1/25/2011

सफेद बगूले अपना आसमान


किसी दिन 
अभी सोचते किसी दिन
आयेगा कभी
जब सूरज लाल होगा 
और आत्मा दीप्त 
जब नदी बहेगी 
शरीर होगा मीठा तरल
शब्द संगीत होगा 
धूप होगी 
रात भी
तीन तरह के रंग होंगे
किसी के चेहरे पर आयेगा
बेतरह प्यार
उसके जाने बिना
जानना होगा 
कि अब भी 
खिलता है एहसास
जबकि लगता था 
इतनी हिंसा 
इतनी बेईंसाफी 
इतना घाव
इतने दंश 
सोख कर 
भूल जाती आत्मा
ओह ज़रूर भूल जाती होगी 
आत्मा अपनी आत्मा


कहते हैं हाथी
स्मृति की छाप
ढोते हैं पीढ़ियों तक
और कबूतर उड़ते हैं
हज़ारों मील
चीटिंयाँ अपना बिल
सफेद बगुले अपने आसमान
कोई कछुआ तालाब
मैं बचपन की काटी पीटी किताब

माँ कहती हैं ऐसे शब्द
जिन्हें भूल गई थी मैं
जैसे भूल गई थी धूप में बैठकर
मूँगफली नहीं चिनिया बदाम खाना
जैसे भूल गई थी रिबन
और टॉर्टाय्ज़ शेल वाले चश्मे
जैसे ये भी कि पहली दफा कब सुना था
पंडित भीमसेन जोशी को
"कंचन सिंहासन"
और अब खोजने पर भी नहीं मिलता यू ट्यूब पर
जैसे लम्बे बाल कैसे बहन ने हँसते काट डाले थे 
जान गई थी मेरे कहे बिना कि
मुझसे ऐसे झमेले सधते नहीं
जैसे जानती थी ये भी बिना
मेरे कहे कि चूड़ियाँ अच्छी लगती थीं
और पढ़ सकती थी रात भर
मैं किताब जाड़े के दिनों में
रज़ाई के भीतर टॉर्च जलाये
और रह सकती थी भूखी , पूरे दिन
माँ से नाराज़ होने पर
लड़ सकती थी किसी के लिये भी
महीनों साल दिन
कि गुस्सा सुलगता था मेरे भीतर आग

अब कहती है बहन , तुम्हें पहचानना मुश्किल
जब कहती हूँ मैं , मेरे भीतर सुकून
जब कहती हूँ मैं , शब्द मेरे भीतर जलते भाप के कुंड
जब कहती हूँ रिश्तेदारों के धोखे अब दिखते नहीं
जब कहती हूँ कोई पंछी चक्कर काटता उठता है
लगातार भीतर
जब पूरी नहीं होती कविता और
अधूरी छूटी रहती कहानी
लावारिस पड़ा रहता घर
और छूटते बिसूरते बच्चे होते
खुद में मगन
पढ़ा जाता प्रेम
और पकाई जाती नफरत
सीखा जाता अर्शिया से बँगाली कशीदाकारी
की महीन हर्फें
और हुआ जाता खुश
तुम्हारी हँसी के गुनगुने घूँट में
और समझाया जाता दोस्तों को
एक बार फिर
मोहब्बत में पड़ने को
और बोला जाता ज़ोर से
ऐसे शब्द जो होंठों और जीभ पर
छोड़ते भाप
गर्म गुलाब जामुन
तहज़ीबदार , तमीज़दार
हँसा जाता ठठाकर बेशउर
फिर रोकी जाती हँसी
कि बुरा ना माने कोई
कि मेरी खुशी दूसरों के
तकलीफ का सबब न बने
कि
किसी दिन
होगा सब
जैसे
होना
लिखा है
किसी दिन
किसी एक दिन

जैसे पृथ्वी
जैसे पक्षी
जैसे देव
और दानव
अच्छा और बुरा
जैसे प्राणी सिमटा
एक बिंदु
मृत्यु
फिर जीवन
और इसके बीच का
मोहक लम्बा अंतराल




(नंद कात्याल की पेंटिंग )

15 comments:

पारुल "पुखराज" said...

इस कहे में बहुत स्वाद है..

वाणी गीत said...

इतनी हिंसा इतनी बेईंसाफी इतना घाव इतने दंश सोख कर भूल जाती ...
आत्मा होती तो कैसे भूलती ..

चिनिया बादाम सालों बाद इस शब्द को पढना अच्छा लगा ...मूंगफली में वो स्वाद कहाँ :)

Satish Chandra Satyarthi said...

क्या खूब लिखा है!!!
बधाई...

प्रवीण पाण्डेय said...

यह प्रतीक्षा सब समेटे है।

Rahul Singh said...

मधुर भावों का सहज प्रवाह.

Aparna Manoj Bhatnagar said...

जैसे चित्र खींच देता है कोई
आँख के कैनवास पर
उतर जाते हैं सफ़ेद बगूले
एक आसमान
...... कितना विस्तार है ; सुन्दर ! बेहद खूबसूरत ! प्रत्यक्षा..

स्वप्नदर्शी said...

fantabulous!

डॉ .अनुराग said...

.कोई दिन....जिंदगानी ओर है....

love the way you write......

सबके पास होता है एक दिन......

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत सुन्दर लिखा है आपने..
.आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी आज के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
आज (28/1/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
http://charchamanch.uchcharan.com

अतुल प्रकाश त्रिवेदी said...

कहते हैं हाथी
स्मृति की छाप
ढोते हैं पीढ़ियों तक
और कबूतर उड़ते हैं
हज़ारों मील
चीटिंयाँ अपना बिल
सफेद बगुले अपने आसमान
कोई कछुआ तालाब
मैं बचपन की काटी पीटी किताब|


बहुत ही भाव प्रवाह लिए पंक्तियाँ |
बहुत दिनों बाद कुछ पढ़कर, बहुत अच्छा लगा |

दीप्ति शर्मा said...

bahut sunder
sara kuch kah diya aapne to
...

lazy lamhe said...

aapko pad kar bahut achchha lagta hai....anchhui baatein aap sarlta se kah jati hai jo dil ko chhu jati hai..
i am in love with ur words !

mridula pradhan said...

bahut sunder likhi hain.

आवेश said...

आज में बीते हुए कल को देखने की कोशिश साहसिक है |कभी कुंठा नहीं होती उधर देख कर ?या फिर भूत को भी दायरों में बाँट रखा है ?जो भी हो ,अच्छी कविता

नीरज बसलियाल said...

अच्छी लगी