4/27/2010

अमेज़िंग ग्रेस

आज उदास होने का दिन नहीं जबकि आँख की नमी कुछ और कहती है । छाती पर जमी कोई टीस है , कई स्मृतियाँ हैं । जो सबसे नज़दीक की हैं , उन्हें भूल जाना चाहती हूँ , जो पुरानी हैं आज सिर्फ उन्हें याद करना चाहती हूँ , आज खुश रहना चाहती हूँ , आपके लिये

आपकी सब तकलीफें बिसरा देना चाहती हूँ , आपकी हँसी याद रखना चाहती हूँ । कैसी चकमक आपकी आवाज़ की बुलन्दी , उसकी चादर ओढ़ हँसना चाहती हूँ , लेकिन हँसते हँसते कैसी रुलाई फूट पड़ती है , देखते हैं न आप । दिन बीत चला रात ढलने को हुई और संगीत का ये सुर भीतर कहीं बजता है , बस आपके लिये

(नाना मस्कूरी ..अमेज़िंग ग्रेस )


4/23/2010

खुद से

मुर्गाबियों का झुँड पानी की सतह पर उतरता है । जैसे साँझ उतरती है । पानी पर पहले उतरती है , पेड़ की पत्तियों से छनकर । आसमान में जबकि अब भी दिन का आभास बाकी है । ये दिन का वो समय है जब खुद से बात की जा सके,रफ्ता रफ्ता ,सोचकर रुककर समझकर टटोलकर,अपनी आत्मा को खुरचकर । अंतरतम का कोई कमरा जिसका दरवाज़ा ज़रा सा खुल जाये , कोई रौशनी की लकीर दिख पड़े । ऐसे बात , जैसे किसी से न की हो , मोहब्बत से , कोमलता से , विवेक से । छाती के भीतर कुछ घना सघन जंगल उगता है , उसकी महक मारक है , उसके काँटे बींधते हैं ।
ऐसे गहरे गहन समय में जब खुद से बात की जा सके
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पानी में डूब जाना दुनिया भुला देना होता है क्या ? हर बार उन्हीं अँधेरों में चलना , किसी बन्द गली के आखिरी मकान का कभी न खुलने वाला दरवाज़ा , सिर पटकना फिर सिर झुकाये कँधे गिराये रुकना कुछ देर फिर लौट आना , हर बार
हर बार अंतरंगता की चादर ओढ़ना , साथ साथ उदास गलियों के भूल जाने वाले नामों में भटकना , कहना कि मुझे खींच लो बाहर , मेरे लिये सिर्फ मेरे लिये , मुड़ना मुड़ना मुड़ना और चाहना , कितना कुछ , हाथ बढ़ाना इस उम्मीद के साथ कि थाम लोगे , हर बार , ओह निष्ठुर मन , कितना निर्विकार तुम्हारा ऐसा चाहना , क्यों न निस्संग ? आखिर ?
किसी घने वृक्ष के नीचे लेटना और आसमान तकना , किसी पुराने खंडहर मंदिर के गर्भगृह में मौन बैठना , हर बार खुद से बात करना , और कहना आसमान , और कहना कोई लम्बी कथा , छाती फट जाये ऐसी कथा , सोच लेना और खुश हो लेना

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दुख की बड़ी जानी पहचानी वही कहानी होती है , सुख आता है हर बार नये रंग में । लौटना फिर परिचित रास्तों पर ? सुकूनदेह है । सुख , कहते हैं अब पोसाता नहीं , उस काली बिल्ली जैसे जो हर रात दूध पीकर निकल भागती है सड़कों पर आवारागर्दी करने ।
पानी के किनारे चिड़िया चहचहातीं हैं कुछ देर , क्रेसेंडो में उठता ऑरकेस्ट्रा फिर नीरव शाँति , फिर अँधकार । फिर खोजना उसमें मायने , फिर भर लेना अर्थ , फिर जीना तरंगित हो कर , हाथ बढ़ाना फिर मुस्कुरा कर , गहरी साँस भरना , पूरा और लौट आना रौशनी में , हर बार
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भीतर एक नमी थी । छूओ तो उँगलियाँ भीग जायें । मैं तुमसे कहती , आज मेरे भीतर उदासी है , धीमे संगीत जैसा , जैसे भीतर कोई कूँआ हो जिसका तल न दिखता हो । और उसका पानी हथेलियों में भरो तो हाथ न दिखता हो । और बस ये कि इतना भर ही मैं खुद को जानती हूँ , फिर इससे ज़्यादा तुम मुझे क्या जानोगे ।
मेरे भीतर मुझसे भी बड़ी तस्वीर है जिसका ओर छोर नहीं , मीठा संगीत है , मन मोह लेने वाला , खुद को मुग्ध कर देने वाला , ऐसे रंग हैं जिन्हें आँखों ने देखा नहीं , ऐसा लय है जो शरीर के भीतर भी है और बाहर भी , मेरे भीतर मैं हूँ , मैं , जो तुम देख नहीं पाते उतना मैं , जितना मैं समझ पाती हूँ उससे भी ज़्यादा मैं ।
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धुँधले अँधेरों में , जब कुछ न दिखता हो तब खुद को देखना अच्छा लगता है

(गोगां की ताहितियन लैंडस्केप )

4/14/2010

कि ज़मीं से भी कभी आसमाँ मिल गया

बम्बई की खाली सड़कें , मरीन ड्राईव का कर्व , बारिश के झपाटे , नवीन निश्चल और प्रिया राजवंश , हँसते ज़ख्म रोते दर्शक , रात में शहर , ऑरकेस्ट्रा के बीच गाड़ी तेज़ी से गीले सड़क पर भागती घूमती , रौशनी , अँधेरा , बारिश प्यार , तेज़ तेज़ मीठा मीठा फिर हँसी और धुँआ और समन्दर की बौछार ..
डेडपैन एक्स्प्रेशंस दोनो ऐक्टर्स के .. फिर उसी डेडपैन चेहरे और चलती फियेट के पीछे नकली भागते शहर के बीच संगीत का ऐसे सेंसुअस तरीके से भरना , कैफी मदन मोहन और रफी .. सचमुच थोड़ा सा दिल किसी अरमान में टूट जाता है , किस गये समय का जादू , नकली सेट के बेतुकेपन के बीच अचानक कैसे मीठे रूमान का खिल उठना ..