12/07/2007

टू गो व्हेयर नो मैन हैज़ गॉन बिफोर

(डायरी का पहला पन्ना ........ जो लिखा गया नहीं है अभी इस समय में , किसी भी समय में पर जो घटता है इस समय में , किसी भी समय में )


सब चीज़े ऐसे ही धीरे धीरे चुक जाती हैं बेसान गुमान के । मैग़्नीफाईंग ग्लास का शीशा खेल खेल में कलाई पर रखा तो मग्नीफाईड कोशिकाओं का जाल किसी सौ साल के बुड्ढे की चमड़ी दिखा गया । सिहर कर आँख बन्द की तो लेकिन तब तक सिहरन दौड़ चुकी था शिराओं में । धूप में बैठे सुसुम वाईन का घूँट मुँह के अंदर ज़ुबान पर गुनगुना था और गुनगुना था जीवन का बीतना मुँदी आँखों के भीतर किसी सूरज का चमकना किसी नये तारे का जनमना ।

मिमोसा के पत्तों पर नीचे एक भुआ पिल्लू स्थिर जड़ा था । लैब के अंदर कुछ रहस्यमय कारगुज़ारी चल रही थी । चश्मे के मोटे शीशे भाप से धुँधलाये थे । आकृतियाँ रेटिना के पहले बनती थीं और दिमाग के न्यूरांस चटक रहे थे । तारों और पाईप्स का जाल । पूरा सयंत्र क्रोम प्लेटेड चमचमाता , न एक कण धूल । कंट्रोल्ड अटमॉसफियर !

पेट्री डिश में उबल रहे थे बुलबुले नीले और नीले । डीप फ्रीज़र में न्यून्तम तापमान कल्पना के परे था , कोई फ्रिजिड ज़ोन । जहाँ साँस थम जाती है , लहू जम जाता है , हृदय धड़कना बन्द करता है ..एक पल का एक सदी का आराम । उस क्षण के ठीक ठीक बाद फिर दुगुने आवेग से सब शुरु होगा , नया जलसा नया आयोजन..एक और नया त्यौहार । कोई पुच्छल तारा टूटा है अभी अभी कहीं।

भुआ पिल्लू सरक कर दूसरे पत्ते की टहनी तक पहुँच गया है । मेरे वाईन खत्म करते करते नीचे की काली मिट्टी तक पहुँच जायेगा , इसके आज के जीवन का प्रयोजन जैसे मेरा.... इस वाईन को खत्म कर के सफेद लैब कोट धार के झुकूँगा मेज पर , उठाऊँगा फॉरसेप से एक महीन बुलबुला और फूट पड़ेगा बेइंतहा कोई छतफोड़ ठहाका ?

फिलहाल टाँगे आगे फैलाये धूप चेहरे पर लेते बीतता है एक पल फिर एक पल । किसी और समय में घटित होती हैं किसी और के जीवन की बातें । किसी फिबोनाची नम्बर्स का जादू उलझाता है किसी दिमाग को , कितनी चालें ? शह और मात । घोड़े प्यादे और वज़ीर लेते हैं डेढ़ चाल , पिटती है रानी , गिरता है शहसवार मैदाने जंग में , छोड़ती है हेलेन मेनेलॉस को किसी पेरिस की चाह में ..यही था वो चेहरा दैट लौंच्ड अ थाउज़ैंड शिप्स ? क्रूर क्रूर नियति , क्रूर जीवन की गति ।

मुन्दी आँखों के भीतर सब घटता है एक एक करके , कभी सिलसिलेवार कभी बेतरतीब । मैं भी घट रहा हूँ शायद किसी और की मुँदी आँखों के भीतर ? या क्या पता किसी भुआ पिल्लू के सरकने जैसा ही निष्प्रयोजन है मेरा अस्तित्व ? फिर कहाँ जाना चाहता हूँ मैं ? वहाँ कहाँ जहाँ कोई अब तक गया नहीं । व्हेयर नो मैन हैज़ गॉन बिफोर ?

12/06/2007

नीचे पल्प की दुकान ऊपर खाली आसमान

पात्र ..सिर्फ दो ..बोबा बे और रामिनी ममानी
स्थान लक्मे ब्यूटी सलून
समय दोपहर साढ़े तीन बजे
दिन आह सप्ताह खत्म होने को चला ..आज शुक्रवार है



(बालों पर ड्रायर का हेल्मेट पहने , चेहरे पर लेप प्रलेप लगाये , आँखों पर खीरा के दो गोल टुकड़े सजाये )


र: कुछ सोचा हमारे ज्वायंट वेंचर के बारे में ? धूप में बैठकर गैलेरिया टाईप किताब और म्यूज़िक की दुकान चलाने का मज़ा ... साथ में कॉफी शॉप

ब: वेरी अप मार्केट और हम सिर्फ एक्सेंटेड अंग्रेज़ी बोलें

र: अरे रिवर्स स्नॉबरी भी चल सकती है । भोजपुरी या हिन्दी ?
ब: या तो एक्सेंटेड अंग्रेज़ी या फिर ठेठ भोजपुरी ..जो अंग्रेज़ी बोले उससे भोजपुरी बोलें और वाईसवर्सा ....

र: और क्या पहनें ? हैंडलूम की साड़ी या किरण बेदी टाईप कुर्ता विद जैकेट

ब: सीधे कटे स्फेद स्याह बाल .... बीड्स और लकडी की चीज़ें .... बहुत सारा ऑरगैनिक स्टफ

र: बड़ी बिन्दी ? डॉली ठाकोर या स्वप्न सुंदरी ?

