3/14/2006

राग रंग

परसों टीवी पर एक प्रोग्राम देखा, "हार्मनी इन वाराणसी " . प्रोग्राम बहुत अच्छा था , इतना अच्छा कि कल जब इसे शाम दुबारा दिखाया गया तो मैंने और संतोष ने बच्चों की नाराजगी झेलते हुये ( अब उनके इम्तहान खत्म हो गये हैं और वो हर वक्त हमारे सिर पर चढे रह्ते हैं, बताओ अब क्या करें ) इसे फिर से सुना .
गंगा तट पर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत सुनने का आनंद ही कुछ और रहा होगा. टीवी पर ही सही उसका कुछ भाग तो हमने भी उठाया.पर ये भी पता चल गया कि 'लाईव ' सुनने और देखने का अनंद क्या होता है.

ज़िला खान को सुना और पहली बार सुना.
ज़िला खान ,उस्ताद विलायत खान की बेटी हैं. ज्यादातर सूफी संगीत गाती हैं. उस दिन ठुमरी गा रही थीं. उन्हें गाते देखकर एक आह्लाद की अनुभुति हुई. इतने तन्मयता और पैशन से गा रही थीं.
उनके बाद पंडित चुन्नीलाल मिश्र जी का गाया ,शिव वंदना सुना . पहाडी झरने सी उन्मुक्त बहती आवाज़
"हे शिव शंकर औघड दानी " फिर एक ठुमरी और .
आह !क्या सुख की अनुभूति.
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जब छोटे थे तब माँ , पापा, जब शास्त्रीय संगीत सुनते तब बेहद आश्चर्य होता कि कैसे उन्हें ये कर्णप्रिय लगता है. तब ये भी याद है कि बेगम अख्तर की अवाज़ भी अच्छी नहीं लगती थी. पर घर में अच्छे संगीत को सुनने का महौल था. माँ बहुत अच्छा गाती भी थीं, रेडियो से उनके प्रोग्राम आते थे. एक लोकगीत जो खूब गाती थीं

'कुसुम रंग चुनरी रंगा दे पियवा हो
चुनरी में गोट्वा लगा दे पियवा हो
कुसुम रंग चुनरी '


धीरे धीरे कब ये सब अच्छा लगने लगा, पता ही नहीं चला. अब मल्लिकार्जुन मंसूर, पंडित भीमसेन जोशी , पंडित जसराज, कुमार गंधर्व, उनके पुत्र मुकुल शिवपुत्र , गिरिजादेवी, किशोरी अमोनकर से लेकर बेगम अख्तर, मलिका पुखराज़ , आबिदा परवीन , मेंहदी हसन, सब को सुनते हैं और खूब सुनते हैं.
ऐसा नहीं कि अंग्रेज़ी गाने नहीं सुनते लेकिन हमारी सूई अटक गई है किसी पुराने ज़माने में और अब भी बीट्ल्स, जोन ब्याएज़, साइमन गारफंकल पर ही अटकी हुई है. बेटा सुनता है नये पॉप सिंगर्स को, जिनके नाम मुझे नहीं मालूम. उनकी धूम धाम वाली मस्ती मेरी समझ में नहीं आती.

अब समझ में आता है , जेनेरेशन गैप किसे कहते हैं.

जब हम स्कूल में थे तो एक गाना खूब सुनते थे
"फंकी टाउन"
ये लिप्स इंक का रेकार्ड था और इस गाने में सिर्फ एक ही लाईन था 'फंकी टाउन ' जिसे कई तरह से गाया जाता. मेरी माँ खूब हँसती इसे सुनकर. कहतीं ये तो अंग्रेज़ी में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत है . हमारे संगीत में भी तो एक ही लाईन को कई तरह से गाया जाता है.

इसी बात से एक बात और ध्यान में आई कि जब हर्षिल और पाखी बहुत छोटे थे तब मैंने और संतोष ने ये सोचा था कि हम उन्हें खूब अच्छे संगीत के माहौल में पालेंगे पर अब वो सिर्फ, "कमबख्त इश्क़ "या फिर "वीआर गोईंग टू इबिज़ा" टाईप के गाने सुनते हैं . पर उम्मीद है बडे होने पर कहीं न कहीं कुछ और बेहतर सुनने की अभिलाषा उनमें जागे जैसा कि मेरे साथ हुआ. कोई बीज अच्छे संगीत का डालने में अगर सफल हुये तो यही बडी उपलब्धि होगी.

