11/11/2005

क्या फिर वसंत आया है

पेड के नीचे धूप मिली छाँह,
हिलती हुई कुर्सी और गोद में किताब,

बगल में लंबा ठँडा ग्लास
कुछ तीखा कुछ मीठा
तरल सा पेय

पैर के पास मेरा प्यारा कुत्ता
पंछियों के शोर पर एक आँख

खोलता ,फिर सर पँज्रे पर रख कर
आँखें बंद कर लेता

सामने मेरे आगे ,अंत में वृक्षों की कतार
पर उसके पहले हरी मखमली घास
और रंगीन फूलों की बेल


मेरे पीछे मेरे गाँव का प्यारा सा घर,
लाल छत और हरी खिडकियाँ

उजली धूप में खिलता हुआ
मैंने आँखें बंद कर लीं थीं,शांत स्निग्ध स्थिर
पर क्यों
मेरी उँगलियाँ अचानक बेचैन
हो रही हैं थिरकने को

शायद किसी प्यानो की कीज़ पर
क्यों मेरे पैर मचल रहे हैं किसी अनजानी
धुन के संगत को
मेरे मन में मद्धम संगीत का शोर किधर
से आया है ,
क्या फिर वसंत आया है

1 comment:

अनूप शुक्ला said...

ये कविता मेरे ख्याल से अभी तक आपकी सबसे अच्छी लिखी कविताओं में से है।बधाई यहां पर तथा विस्तार से इस पर चर्चा फिर कभी। तरल सा पेय 'सा' का अतिरिक्त आकर्षण बरकरार है!