9/08/2005

मल्लिकार्जुन मंसूर

उनकी आवाज़ गूँजती नहीं
धीरे से आकर
हल्के कदमों से,
कच्ची नींद में सोये शिशु को
ज्यों माँ ओढाती है, चादर
हौले से, कहीं जाग न जाये
वैसे ही
ढक देती है मन को......

पानी के सतह पर
धीरे से पैठ जाना
हर साँस पर
थोडा नीचे और,
जब तल पर पहुँचो
तो शरीर भर
खुशबूदार पानी
जहाँ फूलों की पँखुडियाँ
तैरती हैं......
उस निशब्द संसार में
एक तान
एक आलाप
सिर्फ आँख ही तो बन्द है
मन खुला है
विस्तार
अपरिमित

उस सुर के संसार में
खडा याचक
थोडा और माँगता है मन

3 comments:

Sunil Deepak said...

मैंने कभी मल्लिकार्जुन मंसूर को ढ़ंग से नहीं सुना, आप की इस कविता के बाद इच्छा होती है उन्हें सुनने की. मौका मिलते ही उनका संगीत अवश्य खरीदूँगा. सुनील

अनूप भार्गव said...

सुनील जी:
मल्लिकार्जुन मंसूर पर अशोक वाजपेयी जी नें भी दो कविताएं लिखी हैं । बहुत सुन्दर । मेरे पास उपलब्ध हैं , यदि आप चाहें तो ।
मल्लिकार्जुन मँसूर जी को बस आँख बन्द कर के फ़ुर्सत में सुनिये । प्रत्यक्षा और अशोक वाजपेयी जी नें जो लिखा है , बिल्कुल सोलह आनें सच लगेगा ।

अनूप

अनूप

Pramod Singh said...

आपने शारदा, सुमन कल्‍याणपुर या हेमंत कुमार के गायन पर भी अगर ऐसी ही मार्मिक कवितायें लिखी हों तो कृपया सूचित करें.