1/10/2006

सावधान, होशियार..वो आ रहे हैं

आज पाखी ने साईकिल चलाना सीखा. वह आठ साल की है और उसे इतनी देर लगी सीखने में वो हमारी वजह से. हम हमेशा साईकिल ऊपर से नीचे उतारने और उसे सिखाने में आलस जताते रहे. फिर अब लगा कि कितने बडे मज़े से वो बेचारी हमारे वजह से महरूम हो रही है.
एक घंटे में उसे चलाना आ गया.
हर्षिल ने सीखा था 4 साल की उमर में. उसे तो गाडी चलाना भी 10 साल में आ गया था. जब बहुत छोटा था तभी से संतोष उसे गोद में बिठाकर स्टीयरिंग पर उसके हाथ रख देते. दस साल की उम्र में क्लच और ऐक्सीलरेटर का ज्ञान उसे हो गया था. इसलिये उसे एकदम अकेले जब उसे गाडी दी गई तो उसे कोई परेशानी नहीं हुई. ये और बात है कि सड्क पर उसे हम हाथ साफ करने नहीं देते.उसके कई बार मनुहार करने के बावजूद हम यही कहते हैं. "और बडे हो जाओ "
पाखी का आह्लाद देखने लायक था. उसके चेहरे से हँसी रुकती नहीं थी. शायद आज रात वो सपने में भी साईकिल चलायेगी. कल के सारे साईकिल कर्यक्रम उसने तय कर लिये हैं और सब पर बिना शर्त हमारी हाँ की मोहर भी लगवा ली है.
मुझे याद है कि बचपन में मेरे चाचा ने मुझे साईकिल चलाना सिखाया था. किसी ढलान पर लंबी ऊँची साईकिल पर मुझे बिठाकर ज़ोर का धक्का दे देते. मैं डर से चीखती. लगता कि कहीं बहुत ऊँचे पर बिठाकर असहाय छोड दिया गया. पाँव बीच अधर में लटके रहते. गिरने का भय शरीर सुन्न कर देता.
चाचा आश्वासन देते " डरो मत , मैं गिरने नहीं दूँगा " उन्हों ने कभी गिरने भी नहीं दिया. पर ऐसे ही हवा में तेज़ रफ्तार भागती साईकिल पर डरी हुई चीख कब संतुलन पा जाने का जादू मिलते ही आह्लादित खुशी में बदली ये आज तक याद है .
उसके बाद साईकिल थी और हम थे. हर शनिवार और रविवार हमें साईकिल मिल जाती और हवा से बातें करते हमारी साईकिल और मैं. मेरे बडे भाई के बचपन की एक छोटी साईकिल थी. बादमें उसे ठीक ठाक करा कर हमें दे दिया गया. बडी साईकिल पर हमारा पाँव जमीन तक नहीं पहुँचता तो जिसे हम कहते कैंची चलाना, मतलब साईकिल के डंडे के बीच से पाँव फँसा कर उसकी ऊँचाई अपने लायक बनाई जाती. छोटे साईकिल से ये समस्या दूर हो गई .
बचपन में ऐसे ही जीप चलाना सीखा. ड्राइवर ने जीप की स्टीयरिंग पकडा दी थी और हमारे घर के सामने जो गोलाकार ड्राइव वे था, मालतीलता के झाडियों से घेरा हुआ, वहाँ हमने जीप लगभग झाडी में ही घुसा दी थी . गाडी फिर सीखने के लिये , इस हादसे के बाद, बहुत हिम्मत जुटानी पडी थी, बावज़ूद इसके कि हमें टॉम बोय समझा जाता और अपने छोटे भाई के प्रतिद्वंदिता में हमने लडकों वाले सब खेल में महारथ हासिल करने का प्रयास किया था, लट्टू नचाना , गुल्ली डंडा खेलना गुड्डी उडाना , साइकिल चलाना वगैरह.
बाद में नौकरी लगने के बाद पहली गाडी खरीदी, मोंटाना, जो कि बैड बाई रहा. उस ज़माने में
बुधिमान लोग मारुति खरीदते थे. आज का ज़माना नहीं था कि कौन सी लें इसमें दिन का चैन और रातों की नींद खराब हो. फिर भी लीक से हट कर चलनी की जो आदत थी उसे कौन दूर करता.
खैर जो भी हो अपनी इसी प्यारी मोंटाना पर मैंने अपने हाथ साफ किये. इसबार टीचर थे मेरे बडे भाई. बहुत धर्य से उन्होंने हमें सिखाया. कितना धर्य उन्हें मेरे चालन कुशलता पर रहा ये बाद में संतोष के साथ गाडी चलाते पता चला. मैं कोई एक्सपर्ट नहीं थी पर जब संतोष साथ में बैठे होते तो उनका निर्देश लगातार कमॆंटरी की तरह चलता
" इंडीकेटर दो,
गीयर बदलो,
अरे क्या कर रही हो ? ब्रेक मारो ब्रेक मारो "
और जब मैं घबडा कर बीच सडक पर गाडी अडियल टट्टू की तरह रोक देती तो वो सर पकड कर बैठ जाते. मेरी घबडाहट बढती जाती. उसके बाद क्लच छोडती बिना अक्सीलरेट किये और गाडी इंकार कर देती मेरी बात मानने को. स्थिति इतनी खराब हो गई कि मैंने कसम खाई, संतोष के साथ गाडी न चलाने की.
संतोष फिर कई तरह से मुझे प्रोत्साहित करते रहे, साम दाम दंड भेद सब प्रयास किया लेकिन मेरी बात भी इतनी हल्की थोडे थी कि ऐसे ही छूट जाती.. संतोष ने ये भी कहा,
"मेरे जीवन का ये अरमान कि बीवी चलाये और मैं ऐश से बैठूँ बगल में, क्या पूरा नहीं होगा "
मैं टस से मस नहीं हुई. वैसे भी मुफ्त का ड्राईवर ( संतोष ) मिला हुआ था. अपने पैर पर लात क्यों मारती. आराम से दरवाज़ा खोल ,बैठ जाती. फिर सडक क्या , पार्किंग कहाँ, कोई चिंता नहीं. दिन बडे सुख चैन से बीत रहे थे कि संतोष का तबादला हो गया और पीछे रह गई मैं और गाडी की चाभी.
मरते क्या न करते, गाडी चलानी शुरु की, वो भी पटना के सडकों पर. और अब आज भी चला रहे हैं गुड्गाँव मार्ग पर.
पटना की धीमी रफ्तार से गुडगाँव के तेज़ रफ्तार तक का सफर मोंटाना, मारुति, वैगनाआर और अब दो सालों से कोर्सा से चल रहा है . लेकिन जो मज़ा अपने से दो हाथ बडी साइलकिल चलाने में था वो कहाँ ?
वैसे महिला गाडी वान (?) के विषय में कई मज़ाक प्रचलित हैं. मेरे पास किसी ने एक ईमेल भेजा था जिसमें महिला चालकों के बेहद शानदार, मज़ेदार फोटो थे. काश वो मेल अभी होता मेरे पास तो मेरे इस पोस्ट की शान को दुगुना कर देता. खैर न सही लेकिन एक कविता राकेश खंडेलवाल की इस विषय पर याद आती है. मिल जायेगी तो उनकी अनुमति से डाल देंगे यहाँ.

