12/21/2010

स्टिल लाईफ

कुछ सिलसिलों में इधर चीन पर बहुत कुछ सामग्री पढ़ने देखने में गुज़री । यांगत्से पर एक डॉक्यूमेंटरी , फिर जिया ज़ांगकी  की स्टिल लाईफ । थ्री गॉर्जेस डैम पर बहुत सारे आलेख । नदी की कहानी , शहरों की कहानी , बाढ़ से विस्थापित लोगों की कहानी , चीनी सभ्यता की कहानी , उनका खान पान , इतिहास , संगीत .. बहुत कुछ । उतना सब जो चीन घूम आने के बावज़ूद नहीं दिखा था , नहीं देखा था ।
स्टिल लाईफ , दो लोगों के थ्री गॉर्जेस डैम की पृष्ठभूमि में अपने जीवन साथी की तलाश  की कहानी है , साथ ही कलाकार लियू ज़िअओदांग पर बनी वृत्त चित्र दान्ग साथ साथ चलती है ।

यांगत्से डॉक्यूमेंटरी एलेन पेरी ने बनाई है और फिल्म में ऐसे बहुत मौके हैं जब नदी की महिमा अपने पूरी गरिमा में दिखती है । नदी के किनारे रहने वाले लोग जिन्हें बाँध की वजह से विस्थापित किया गया , नदी में भयानक बाढ़ के दृश्य , चीनी सरकारी पक्ष , बाँध की वजह से होने वाले नुकसान और नफे की कहानियाँ , सरकारी भ्रष्टाचार के किस्से , उनके आँकड़े , आम आदमी की सोच , स्थानांतरित लोगों की तकलीफ , बहुत बड़े बड़े आँकड़े , पश्चिमी नज़रिया ..कहते हैं थ्री गॉर्जेस डैम इज़ अ मॉडेल फॉर डिज़ास्टर किसी सीसमिक फॉल्ट लाईन पर बना बाँध कभी भी भीषण विपदा का कारण बन सकता है । जैसे कैलीफोर्निया के सियेरा नेवाडा पहाड़ियों की तलहटी में बना ओर्वील डैम । या फिर जिसे कहते हैं रिज़रवायर इंडूस्ड सीस्मिसिटी । इतना जल कि उसके दबाव से भूकंप आ जाये ।

इन सब आँकड़ों की बौछार के परे यांगत्से और स्टिल लाईफ में हम वही दुनिया देखते हैं जो बहुत कुछ हमारी ही दुनिया है ।स्टिल लाईफ् का नायक हान सान मिंग पूरी फिल्म में एक बनियान में दिखता है । उसके चेहरे पर बिना किसी नाटक के अथाह दुख है । फिल्म के पात्र फुंगशी के विरान ढहते हुये शहर में बिना जड़ों के घूमते दिखते हैं । शहर बाँध बँधने की वजह से बाढ़ की प्रत्याशा में ध्वस्त किया जा रहा है । फिल्म मलबों के ढेर से गुज़रती , छोटे घरों के सफेद मटमैले चूने लगी दीवारों और काठ के दरवाज़ों से गुज़रती नदी तक पहुँचती है । ये दृश्य भारत के किसी भी छोटे शहर का हो सकता है , बिलासपुर , चक्रधरपुर , चाईबासा , कहीं का भी । और हान सान मिंग भी यहीं कहीं का हो सकता है । जिसके चेहरे के निर्विकार स्वरूप में तकलीफ को झेल लेने की असीम शक्ति दिखती है । फिल्म शेन हॉंग की कहानी भी है जो अपने दो साल से गायब पति की खोज में फुंगशी पहुँची है । ऊँचे पहाड़ और विशाल नदी की प्राकृतिक सुंदरता के बीच मनुष्य द्वारा बनाया ध्वस्त शहर के मलबे की विलोम दुनिया है , एक बच्चे का गीत है अपने बालपन की निर्दोष आवाज़ में , हान सान मिंग की पत्नी के भाई हैं जो उसके सामने पतली सी जगह में अड़से नूडल खाते हैं बिना उससे आग्रह किये हुये और हान है , वापस शाँग्सी लौटने के पहले साथियों में सिगरेट बाँटता , एक साथी हाथ जोड़ कर विनम्र मनाही करता है , शेन हॉंग अपने पति के कँधे से लग कर नदी के किनारे , डैम की पृष्ठभूमि में नृत्य करते फिर कुछ हैरत से अलग होते , हमेशा के लिये अलग होने और शहर के घरों की दीवारों पर अंकित जल स्तर की ग्राफिति कि यहाँ तक शहर जल प्लावित हो जायेगा ।
यांगत्से इन्हीं कहानियों को आँकड़ों और तर्क के साथ पेश करती है । किसी भी आधुनिक औध्योगिक परियोजना को बनाने में नैतिक , पर्यावरणीय , अर्थशास्त्रीय और राजनैतिक मूल्यों के इर्द गिर्द उसका निष्पक्ष आकलन कर लेना आसान नहीं होता ।

