9/10/2008

द रेन सॉन्ग

उसकी आवाज़ फुसफुसाती आ रही थी । मैंने पूछा था ,
क्या ? फिर से बताना
रेन , उसने दोहराया , रेन , फिर बच्चों को समझाते हैं जैसे आवाज़ में कहा , आर ए आई एन ..रेन
बारिश ?
उसने इंसिस्ट किया , नहीं रेन । पर इस बार आवाज़ में एक छिपी हँसी थी ।

अँधेरा था और बाहर बारिश गिर रही थी । और ये लड़की मुझे पागल कर रही थी । दुनिया के किस छोर में बैठी मुझे पागल कर रही थी ।

तुम हो ? उसकी आवाज़ तैरती आ रही थी नीले अँधेरे में । मुझे लगा छू लूँ उसकी आवाज़ को , हाथों से सहला लूँ फिर गप्प से मुँह में भर लूँ । उसकी आवाज़ फिर अंदर गूँजे और हरेक टिम्बर में उसको पहचान लूँ ।
मैं कुछ जवाब देता उसके पहले फोन डिसकनेक्ट हो गया ।

अँधेरे में अँधेरे को देखते मैं सोचता हूँ क्या किसी का नाम रेन हो सकता है ? बाहर अब भी बारिश हो रही है । अकेले में ये रॉंग नम्बर कोई नियति का फेंका हुआ पासा है शायद । सिगरेट की जलती हुई टोंटी से उठता धूँआ मेरे जीभ पर उसकी आवाज़ का धूँआ धूँआ स्वाद है ।

उसकी आवाज़ टूटी टूटी सी खराशदार है , जैसे टोबैको मेरी जीभ पर , जैसे बचपन में देखी वियुमास्टर पर जैंज़ीबार , ( और जैंज़ीबार कहते ही मेरे शरीर में एक सिहरन होती है और मैं इस शब्द को बार बार दोहराता हूँ ) का एक दृश्य गाँव का , उस आदमी का जो नीचे बिछी मिर्चों को या फिर शायद कॉफी बींस ? अब याद नहीं , हाथ से फैलाता मगन है । पीछे घर के बगल में छाया में टिकी साईकिल जो शायद साईकिल ही नहीं थी , बस कल्पना में साईकिल थी , ऐसी उसकी आवाज़ थी , शायद सिर्फ कल्पना में ।


रात के अँधेरे में मैं पुकारता हूँ ज़ोर से
रेन ! रेन !
फिर अपनी आवाज़ को थामता हूँ और स्वाद लेकर कहता हूँ
रेन
तीन बार और कहूँगा तो घँटी बजेगी और उसकी आवाज़ धीमे से फुसफुसा कर कहेगी
तुम हो ?


तीन बार कहने पर भी फोन नहीं बजता । मैं नीन्द में खर्राटे भरता सपने देखता हूँ फिर बारिश की । फिर हड़बड़ा कर आधी रात उठ बैठता हूँ । पता नहीं क्यों , पर मुझे फे वॉन्ग की याद आती है । शायद सब एक सपना है ।



मैं किसी आवाज़ को थाम कर रेगिस्तान पार कर जाना चाहता हूँ । उस आवाज़ में माँ की आवाज़ की प्रतिध्वनि है , किसी मैदान में खेलते दूर से अचानक हवा में माँ की आवाज़ तिरती आती थी , धीमी बुलाती हुई , जिसमें घर की गर्मी होती थी , चूल्हे के पास ताज़ा सिंकती रोटी पर गर्म चुपड़े घी की महक होती थी , माँ के पसीने और टैल्कम पाउडर की मिली जुली प्यारी खुशबू होती थी और कैसे मैं अचानक अधीर खेल बीच में छोड़ कर भाग आता , पीछे दोस्तों की सम्मिलित गुहार दरवाज़े तक मेरे साथ आती , साथ हाँफते दौड़ते । दरवाज़े के अंदर आते ही सब झटक देता । अंदर के पीले नहाये रौशनी में माँ मुड़कर देखतीं , मुस्कुरातीं , इशारा करतीं , हाथ मुँह धो आने की , फिर आँख मून्द कर तानपुरा सँभालतीं ।


रात के अँधेरे में तानपुरे की टुनटुन सुनाई देती है । माँ को गये कितना अरसा हुआ । हल्के नीले छोटे फूलों वाले खोल से मढ़ा तानपुरा अब भी घर पर माँ के कमरे में सजा है । कई बार वहाँ होने पर , जब माँ की कमी महसूस होती है , मैं तानपुरे के तार पर उँगलियाँ चलाता हूँ , जैसे बचपन में माँ रहम खा कर कभी मुझे गोद में बिठाकर तानपुरा बजवा लेतीं , या कभी सिलाई मशीन की हैंडल चलवा लेतीं । जैंज़ीबार वाला वियुमास्टर अगली बार जब घर जाउँगा , खोजूँगा पर तब तक कॉफीबींस आदमी को मैं बखूबी देख सकता हूँ । उस फे वॉन्ग लड़की को भी जिसका पक्का शर्तिया नाम रेन नहीं है ।

मैं अँधेरे को देखता फोन की घँटी का इंतज़ार करता हूँ ।

7 comments:

Arun Aditya said...

शानदार शब्द-चित्र। लगता है कि पढ़ नहीं रहे हैं, बल्कि कोई ऑडियो विजुअल क्लिपिंग देख रहे हैं। एक-एक दृश्य एकदम प्रत्यक्ष, बिल्कुल स्पष्ट। और ऑडियो इतना क्लिअर कि फुसफुसाहट तक साफ़-साफ़ सुनाई दे रही है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शब्दोँ से परे
खुशबु से भरी
यादोँ की बारात से
चलते शब्द चित्र होँ
और व्यक्ति धुँधलके मेँ भी
आकृति लेता
स्पष्ट आकार लेता हो
तब ..
वो "रेन" नामक
रहस्यमयी लडकी की
सर्जना करती
एकमात्र
"प्रत्यक्षा " ही होती है !
:)
प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या !!
वाह !
ऐसे ही सजता रहे
आपका जाल घर !
बहुत स्नेह के साथ,
-लावण्या

Rohit Tripathi said...

bahut hi sundar Pratyksha ji... shado ko bahut ache se piroya aapne to :-)

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I don’t want to love you… but I do....

डॉ .अनुराग said...

पैरो में बिवायिया
माथे पर बड़ी सी बिंदी लिए
सो रही है
एक उम्र में आकर
जेरोक्स कॉपी सी हो जाती है न माँ .....

दो बार इस रस्ते से गुजरा ....तसल्ली से पढ़ा फ़िर सोचा प्रत्यक्षा जी माँ पर लिख रही है...अपने पिता की लाडली बेटी ने माँ को भी एक मूरत दी है.....अपने शब्दों से ......
बेहतरीन......

Parul said...

:)

गौरव सोलंकी said...

ऑडियो वीडियो देख सुन नहीं पाया लेकिन पढ़ा अच्छे से। एक साथ कई अर्थ निकलने लगते हैं। मैं तो समझ भी नहीं पाया कि माँ के लिए लिखा है, बारिश के लिए या फे वॉंन्ग के लिए! :)

अनूप शुक्ल said...

अंधेरे में अंधेरे को देख रहे हैं। कोर्स बहुत कठिन होता जा रहा है दिन ब दिन!