16 comments:

अनूप शुक्ला said...

पोस्ट तो शानदार है। बस बिटिया की साइकिल चलाते हुये फोटो लगा दी जाये। खंडेलवालजी कविता
डाल देंगे टिप्पणी में तथा हम कहेंगे बचो भाई ! ये आ रही हैं गाड़ी लेकर।

Manoshi Chatterjee said...

पूरा पोस्ट बडा अच्छा लगा, अपना बचपन भी याद आया। और एक सलाह सबके लिये: कुछ भी करें, चाहे महंगे से महंगा ड्राईवर रख लें, पति से गाडी चलाना कभी न सीखें, सिर्फ़ बहस होगी,गाडी चलाना तो खैर जो भी सीखेंगी वो बाद की बात है :-)

Amit said...

वैसे अपने निजी अनुभव से मैं यह कह सकता हूँ कि ज्यादातर महिलाएँ खराब वाहन चालक होती हैं, क्योंकि थोड़ी बहुत सामान्य सूझ-बूझ की कमी रह जाती है(मैं लैंगिकवादी नहीं हूँ)। इसलिए मैं जब भी आजू बाजू किसी महिला को गाड़ी चलाते हुए देख लेता हूँ तो तुरंत आगे निकल जाता हूँ, क्योंकि उनके पीछे रहने में तो और भी खतरा होता है!! हांलाकि यह सिर्फ़ गाड़ी चलाने वाली महिलाओं पर लागू होता है, स्कूटी या दुपहिया वाहन आदि चलाने वाली लड़कियाँ/महिलाएँ सही तरीके से चलाती हैं।

sarika saxena said...

