12/14/2005

कोको ,बॉबी , बोरिस और रॉकेट


बचपन की एक बहुत ही प्रिय किताब आज याद आ गई. सुनील जी और जीतेन्द्र जी ने जब अपने प्यारे ब्रांदो और सिंड्रेला की बात की, तो मुझे भी अपना कोको याद आया, जो आज हमारे बीच नहीं है. कोको के पहले बॉबी की बात. और अगर बॉबी की बात करें तो बोरिस और रॉकेट की बात कैसे न आये.
जब स्कूली छात्र थे तब एक किताब थी ,बॉबी बोरिस और रॉकेट, हमारे पास. मोटी जिल्द वाली, चमकते सफेद पन्ने, पेंसिल रेखाचित्र और पिछले दो पन्नों पर उन कुत्तों की तस्वीर जो अंतरिक्ष में गये, लाईका , ओत्वाज़नाया और अन्य नाम जो अब याद नहीं. तब उन दिनों हम ने कई रूसी किताबों के बेहद उम्दा हिन्दी अनुवाद पढे, मीश्का का दलिया (शायद लेखक न. नोसोव थे ), निकीता का बचपन, बॉबी बोरिस , वगैरह
बॉबी बोरिस और रॉकेट , ये किताब दो दोस्तों की कहानी थी, बोरिस और गेना और बोरिस के कुत्ते बॉबी की. बोरिस और गेना दिनरात अनुसंधान में लगे रहते. एक पीपे को रॉकेट बनाकर और अपने प्यारे कुत्ते बॉबी को अंतरिक्ष यात्री बनाकर वे कोशिश करते हैं उसे अंतरिक्ष में भेजने की. प्रयास असफल रहता है और इसी क्रम में वे बॉबी को खो देते हैं. बहुत तलाशने के बावज़ूद वे उसे खोज नहीं पाते. इसी बीच घायल बॉबी को एक आवारा जानवरों के आश्रय में घर मिल जाता है. अंतरिक्ष में कुत्तों को भेजने का सरकारी अनुसंधान चल रहा है और कई ऊँची नस्ल के कुत्तों को आजमाने के बाद ये निष्कर्श निकलता है कि अंतरिक्ष यात्रा के लिये जिस तरह के धैर्य की जरूरत है वो सिर्फ आवारा कुत्तों में ही पाया जाता है. उसके बाद बॉबी की यात्रा "दिलेर" बनने की शुरु होती है. अंतरिक्ष से सफलता पूर्वक वापस आने पर टीवी पर बोरिस और गेना उसे पहचान लेते हैं और उनका सुखद मिलन होता है.
किताब इतनी रोचक थी कि हम उसे कई बार पढ गये थे. शैली मज़ेदार थी और कहानी में बच्चों और कुत्तों की मानसिकता का इतना प्यारा वर्णन था कि कई बार बडी तीव्र इच्छा होती कि काश उन बच्चों सी हमारी जिंदगी होती. हमारा ज्ञान अंतरिक्ष के बारे में भी खासा बढ गया था और यूरी गगारिन, वैलेंतीना तेरेश्कोवा जैसे नाम हमारी ज़बान पर चढ गये थे .

बहरहाल जो तस्वीर बॉबी यानि दिलेर की थी, वो जहन में कैद रह गई थी. कई साल बाद जब हर्षिल पाँच साल का था, तब उसकी जिद पर हम एक नौ दिन के बेहद प्यारे से पिल्ले को खरीद लाये. हर्षिल का तर्क था कि जब हमारे घर कुत्ता होगा तो वो कई काम कर दिया करेगा, मसलन सुबह बाहर से अखबार लाया करेगा ( सुबह सुबह ये काम कौन करे, इस पर कई बार नोकझोंक होती ), उसकी स्कूल की बैग को उसके अज्ञानुसार सही जगह पर रख दिया करेगा, उसके खिलौने ला दिया करेगा. ऐसे तर्कों से मुझे फुसलाया जा रहा था. बाप बेटे ने ये भी आश्वासन दिया कि मुझे पिल्ले का कोई काम नहीं करना पडेगा. उसे खिलाना , घुमाना, नहलाना सब वो करेंगे.

