछ कवितायें भी उन्हें भेजी थीं ) जुगाली करते हुये पढता हूँ . वैसे खामोश चुप सी लडकी बहुत अच्छी लगी .दुबारा तिबारा पढने की कोशिश करता हूँ.
फ़ोटोग्राफ़ भी भेज रहा हूँ. आम छाप (इस तस्वीर में उनकी शर्ट पर आम के मोटिफ़ बने हुये थे और हम हमेशा इस तस्वीर को आमछाप तस्वीर बोलते ) और ७२ का जोडा भी ( ये तस्वीर उनके जवानी के दिनों की है )
'जूते की चमक ' वाला फ़ोटो ( ये उनके बचपन की तस्वीर ) बडा एनलार्ज नहीं हो सका . फ़ोटो तब की है जब मैं ६-७ साल का था. मैं अब 'नितांत अकेला ' सर्वाइवर हूं "

पापा को आजकल देखने में थोडी परेशानी होती है. कुछ दवाओं का असर था . अब क्रमश: सुधार है. मेरी कविताओं और कहानियों को फ़िर भी खूब चाव से पढते हैं .हर फ़ोन पर पूछते हैं, अगला खेप अपना लिखा हुआ कब भेज रही हो .फ़ॊट बडा कर के उन्हें भेजती हूँ ताकि उन्हें पढने में सुविधा हो .



4 comments:

sarika saxena said...

बहुत अच्छा लगा आपके पापा की तस्वीरें देखकर; बस अपने पापा की याद आ गई। यादें ऎसी ही होती हैं बचपन की, दबे पांव आ जाती हैं, कभी किसी खिड़की से ,किसी दरवाजे से या कभी सन्दूक भर तस्वीरों से।

अनूप शुक्ला said...

तस्वीरों का सन्दूक खुला तो और भी तमाम स्मृतियां मिलेंगी दनादन लिखने को। पापा-मां की
फोटो तो किसी बंगाली फिलिम के हीरो-हीरोइन की सी हैं। झरने के पास वाले पापा तो एकदम्मै
हीरो लग रहे हैं।बच्चों पर कित्ता असर है इसका यह भी देखना है।

Anonymous said...

pratyaksha , behad khoobsurat he hen yaade, lekin tumnae apana chehara to dikhaya nahi. our bhi likho yado ko , maja aa gaya

shubhakamanaye

Rati

अतुल श्रीवास्तव said...

दिल ढूँढता है फिर वही..
फ़ुर्सत के रात दिन..

अति उत्तम.