बहुत अच्छा लिखा है प्रत्यक्षा जी!
मानोशी आपने भी ठीक कहा कि पति से गाड़ी चलाना कभी नहीं सीखना चाहिये। इसका अनुभव हमें भी है।
पर अमित जी आपकी बात से हम सहमत नहीं हैं। खराब वाहन चालक कोई भी हो सकता है महिला या पुरुष। वैसे आप अगर अमेरिका में गाड़ी चला रहे हों, तो आजू बाजू, आगे-पीछे सब जगह महिलायें दिखाई देंगी, इसलिये आप कोशिश करके भी आगे नहीं निकल पायेंगे, और भारत की स्थिति भी कुछ खास अलग नहीं होगी।

Amit said...

सारिका जी, मैंने पहले ही कह दिया था कि मैं लैंगिकवादी नहीं हूँ क्योंकि जो मैंने कहा उसे बिना समझे पढ़ने वाले मुझ पर लैंगिकवाद का आरोप लगा सकते हैं। दूसरी बात, मैंने यह भी कहा कि मेरा निजी अनुभव ऐसा कहता है, मैं यह नहीं कह रहा कि सारी या अधिकतर महिला वाहन चालक खराब ड्राईविंग करती हैं, मैंने केवल यह कहा कि मेरे अनुभव में ज्यादातर ने खराब ड्राईविंग की है(अब तक)।

और रही बात अमेरिका की, तो यह मैं नहीं मान सकता कि महिला वाहन चालक पुरूषों से अधिक हैं, परन्तु मैं कभी वहाँ गया नहीं इसलिए कोई टिप्पणी करने का अधिकारी नहीं हूँ। पर यहाँ के बारे में ऐसा नहीं कह सकते, यहाँ अभी भी महिला वाहन चालक बहुत कम दिखाई देती हैं।

Pratyaksha said...

खराब चालक महिलायें हो सकती हैं, क्यों नहीं ? आखिर कई पुरुष भी तो खराब चलाते हैं. वैसे एक बात है, महिला चालकों के ऐक्सीडेंट मामूली होते हैं. पुरुष चालकों के ऐक्सीडेंट ..गंभीर. यहाँ पुरुष बाज़ी मार ले जाते हैं

Amit said...

बिलकुल, खराब चालक पुरूष भी होते हैं, मैं इस बात से इंकार नहीं करता!! और यह बात भी सही है कि अधिक गंभीर एक्सीडेंट पुरूषों के ही होते हैं क्योंकि लगभग सभी महिलाएँ(मेरे अनुभवानुसार) बहुत धीरे गाड़ी चलाती हैं जिससे पीछे वाले को बड़ी दिक्कत होती है!! ;)

Pratyaksha said...

कछुए और खरगोश की कहानी तो पढी है न ,अमित.देर आये दुरुस्त आये.
वैसे महिलायें कॉशस ड्राईवर्स होती हैं. (अब अपनी तरीफ करने से भला कौन हमें रोक सकता है. )
:-)
प्रत्यक्षा

Sunil Deepak said...

प्रत्यक्षा जी, इस बार गोल्ड सूक में खरीदारी करने के बहाने गुड़गाँवा भी देख लिया. बीस साल के बाद वहाँ गया था और बदलाव देख कर बहुत हैरत हुई. दिल्ली के तेज यातायात में गाड़ी चलाने का सोच कर ही मुझे पसीना आ जाता है. वैसे भी गाड़ी चलाने का मुझे बहुत शौक नहीं है और जब पत्नी साथ हो तो मेरी यही कोशिश होती है कि गाड़ी वही चलाये. हाँ, अगर गाड़ी मेरा बेटा या पत्नी चला रहे हों तो मेरा नियम है कि कोई चालक को न बोले कि यह रास्ता क्यों लिया या कैसे चलायें. ऐसी बातों पर बहुत झगड़े होते देखे हैं.

Pratyaksha said...