ये तय है कि संगीत ,हर तरह का बढिया होता है. पर आप किसे पसंद कर रहे हैं ये काफी कुछ उम्र पर भी निर्भर करता है. उम्र के साथ साथ पसंद भी शायद परिपक्व होती जाती है, शायद ! ;-)

7 comments:

आशीष said...

ये तो है उम्र के साथ संगीत की समझ बढते जाती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है. बचपने मे तो मुझे शास्त्रीय संगीत तो दूर संगीत से ही चिढ थी. फिल्मो के बीच मे गाने एक रूकावट से लगते थे.
चलचित्रगृह मे मै गानो के बीच पापकार्न लाने जाता था.
धीरे धीरे जैसे बढा होता गया संगीत अच्छा लगने लगा लेकिन धुम धडाके वाला, बप्पी लहरी वाला....
और आज गुलाम अली, मेहंदी हसन, जगजीत, बेगम अख्तर, आबीदा परवीन , नुसरत फतेह अली खान , कब्बन मिर्जा , भुपेन हजारीका जैसे ही पसंद आते है.
अंग्रेजी ज्यादा नही सुनता लेकिन सेलीन डियोन, ब्रायन एडम्स काफी पसन्द है.
वैसे पसन्द आजाये तो सब कुछ सुन लेता हूं स्पेनीश माकारीना से लेकर अरेबियन खालीद तक. भले ही समझ मे एक शब्द ना आये लेकिन संगीत अंदर तक उतर जाता है.

Amit said...

ये तो है उम्र के साथ संगीत की समझ बढते जाती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है. बचपने मे तो मुझे शास्त्रीय संगीत तो दूर संगीत से ही चिढ थी. फिल्मो के बीच मे गाने एक रूकावट से लगते थे.

भई फ़िल्मों के बीच गाने तो मुझे आज भी रूकावट लगते हैं। बिना गानों की फ़िल्में ही अपने को पसंद हैं। :) पर ऐसा नहीं है कि संगीत से मुझे चिढ़ है। अच्छे फ़िल्मी गानों की कैसेट व सीडी मैं खरीदता रहता हूँ।

हिन्दी में मेरे पसंदीदा गायक जगजीत सिंह, नुसरत फ़तेह अली खान, सोनू निगम, अभिजीत, लता मंगेश्कर, अल्का यागनिक हैं, और अंग्रेज़ी में मुझे बैकस्ट्रीट बॉयज़, रिकी मार्टिन, बॉयज़ोन, ऐनरिके इग्लेसियास, सेलीन डियान और ऐक्वा पसंद हैं। और मुझे केन्नी जी का संगीत व जेम्स हॉर्नर तथा हांस ज़िम्मर का फ़िल्मों में दिया पार्श्व संगीत भी पसंद है। :)

पूनम मिश्रा said...

ज़िला खान को मैंने एक नाटक "Gods, Graves and Grandmothers" में देखा है.बहुत सशक्त गायिका हैं.शायद उम्र के साथ एक ठहराव आ जाता है .वही हमारे बदलती पसंद का एक कारण हो.

Udan Tashtari said...

प्रत्यक्षा जी
ज़िला खान का सूफ़ियाना अंदाज और आवाज़ अक्सर हमें दार्शनिकता की तरफ़ ले जाती है. देखें, आप पर भी असर हो रहा है. वैसे ऎसा किसी भी गहरे संगीत या आवाज़ के साथ होता है, बस पसंद और माहौल की बात है.
आपको सपरिवार होली की शुभकामनाऎं.

समीर लाल

Tarun said...

kya aapko pata hai हर्षिल ek khoobsurat pahari jehag hai uttarkashi se gangotri jaane ke raaste me parti hai, bhagirati ke kinaare basa hai. Ram teri ganga meli ki shooting bhi yeha hui thi. Aapke dono bachho ke naam bare pyaare hain.

Generation gap ka bahut sahi keha hai....

Pratyaksha said...

शुक्रिया, समीर जी, आप को भी होली की शुभकामायें
हाँ तरुण, मुझे पता था हर्षिल एक जगह का नाम है. वैसे जब उसका नाम रखा था तब उसके अर्थ पर यानि 'जो हर्ष दे 'और एक तारे का नाम भी हर्षिल है, यही सोच कर नाम रखा था. नाम वाकई सार्थक हुआ :-)

Pratyaksha said...

आशीष मुझे भूपेन हज़ारिका की ' गंगा तुम बहती हो क्यों' बहुत पसंद है