1/15/2009

ज़ायके का दिन

रेस्तरां में एक दिन ....









(चार पाँच महीने पहले खींची गई तस्वीरें )

1/13/2009

दरवाज़े के पार ?



( इरानी फिल्म निर्देशक अब्बास कियारोस्तामी , उन पहाड़ियों पर जहाँ उनकी फिल्म टेस्ट ऑफ चेरी शूट की गई थी )

1/03/2009

अब जंगली हरियाले तोते शोर मचाते नहीं उतरते आम के पेड़ों पर

आम के बगीचे के पास रास्ता पक कर धूसर हो गया है , घास ऐसे उड़ गई है जैसे अब इस पत्थर से सख्त ज़मीन पर कोई दूब उगेगा नहीं । लोगों के पैरों की चाप ने ऐसी गत कर दी है । जब उस ज़माने में दीवार मज़बूत थी तब परिंदा नहीं फटकता था बगीचे में । बगल वाले बरामदे में खटिया पर बैठे ईया यही देखतीं है । चाय का गिलास तक उठाते हाथ काँपते हैं अब । सब त्वचा झिंगुर कर सिकुड़ गई है , बाल सन से सफेद । तब हरियाले तोतों का झुँड पेड़ की फुनगी पर आ बैठता था । जंगली तोते । सुनहरे पिंजरे में कैद मीठू राम कैसा शोर मचाता था तब । कैसे पँख फड़फड़ाता था बेचैन अकुलाहट में कि डर में ?

पिछवाड़े वाली खपड़ैल छप्पर अब आधी ढह चुकी । जंगली घास और झाड़ उग आये हैं । पिछली बरसात तो एक करैत निकल गया था शाम को । पेट्रोमैक्स की रौशनी में डंडों से उसका हाँका गया था । फिर दीना उसका कुचला निर्जीव शरीर पतली लम्बी छड़ी पर लटकाये सबको दिखाता फिरा था ।
बड़ा ज़हरवाला साँप था हुज़ूर , उसकी काली आँखें चमकीं थीं । कितने दिनों तक , अरे वही दिन जब करैत मारा था , के संदर्भ से बात करता रहा था दीना ।

आँगन के छोर पर चाँपाकल वाला चबूतरा भी टूट चला । जब से पानी का नल लग गया , उसकी पूछ कम गई । अब कभी चलता भी है तो कैसा लोहराईन , गंदला भूरा पानी निकलता है । पाईप में जंग लग गया होगा जरूर । बच्चे कभी हो हल्ला करते हुमच हुमच कर चलाते हैं तब छेहर सी पानी की मरियल धार निकलती है । चबूतरे के टूटे कोने पर पुदीने की बेल कैसे लहक कर फैली है और उसके एक ओर मेंहदी की झाड़ । पिंकी जब तब कटोरी भर पत्ता सिलौट पर पीस कर जिस तिस को पकड़ कर मनोयोग से हथेली पर अठन्नी जैसा गोला और तीनपत्तिया फूल काढ़ती है । बीस साल की दुबली पतली मैट्रिक पास पिंकी जिसको पिछले छह महीने से ससुराल वाले नैहर ठेल आये हैं । दोपहर को सर झुका कर सरसों के झोल वाली मछली पकाती है , मूड़ी तलती है । जब तक मछली सरसों तेल में तलता है , पीढ़े पर बैठी , घुटनों पर बाँह धरे , लकड़ी के आग को देखते जाने क्या क्या सोचती है ।

अम्मा कहती हैं , लम्बी साँस भरकर , सिलाई स्कूल में नाम लिखा दें ? इस साल बरसात के पहले छत भी छवाना है , नया छाता खरीदना है , मिंटू के स्कूल का फीस भरना है , बाबुजी के लिये नया प्रिंसकोट बनवाना है , और और पिंकी के ससुराल भी तो जाना चाहिये न एक बार ? आखिर कोई कारण तो बताये ? ऐसे बेबात लड़की को छोड़ देता है क्या ? किसी अंदेशे से उनकी छाती धौंक जाती है , हथेलियाँ ठंडी हो जाती हैं । बाबुजी अचानक अलगनी से लटका बंडी उतारकर पहनते हैं और बिना कुछ बोले निकल जाते हैं । अब जाने कब लौटेंगे । जब से सस्पेंड हुये हैं तब से एकदम चुप्पा हो गये हैं ।


ईया झुकी कमर को सहारा देतीं खटिया से उठती हैं । निहुर कर अपनी कोठरी में घुसती हैं । बाहर की चकचक धूप के बाद आँख एकदम अँधिया जाती है ..अंदर ठंडा अँधेरा है , बांस की अलगनी पर कथरी और चादर मोड़ कर लटका है , चौकी के बगल में थूकदान और हुक्का , चीकट तकिये के ऊपर पूरी बाँही का ब्लाउज़ और किनारी वाली धोती , सीट कर चपोत कर तहाया हुआ । भूख लग गई है । पुकारती हैं , पिंकी पिंकी ..


सामने एक तस्वीर टंगी है फ्रेम में । घर के मालिक शेरवानी अचकन पहने , सर पर टोपी धारे कुर्सी पर बैठे हैं , दोनों हाथ नक्काशीदार छड़ी की मूठ पर टिकाये । बगल में ईया , तब की तीस साल की , सीधा पल्ला साड़ी और बालों की काकुलपत्ती के बीच शरमाती हँसती आँखों से सामने देखतीं और पैर के पास दो गदबद बच्चे और किनारे एक अदद झबरीला कुत्ता । पीछे डाकबंगला नुमा विशाल घर के सामने का हिस्सा पीछे के बैकग़ाउंड में घुलता फ्रीज़ होता है ।


अब जंगली हरियाले तोते शोर मचाते नहीं उतरते आम के पेड़ों पर ।