ब: काजल , सुरमा और देसी चाँदी के गहने ?

र: सारे एथनिक कपड़े...कुच्छी लहँगे ..मोजरी ... लिनेन लिनेन

ब: सिर्फ इसोटेरिक जारगन बोलें ..नाक हवा में ... शोभा दे टाईप बिची बिच ?

र: एक्सिस्टेंशियलिज़्म ? मेटा फिज़िकल ? इम्पेरीसिज़्म ....एपिस्टेमेलॉजी ....वगैरह वगैरह ?

ब: शायद एक सिगरेट चाँदी के होल्डर में जो हम कभी फूकेंगे नहीं , सिर्फ प्रभाव के लिये ( मुझे तो आस्थमा की बीमारी है )

र: या फिर बीड़ी ? पान रंगे दाँत भी हो सकते हैं ..वहीदा रहमान जैसे ?

ब: बीड़ी जिसे हम ऑफर करें वीआईपी कस्टमर्स को ..नक्काशीदार ट्रे में ?

र: हाँ जी

ब:: जिसको बीड़ी ऑफर किया समझो दे हैव अराईव्ड

र:फिर लम्बी लाईन ..दुकान के बाहर

ब: हमारी दुकान के बाहर दिखना माने स्टैटस सिम्बल

र: फिर हम आई एस ओ सर्टिफिकेट भी ले लेंगे

ब: नहीं लम्बी लाईन नहीं ..वेरी सेलेक्टिव .. हेवी ड्यूटी डिसकशन ..माल खरीदो सौ के बात करो हज़ार के

र: ओह ला..डी डा .. वेवी वेवी अपर क्लास !

ब: ये भी हम तय करेंगे कौन अपर क्लास ..पारंपरिक मूल्यों को उलट पुलट देंगे

र: हाँ जी .. अरोमैटिक पॉटपोरीज़ बिखरे इधर उधर और एक तरफ गोबर अपनी मिट्टी से जुड़े होने का असर दिखाता

ब: कुल्हड़ में चाय और गोबर गैस की अंगीठी ?

र: पेज थ्री सोशलाअईट्स लड़ मर रहेंगी गोबर पाथने के लिये ....ऊह वॉट ऐन एक्स्पीरीयंस ...ट्रूली माईंड ब्लोईंग न ? लेट्स चिल आउट बेबी !

ब: हाँ .. मेरा गोईठा तेरे से अच्छा टर्न आउट किया मैन

र: डिज़ाईनर वंस ओनली ? क्या

ब: मार्केटिंग मार्केटिंग .. फिर शुरु करें

र: (उबासी ) अगले हफ्ते पेडिक्योर कराने आते हैं ..तब तक ...सोचते हैं ..( रेस्तरां ...डिज़ाईनिंग ...और क्या क्या करें .....बोबा का क्या ..पल्प लिखा ..ऐश की ...)

लिखवैया .. पी स्कायर ..मतलब दो प ..बूझो कौन ? ओह ! कितना फलसफा ?

12/04/2007

प्यार में माईग्रेन ?

काली कॉफी के तल में छूटी हुई हैं कुछ बातें । धूप की सीढ़ी चढ़ दिन पहुँच जाता है छत पर , सो जाता है अलस्त दोपहरी ।

आर यू हैप्पी ? सिगरेट की राख सवाल के साथ साथ भुरभुरा कर गिरती है ट्रे पर ।

सामने बच्चे खेलते हैं फव्वारे के चारो ओर । हवा बहती है छूती है इसको उसको , कोई स्कार्फ , कोई शॉल हिलता फड़फड़ाता है । सेल पर बात करती लड़की हँसती है अचानक । चौंक कर मुड़कर देखती है फिर मगन हो जाती है । कॉफी का प्याला प्लेट पर गोल घुमाती औरत सोचती नहीं है । दिन के इस वक्त जड़ा हुआ ये पल तौलती है । आदमी के आर यू हैप्पी को तौलती है । तौलती है दर्द के चिलकने को । टीस की टोपी ओढ़े सिर थामे स्थिर ।

आदमी बाहर देखता है ,सिगरेट फूँकता है । सब तरफ देखता है । औरत आदमी को देखती है । उसके न देखने को देखती है । फिर बैग से निकालकर कोई सा भी पेनकिलर गटकती है । क्या फर्क पड़ता है ।

कमरे में बिखरी हैं नीली दरियाँ । हर रंग का नीला । और कोने में इज़ेल , आधा चेहरा । बेंत के काउच पर अब भी निशान है देह के ढलकने की ,बाल के एक रेशे की , रात के स्मृति की । बाहर पेशियो पर गीले पत्ते सिहरते हैं कुहासे में । ठंड चाय की प्याली में डूबता उतराता है । गद्दे पर निढाल पड़े आदमी को देखती है औरत । पीछे बजता है कोई धुन रेडियो पर ,काँपती है आवाज़ । आदमी की उँगलियों पर अब भी निशान हैं पेंट के । तारपीन के तेल की महक सूँघती है औरत नाक भर कर ।

एक नस फिर तड़कता है , बिजली फिर कौंधती है । औरत सोचती है आज भी असर नहीं हुआ , ये कमबख्त पेनकिलर ! इज़ेल के आधे चेहरे में ढूँढती है हैप्पीनेस का डेफिनेशन ।