सुनील जी, आप गोल्ड सूक तक आये, मेरा घर बस वहीं है, गोल्डसूक के तुरत पहले जो गोलचक्कर है बसवहीं.
अगली बार आयें तो शायद मुलाकात हो.
हाँ , आपने सही कहा गाडी जो भी चला रहा हो, बगल में बैठने वाले को चालक पर भरोसा रखना चाहिये. संतोष ने देर से ही सही, ये सीख लिया है. मैं भी शायद अब बेहतर और ज्यादा अत्मविश्वास से चलाने लगी हूँ

प्रत्यक्षा

Amit said...

दिल्ली के तेज यातायात में गाड़ी चलाने का सोच कर ही मुझे पसीना आ जाता है.
आप यहाँ के अभ्यस्त नहीं हैं शायद इसलिए ऐसा लगता है। दिल्ली में तो वही बिना किसी हिचक के गाड़ी चला सकता है जिसे कि अत्यधिक घने यातायात में ड्राईविंग करने का अनुभव हो। :)

masijeevi said...

लैंगिक विमर्श बनते बनते रह गया सारा मामला। पति से गाड़ी चलाना न सीखो- इस बात पर सहमति दीखती है, लोग (मेरी पत्‍नी को छोडुकर) मुझे लैगिकवादी मानते हैं (एक किताब है मेरी इस विषय पर) किन्‍तु मेरी जीवनसाथी भी कहती हैं कि स्‍त्री पर विश्‍वास ही नहीं इसलिए सिखा नहीं सकते। पर शोधविधि के लिहाज से देखें तो अमित ने अनुभव की बात की है और जबाब सिद्धंात से दिए गए हैं। मुझे तो लगता है आपकी बिटिया के देर से (बेटे की तुलना में) साइकल सीखने में ही इसका असल कारण छिपा है।

अनूप भार्गव said...

एक नया शब्द सीखा "लैंगिकवादी" (धन्यवाद 'अमित'), तो अगर हमें वो न समझा जाये तो ये हाज़िर है :

http://bblmedia.com/women_drivers.html

Pratyaksha said...

मसिजीवी जी,
बिटिया ने देर से चलाना सीखा इसके जिम्मेदार हम हैं. बेटा जब छोटा था हम ऐसे घर में रहते थे जहाँ सामने जगह थी. साइकिल निकालना और वापस रखना, हमारी थोडी मदद से खुद कर लेता था. बिटिया के समय हम अपार्टमेंट कलचर में थे. साइकिल चार मंजिल से नीचे लाना ,लिफ्ट से ही सही, हमें भारी लगता था.(सारे सिद्धांत आलस्य के कदमों पर ढेर हो गये, वैसे आपकी किताब पढने की जिज्ञासा हो रही है. विरोधी विचारधारा से अवगत रहना चाहिये :-)

वैसे मैंने कहीं पढा था कि औरतों के मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है (ज्यादा ग्रे सेल्स !)कि उन्हें पार्किंग में समस्या आती है.अनूप जी आपकी मज़ेदार लिंक के संदर्भ में...
पर पुरुष जयादा खुश न हों उन्हें कई दूसरे चीज़ों में और ज्यादा समस्या आती है. :-)))

प्रत्यक्षा

Anonymous said...

लाल्टू ने कहा..
http://laltu.blogspot.com/2006/01/blog-post_14.html

Anonymous said...

लाल्टू ने कहा....
प्रत्यक्षा, यह पाखी के लिएः-

समीना ने सीखा साइकिल चलाना

समीना ने चलना सीखा
कब की बात हो गई
समीना ने बोलना सीखा
कब की बात हो गई
समीना ने पढ़ना सीखा
कब की बात हो गई

अब समीना सरकेगी सड़क पर
साइकिल पर बैठ

दो ओर लगे सुनील शबनम
बीच बैठी समीना
पहले तो डर का सरगम
फिर धीरे धीरे आई हिम्मत
थामा स्टीयरिंग कसकर
फिर दो चार बार गिरकर
जब लगी चोट जमकर
समीना थोड़ी शर्माई

दो एक बार घंटी भी आजमाई
क्रींग क्रींग की धूम मचाई
देर सबेर पेडल घुमाया ठीक ठाक
सबने देखी समीना की साइकिल की धाक

समीना ने साइकिल चलाना सीखा

कब की बात हो गई।
('भैया ज़िंदाबाद' संग्रह से- १९९५)

posted by लाल्टू | 9:09 PM