स्टिल लाईफ और यांग्त्से में जो दुनिया है वो हमारी दुनिया है , उतनी ही कंगाली और भुखमरी की दुनिया जबकि यूरोपियन सिनेमा में गरीबी भी हमारी नज़र में एक रूमानी गरीबी है जैसे ज़्यां द फ्लोरेत में जेरर्द देपारदियू वाईन पीते दुखी होता है कि इस मौसम अगर बरसात न हुई तो वो तबाह हो जायेगा । उसके कपड़े , जूते , हैट तक सलामत साबुत होते हैं , उनकी गरीबी में भी एक किस्म की डिगनिटी होती है । हनी अबु असद की पैराडाईज़ नाउ में भी सईद का घर , जिसे वो कहते हैं कि यहाँ रहने से मर जाना बेहतर है , नाब्लुस में रहना किसी जेल में रहने जैसा है , भी हमारे यहाँ किसी मध्यम वर्गीय रहन सहन जैसा दिखता है । मजीदी की सॉंग ऑफ स्परोज़ में भी ऐसी बदहाल गरीबी का आलम नहीं होता या फिर बरान में भी अथाह गरीबी के आलम में भी बरान के पैरों में जूते होते हैं । जबकि हमारे यहाँ गरीबी माने शरीर को सही तरीके से ढकने को कपड़ों का न होना , दो जून भोजन का न होना , मौसम की मार बचाने को सलामत घर का न होना ।अलग सभ्यताओं में गरीबी की परिभाषा भी अलग होती है ये समझना मुश्किल नहीं फिर भी किसी भोलेपन में इस फर्क को देख लेना हैरान करता है ।

ऐसी और कितनी फिल्में होंगी जो जाने कितनी अलग दुनिया के वितान बुन रही होंगी । जिया की फिल्म अपने दिखने के बाद छाती में उस संगीत की तरह धँस जाती है जो आपकी ज़ुबान पर अटका रहता है , आप चाहे उसे लाख भूलें कोई धुन आपके भीतर बजती है । हो सकता चीन पढ़ते पढ़ते उसकी दुनिया भीतर फैल गई हो , पिछले दिनों किसी तिब्बती मार्केट में सुना संगीत भी कहीं अपना लगा था , हो सकता है किताबें और सिनेमा आपके साथ यही खेल करती हों कि जो दुनिया अपनी न हो वही खूब खूब अपनी लगे , कि कोई बू सान या ली फेन किसी दिलीप हेम्बरम या राफेल तिग्गा जैसा अपना लगे , कि कोई चॉंगचिंग की गली में चाईबासा का रास्ता दिख जाये और यांग्त्से देखते ऋषिकेश के भी ऊपर चढ़ते गँगा की विशाल धारा की याद आये और यांगत्से में चलते नावों को देखते कोथाय पाबो तारे के मुर्शेद गाज़ी की याद आ जाये ।

सिनेमा लगभग एक कविता की तरह चलती है , धीरे धीरे , क्षय और पतन की कविता , उम्मीद और निराशा के बीच सहज मानवीय उष्मा का जनमना और लाख मुसीबतों के बावज़ूद ज़िंदगी किसी भरोसे के बल पर गरिमा से जी लेना ।  

किसी भी अच्छी किताब और अच्छी फिल्म की संगत आपके साथ यही करती है कि आप बहुत बाद तक एक गुफ्तगू में उसके साथ बँधे होते हैं जैसे किसी अंतरंग का साथ आपको अमीर करता है ठीक वैसे ही .. जैसे इस फिल्म के साथ या जैसे अभी खत्म की गई वाईनसबर्ग ओहायो पढ़कर पानी में धीमे बैठ जाने की अनुभूति हो , वैसे ।

8 comments:

डॉ .अनुराग said...

किसी भी अच्छी किताब और अच्छी फिल्म की संगत आपके साथ यही करती है कि आप बहुत बाद तक एक गुफ्तगू में उसके साथ बँधे होते हैं जैसे किसी अंतरंग का साथ आपको अमीर करता है


well said.....

नीरज बसलियाल said...

मेरे इमेजिनेशन में ही शायद कमजोरी हो, लेकिन मुझे सिनेमा किताबों से बहुत ज्यादा आकर्षित करता है | एक भावहीन चेहरा बस्टर कीटन का जो कह देता है उसे मैं लाख कोशिशों के बावजूद कागज़ पर नहीं लिख पाता, या देख पाता |

प्रवीण पाण्डेय said...

समझ नहीं आता है कि फिल्में किसलिये देखी जायें, रूमानी या सत्य।

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Geet Chaturvedi said...

स्टिल लाइफ़ को चीन की रेस्ट्रिक्‍टेड इकॉनमी की ऐलीगरी की तरह भी पढ़ सकते हैं. उदासी का उत्‍पात मचता है झांगके में.
सही है. सॉलिड है. :-)

Geet Chaturvedi said...

स्टिल लाइफ़ को चीन की रेस्ट्रिक्‍टेड इकॉनमी की ऐलीगरी की तरह भी पढ़ा जा सकता है. तुमने इशारे भी किए हैं. वह आर्थिक-राजनीति का मिनिमलिस्‍ट फिल्‍मकार है, उदासियों का उत्‍पात मचाता हुआ.
सही लिखा है, सॉलिड लिखा है.

Satish Chandra Satyarthi said...

इस रोमांचक यात्रा पर ले चलने के लिए आभार..
मुझे तो ऐसी फ़िल्में देखना या किताबें पढ़ना हमेशा रोमांचक लगता है जिनमें अपनी जान-पहचान की जगहों से अलग दुनिया के किसी और हिस्से को दिखाया गया हो..

Oshiya Manmukta said...

Yaang-Tse ke sath
Chuang-Tse ka khayaal aaya,
Jisne kaha tha :
"Duniya hamaare baavujood
Samoochi sundar aur paawan hai."

Ham beech me se khud ko hata len
Toh astittva ki khoobsoorti ko
Achhooti nazar se
Dekh akte hain.

Is peshkash ke liye bhi dhanyawaad.