7/19/2007

एक और दिन

बच्चू सुबह से लोटमलोट था । दिक कर रहा था , मुँह गोल किये था , कभी रुस जाता कभी मनुहार करता । साडी का आँचल पकड पकड ठुनक जाता । माँ को पता था इसे चाहिये क्या ? माँ ऐसे ही माँ थोडे ही थी । उस दिन मौसा के चाचा के समधी पधारे तो पित्ज़ा और पेस्ट्री के बजाय अम्मा के दिनों की मेहमाननवाज़ी याद आई । निमकी लाल साबुत मिर्च के मसालेदार अचार के साथ और बेसन का हलुआ । बना डाला और ढेर ढेर प्रसंशा पाई । और बच्चू जो मीठा नहीं खाता , ये मीठा बिलकुल जीभ पर नहीं धरता से बदल कर दो दो कटोरी हलुआ खाने वाला और माँ को सीधा झुठलाने वाला बच्चू हुआ ।

बस हफ्ता ही तो बीता था । किस बात से उस स्वाद की याद उसे आई । आनी भी थी तो छुट्टी वाले दिन आती । आज जब जल्दी ऑफिस पहुँचना था तब ही । साडी का आँचल कमर में खोंसे पसीने से तर बतर माँ बेचैन बदहाल । न , अभी तो किसी कीमत पर नहीं । बच्चू पहले तो प्यार से ठुनकता था । ममा प्लीज़ कहता था । माँ कहती आज नहीं , राजा , मुन्ना , बेटा , आज नहीं । बच्चू ने पैर पटके , नहीं अभी अभी । अभी खाऊँगा । माँ ने बेख्याली में बाल थपथपाये , रसोई का सामान समेटना शुरु किया , घडी की भागती सुई पर और भी तेज़ भागती नज़र डाली । बच्चू लडियाता था , हँस हँस कर माँ को रिझाता था , ठुनकता सहकता था । माँ नहाने घुसी । बच्चू दरवाज़ा पीटता था , अभी अभी अभी । भीगे बदन कपडे पहनते माँ का पारा गर्म होता जाता था । बीस साल की फ्लोरिया ऐसे वक्तों में बच्चू से दूर हो जाती । घर की सबसे कोने वाली बैल्कनी की सफाई में जुट जाती । इस रूटीन में व्यतिक्रम न करते हुये फ्लोरिया गायब हो ली । माँ निकली गरम गरम और दरवाज़े से लटके बच्चू को दे डाला दो धौल । बच्चू वहीं लोट गया जमीन पर । इधर से उधर । लोटने पर एक कान उमेठी और मिली । नाक ,आँख , मुँह सब बहाते हुये बच्चू , गुस्से से तिलमिलायी फट फट तैयार होती माँ और भाग कर बच्चू को गोद में उठा दूसरी तरफ ले जाती फ्लोरिया ।

बच्चू का चेहरा सहम गया था । माँ का ऐसा गुस्सा । रह रह के सुबक जाता । हर तीन साँस पर एक लम्बी थरथराती हुई ,टूटी हुई हिचकी गले के गड्ढे में थम कर सिहर जाती । माँ तैयार निकलती थी । बच्चू को फ्लोरी की गोदी से ही एक बार प्यार किया । बच्चू का सहमा चेहरा , धमसे हुये लाल गाल । नज़र फेर तुरत उतर गई । रास्ते भर ऑफिस के लस्ट्म पस्टम के बारे में दिमाग उलझा रहा । ऑफिस पहुँचते ही कल की टाईप की हुई चिट्ठी पर तीन बार काम करना पडा । सेक्रेटेरियल पूल की सुनीता खन्ना से झडप हुई । बॉस के पी ए सोनी से बहस हुई । चौथे ड्राफ्ट को फाईनल किया ही था सोनी नयी चिट्ठी थमा गया , अरजेंट । टाईप करते करते बच्चू का धमसा हुआ रुआँसा चेहरा तैरता रहा । ठीक बारह बजे फ्लोरी का फोन आया । बच्चू को बुखार है । घर जाना है बच्चा बीमार है । बैग समेटते , पेपर्स तहाते सोनी की बुदबुदाहट कान में पडती रही । बच्चा हमारा भी बीमार पडता है । इसका क्या मतलब । हर बात में छुट्टी । तनखाह तो बराबर लेंगी और काम घर का करेंगी । ये औरतें ,इनपर तो भरोसा ही नहीं किया जा सकता । भुनभुन , भनभन ।

औरत धडफड स्कूटी चलाती है । घर जाते ही बच्चू के लिये बेसन का हलुआ बनाना है । कुछ मन से खा ले बस ,मेरा बच्चू , मेरा राजा , मेरा मुन्ना । बच्चू माँ को देख हिलक जाता है । लपक कर गोद चढ जाता है । गाल से गाल सटा लेता है । धमसे हुये चेहरे से फिक से हँस देता है , सुबह की मार भुला देता है । रसोई में हलुआ बनाती माँ अचानक धक्क से रह जाती है । नयी चिट्ठी जो टाईप की थी उसे बॉस को देना तो भूल ही गयी । कल सुबह फिर कचडा होगा ।

14 comments:

Vikram Pratap Singh said...

