1/05/2006

आज बिजली गुल थी


रात भर
पिघलती मोमबती
का बूंद बूंद गिरना
हम देखते रहे

काँपती लौ का नृत्य
पीछे दीवारों पर
हमारी साँस के
आर्केस्टरा बीट पर
उसी लय से
चलता रहा

बीच रात कभी
चौंक कर
उठ गये थे
शायद ,
बिजली आ गई थी

अब हर रात
हम उत्सुक बैठते हैं
मिट्टी के फैले मर्तबान में
फूल के साथ मोमबत्ती
तैराते हैं
पूरी तैयारी के साथ
इंतज़ार करते हैं
शायद
आज फिर
बिजली गुल हो जाये

6 comments:

अनूप शुक्ला said...

यह कविता रात एक बजकर नौ मिनट पर लिखी गई। उस समय भी बिजली के जाने का इंतजार
था। कमाल है-कविता की तरह। खूबसूरत है फोटो। कविता भी।

Anonymous said...

Pratyaksha,

aap bahut accha likhtee hain, aap kee kalpana bahut sundar hotee hai
ismein kya shaq hai...magar is kavita mein mujhe aap nahin nazar
aayeen. :-) aapkaa intazaar rahega.

--Manoshi

Anonymous said...

accha likha he, me bhi bijali gul hone ka intjar kar rahi hoon---
rati

Anonymous said...

प्रत्यक्षा,



बिल्कुल मौलिक कल्पना है। बहुत सुन्दर।



लक्ष्मीनारायण

Anonymous said...

Dear Pratyaksha
Bahut sunder kanita hai , andaz chota hua dil ko, mubarak ho
sneh Devi

निशांत said...

प्रत्यक्षा जी,

बिजली गुल होने पर हमारे मन में सदा दूसरी भावनाएँ आईं, पर आपकी भावनाओं के आयाम और उनकी अभिव्यक्ति सबसे अलग है।