2/14/2007

सिर्फ एक प्रेम कथा

गीली मिट्टी ,गेहूँ की बाली, तुम और मैं....

तुम्हें याद है
गर्मी की दोपहरी
खेलते रहे ताश
पीते रहे नींबू पानी
सिगरेट के उठते धूँए
के पार
उडाते रहे दिन
खर्चते रहे पल
और फिर किया हिसाब
गिना उँगलियों पर
और हँस पडे बेफिक्री से
तब , हमारे पास
समय बहुत था
...........................................................




सिगरेट के टुकडे
कश पर कश
तुम्हारा , ज़रा सा झुक कर
तल्लीनता से
हथेलियों की ओट लेकर
सिगरेट सुलगाना
मैं भी देखती रहती हूँ
शायद खुद भी ज़रा सा
सुलग जाती हूँ
फिर कैसे कहूँ
तुमसे
धूम्रपान निषेध है
……………………………………………………………..

तुम्हारी उँगलियों से आती है
एक अजीब सी खुशबू
थोडा सा धूँआ
थोडी सी बारिश
थोडी सी गीली मिट्टी
मैं बनाती हूँ
एक कच्चा घडा उनसे
क्या तुम उसमें
रोपोगे गेहूँ की बाली ?
..................................................................



सुनो ! आज कुछ
फूल उग आये हैं
खर पतवार को बेधकर
हरे कच फूल
क्या तुम उनमें
खुशबू भरोगे
भरोगे उनमें
थोडी सी बारिश
थोडा सा धूँआ
थोडी सी गीली मिट्टी

...............................................................
अब , हमारे पास
समय कम है
कितने उतावले हो
कितने बेकल
पर रुको न
धूँए की खुशबू
तुम्हें भी आती है न
गीली मिट्टी की सुगंध
तुमतक पहुँचती है न
कोई फूल तुम तक भी
खिला है न
............................................................
जाने भी दो
आज का ये फूल
सिर्फ मेरा है
आज की ये गेहूँ की बाली
सिर्फ मेरी है
इनकी खुशबू मेरी है
इनका हरैंधा स्वाद भी
मेरा ही है
आज का ये दिन मेरा है
तुम अब भी
झुककर
पूरी तल्लीनता से
सिगरेट सुलगा रहे हो
मैं फिर थोडी सी
सुलग जाती हूँ.



(ये कविता आज संतोष के जन्मदिन पर उसके लिये )

15 comments:

Anonymous said...

वैलेन्टाईन डे के दिन जन्मदिन 'सोने पे सुहागा'

संतोष जी को जन्मदिन पर हार्दिक शुभकामनायें ।

Beji said...

बहुत सुन्दर !!

SHUAIB said...

बहुत बढिया

Amit said...

मेरी ओर से भी संतोष जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ। :)

वैसे प्रत्यक्षा जी, मैंने आपको टैग किया है, यहाँ देखें, और शीघ्र ही टैग की परंपरा को निभाएँ। :)

Pratyaksha said...

शुक्रिया , एनोनिमस जी , बेजी , शुएब , अमित
और हाँ अमित टैग की परंपरा जरूर निभाई जायेगी । सबसे मज़ा तो शिकार पकडने में आयेगा :-)

Divine India said...

बहुत तल्लीनता से हृदयावेश को समझ कर कृति का रुप दिया है…सुंदर!!बधाई!

Sagar Chand Nahar said...

संतोष जी को जन्मदिन की ढ़ेरों बधाईयाँ और आपको इतना सुन्दर तोहफा हमें और संतोष जी को देने के लिये।

रजनी भार्गव said...

प्रत्यक्षा बहुत अनुपम है तुम्हारी जन्मदिन की भेंट.
संतोष को हमारी ओर से जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

Udan Tashtari said...

संतोष जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ। :)

बहुत खुब तोहफा रहा. :)

मोहिन्दर कुमार said...

बहुत सुन्दर रचना है बाकी अभी बहुत कुछ पढने एंव समझने को बाकी है
मेरे ब्लाग http://dilkadarpan.blogspot.com पर पधार कर अपनी टिप्पणी से मेरी रचनाओं का मुल्याकंन करने की कृपा करें
विशेष रूप से मेरी एक कविता "केवल संज्ञान है" जो http://merekavimitra.blogspot.com पर प्रेषित है आप की टिप्पणी की प्रतीक्षा में है

मोहिन्दर

priyankar said...

इस सुलगने में ही दाम्पत्य की ऊष्मा है. समर्पित और श्रमशील जीवन का ताप है जो घर के चूल्हे की आंच में (अब बर्नर की आंच में) और गर्म रोटी की भाप में दिखाई देता है . और यही है पृथ्वी का नमक . शुभकामनाएं!

अनूप भार्गव said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है लेकिन संतोष को चैन से सिगरेट पीने दो ना ......
देर से पढी ये कविता । संतोष को जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई ।

Anonymous said...

बहुत बढिया, बहुत सुन्दर !!

Anonymous said...

भाव पूर्ण, जैसे छोटे छोटे जल कण अंबर में कहीं छिपे बैठे थे, पावस की प्रतिक्षा में, समय आया तो शीतलता से झर गये। वैसे ही यह कोमल भाव की कविता है।

Anonymous said...

शायद खुद भी ज़रा सा
सुलग जाती हूँ
फिर कैसे कहूँ
तुमसे
धूम्रपान निषेध है
भाव-व्यंजना सरल लेकिन प्रभावशाली है।
मन को छू गई ।
कहीं सन्तोष ध्रूमपान तो नही करते ?