" बेसन कि सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ " यकीनन गुजरे वक़्त की यादों का नर्म एहसास अभी -अभी कहीं पास से निकल गया, और मैं यूँ ही बेबस निहारता रहा .........

Pramod Singh said...

बच्‍चू औरत को काम करने देगा कि नहीं? ऐसे बच्‍चे के गाल से गाल सटाना कोई अच्‍छी बात है? क्‍या फ़ायदा ऐसे लात लगाने का जब कुछ घंटों बाद लाड़ ही जताना है? इन्‍हीं सब अदाओं पर लुटकर औरत बेटा-बेटा लड़ि‍याती रहती है? किसी भी बात में कोई तुक है? बॉस की इस मसले पे कोई राय है? वैसे ज्‍यादा चांसेस हैं बॉस औरत होते तो वह भी इस सवाल पर इतना ही कन्‍फ्यूज्‍ड होते! वैसे उनके लेटर की डेलिवरी का क्‍या हुआ?

Raag said...

बहुत ही भावुक कहानी। मेरी मम्मी भी नौकरी करतीं थीं और हमारी देखभाल भी।

Udan Tashtari said...

अच्छी लगी कामकाजी महिला की कहानी. कितना सारा सामनजस्य बैठाना होता होगा.

अनूप शुक्ल said...

सही तो है लेकिन् ये सबेरे-सबेरे बच्चे को पीटना ठीक् नहीं भाई!

अरुण said...

ये क्या बात हुई अनूप जी " सुबह सुबह पीटना गलत है,ये बच्चे को पीटना सिरे से ही गलत है हम इसके विरोधॊ जब ब्च्चे थे तभी से रहे है.
ये आपकी और प्रमोद जी की आजकल अच्छी आवृती मिल रही है,हम उने पढ कर कई बार आपको टिपिया चुके है,और आप्को पढ कर उन्हे..:)

अभय तिवारी said...

अच्छा है माँ बच्चे की दुनिया का चित्र..

ratna said...

एक मजबूर माँ के दिल का सुनदर झरोखा।

काकेश said...

अच्छी लोटमलोट रही!

अनामदास said...

अच्छा है.

Shrish said...

बहुत सुन्दर लघुकथा। एक कामकाजी महिला की स्थिति को बखूबी उकेरा आपने।

अजित said...

अच्छी कथा। संवेदना जगाती है। हम भी कामकाजी मां की संतान हैं पर बच्चू जैसा बचपन नहीं रहा। बच्चू से बड़ी उम्र के हुए तो खुद ही खाना लेकर खा लेते थे। मलाई में शक्कर डाल कर रोटी के साथ। कई बार रोटी पर तेल चुपड़ कर नमक-मिर्च लगाकर रोल बनाते । बाद में खाना बनाना भी सीख लिया । प्रसन्न रहती थी हमारी माताजी भी।
मगर इससे क्या ? आस-पड़ौस में तो ढेरों बच्चुओं को रोज़ देखते चले आ रहे हैं। उनके फूले गालों पर खारे आंसू ! सुबह की विवश अम्मा, शाम को निहाल अम्मा ! लिखती रहिये प्रत्यक्षा जी।

silbil said...

us aurat ke guilt to romaticise karna zaroori hai kya...
Literature, however harmless it may seem perpetuates all things wrong.
where was Bacchu's father?
and why is Bacchu in 'make -the-poor-woman-guilty-and martyr at the same time' kind of stories always a male child.
I hope you won't give me silly answers like because I am a male...
is desh mein patriarchy ka koi tod nahin

Pratyaksha said...

औरत के द्वंद में रोमांस कहाँ है , सिर्फ सच्चाई है । बच्चू का पिता हो सकता है दौरे पर गया हुआ हो , हो सकता है हो ही न (सिंगल मदर ) या फिर हो सकता है , आज की रियालिटी में , बच्चू के लिये जब घर के काम में उसकी हिस्सेदारी की बारी होती हो तो माँ से बेहतर हलुआ बनाता हो ।
बच्चू बच्चू हो या बच्ची क्या फर्क पडता है ? इस दृश्य में अंतरनिहित कोई ऐसे भाव तलाशना ही पितृसत्तात्मक समाज की भावनाओं को रेखांकित करना जैसा नहीं है क्या ?