जब वोट आपके विपक्ष में 2-1 हो तो अंजाम बताने की क्या जरूरत. खैर पिल्ला आ गया और हर्षिल ने उसका नामकरण 'कोको " किया. मेरे पिता ने कहा कि चूँकि ये हर्षिल का भाई है इसलिये हर्षिल सिन्हा की तर्ज़ पर कुंतल सिन्हा, इसका नाम हो. कुंतल और कोको, दोनों में सामजंस्यता थी सो नाना नाती ,दोनों का दिल रख लिया गया. ये कुछ दिन बाद पता चला कि कुंतल कुमार ,कुंतल कुमारी है, पर तब तक हमारी ज़ुबान पर कोको जायेगा, कोको खायेगा, वगैरह ऐसा बैठ चुका था कि इसे बदलना अंत संभव नहीं हो पाया .

कोको बहुत बहादुर थी. बचपन में एक बार एक आवारा कुत्ते ने उसपर हमला कर दिया था. तब महीने भर उसके घाव पर दवाइयाँ लगाना, सिरिंज से उसे मुँह में दवाई खिलाना ,ये सब आज याद आता है. जब छोटी थी तो रूई का गोला लगती कई बार खाने की तश्तरी में , हडबडी में, मुँह के बल गिर जाती. हम जब ऑफिस से शाम को घर आते तो हर्षिल और पाखी के साथ वो भी एकदम हमारे ऊपर टूट पडती. मैं सबको ह्टाती ,हँसती, कहती रुको तो ज़रा, दम लेने दो. कपडे बदल कर हाथ मुँह धोकर जब तक कमरे से बाहर आती, कोको धीरज से दरवाजे के मुँह पर बैठी इंतज़ार करती. फिर दोनों बच्चों के बाद अपनी बारी का इंतज़ार करती. बस एकटक मेरे चेहरे को देखती और आँख मिलने पर हल्के से पूँछ हिलाती, मानो कह रही हो,' कोई बात नहीं मैं कुछ देर और रुक सकती हूँ'
चार बज़े उसका बिस्किट का समय तय था. चुपचाप पिछले पँजों पर खडी होकर माँगती. जब वह ऐसे आती, हम समझ जाते, चार बज गये. ब्रिटैनिया मारी गोल्ड ,उसका प्रिय बिस्किट था. बाद में हम उस बिस्किट को कोको का बिस्किट कह कर ही बुलाने लगे थे. इसपर एक मज़ेदार वाक्या याद आ गया. कोई मेहमान आये थे.उन्हें मैं चाय के साथ कुछ खाने का भी पेश करना चाहती थी पर कुछ ऐसा हुआ कि उस वक्त कुछ भी चाय के साथ नहीं था देने को घर में, सिवाय ब्रिटैनिया मारी गोल्ड के. ट्रे, चाय, बिस्किट के साथ मेज़ पर. आगमन होता है मेरी बेटी का. और एकदम से बोल पडती है,
'अरे कोको वाला बिस्किट आंटी खायेंगी ' .
मेहमान का चेहरा देखने लायक था. और हमारा भी.

इस गर्मी में ,कोको हमें छोड कर चली गई. जहाँ उसे दफनाया, वहाँ पेड और फूल लगे हैं. हमारा घर वहाँ से दिखता है. उसके जाने पर हर्षिल और पाखी बहुत रोये. रोये तो हम भी. आज भी कभी कभी नींद में मेरे हाथ उसके नर्म बालों को सहलाते हैं.
हमने भी हीरामन की तरह तब एक कसम खाई, अब दोबारा किसी जानवर से इतना प्यार नहीं करेंगे.
(ऊपर की ये तस्वीर कोको की है. उस किताब में बॉबी भी बिलकुल ऐसा ही था.)

3 comments:

आशीष श्रीवास्तव said...

ये सच है कि घर मे जब भी कोई जानवर पाला जाता है वो घर का एक सदस्य बन जाता है.

मैने कुत्ता तो नही पाला था, लेकिन एक तोता जरूर पाला था "मोटू", जो हम लोगो के साथ १६ साल रहा. बिना किसी पिंजरे के. उसके के बाद आज तक हमने कोइ और जानवर नही पाला.
मै भी अपने मोटू के बारे मे लिखुंगा, अपने अगले किसी चिठ्ठे मे.

आशीष

अनूप शुक्ला said...

वाह! खूबसूरत लेख,फोटो। बड़ी खुशी हुई यह देखकर अब फोटो भी आने लगीं। वो जो पिताजी
वाली फोटो का जिक्र हुआ था वो भी आये जल्द जरा। कविता पर लेखभारी पड़ते हैं आपके तथा
मजे की बात समझ में भी आ जाते हैं।इस लेख की मेहनत सार्थक होने की बधाई!

eSwami said...

मेरा सोमू भी बिल्कुल ऐसा ही दिखता है.