4/10/2010

बिना ज़मीन जंगल पानी के ..हम कहाँ जायें ?

ऐसा समय है किसी का किसी पर विश्‍वास नहीं । आप पर मेरा और आपको मेरा विश्‍वास नहीं । उस दूसरे पर तो हम दोनों को ही भरोसा नहीं जो अपनी पहचानी भूमिका, बहत हद तक हमारे ओर से आरोपित, से अलग किसी नयी शक्‍ल में हमारे सामने आ रहा है। उसकी शक्‍ल क्‍या बनती है से ज्‍यादा चिंता की बात है अपनी इस नयी भूमिका में हमें वह डरा रहा है । जिस बात से हमारा सीधा सीधा संबँध न हो उसे हमारे आँखों के सामने थोप रहा हो , कि देखो देखना ही पड़ेगा । किसने ऐसी परिस्थिति पैदा की हम भय और आतंक के साये में जियें ? अपने जलते जंगलों को हमारे जीवन के बीचोंबीच भय के बलबलों की तरह लिये आयें, यह ‘हमारा’ लोकतंत्र कब तक, क्‍यों बर्दाश्‍त करेगा ? जंगली लोगों को किसी ने लोकतंत्र की शिक्षा नहीं दी ? जंगली अंधेरों ने उन्‍हें आखिर कैसी शिक्षा दी है जो हमारी तरह नहीं, हमारे लोकोपकारी शासन के सामने सिर नवाने की जगह जो हथियार उठा रहे हैं.... गंवार, हमेशा के ग़ुलाम !
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शोषण का इतिहास पुराना है, गुलामी के प्रमाण लिखित दस्तावेजों के भी पहले के हैं। हमुराबी के कोड में सबसे पहले इसका ज़िक्र मिलता है और बाईबल में भी। सुमेरियन, प्राचीन मिस्र, भारत, ग्रीस, रोम और इस्लामिक खलीफाई सभ्यता से लेकर आज तक के समय काल में इसका ज़िक्र मिलता है। अरस्तु ने यहाँ तक माना था कि कुछ मनुष्य प्रकृति से गुलाम होते हैं।
अमेरिका में रेड इंडियंस, अफ्रीकी गुलाम, औस्ट्रेलिया में लॉस्ट जेनेरेशन, गुम पीढ़ी का इतिहास, मौरिशस फीजी सूरीनाम में बिहारी अनुबंधित मज़दूर, भारत में छोटानगपुर पठारी इलाकों के आदिवासी.... कितनी लंबी लिस्‍ट होगी । सांस फूलती है । लिस्‍ट फिर भी पूरा नहीं होगा । अंतहीन...
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मैं सच कहता हूँ , ये ज़मीन उस ज़मीन के वासियों की है और अगर आप पागलपन रोकना चाहते हैं तो पहले ज़मीन को बचाईये , बहुत देर हो जाये , उसके पहले । उन लोगों का कर्ज़ चुकाईये जिनकी ये ज़मीन है । याद रखिये इस गोरे देश का एक काला इतिहास है । ये भी याद रखिये कि यहाँ की लोक स्मृतियाँ क्या हैं , यहाँ का समय , सपना क्या , यहाँ की संस्कृति क्या है । इतिहास कभी नहीं भूलता कि आप कहाँ से आये हैं । उन्होंने डाका डाला , बलात्कार किया , लूट खसोट की , इस ज़मीन को तहस नहस किया , ईश्वर और विज्ञान के नाम पर , भूल गये कि यहाँ लोग बसते थे । मेरा टोटेम , कुलचिन्ह सफेद वक्ष वाला चील है । मैं आदिवासी हूँ , शुद्ध आदिवासी और उस परियोजना का हिस्सेदार था जिसमें हमें गोरों के साथ समावेशित होना था । हम क्यों एक दूसरे के साथ भेदभाव करते हैं , कैसे करते हैं जबकि हम सब मनुष्य हैं ?

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दूर क्षितिज ने संवेदना के आँसू बहाये होंगे हमारे लोगों की बदहाली पर .. मेरे शब्द उन सितारों की तरह हैं जो कभी बदलते नहीं .... एक समय था जब हमारे लोग इस धरती पर ऐसे थे जैसे हवा से बहती लहर समन्दर के तल पर होती है .....

आपके देवता आपको मज़बूत बनाते हैं इतना कि वो पूरी धरती भर देंगे जबकि हमारे लोग एक कभी न लौटने वाले सिमटते हुये लहर की तरह तेज़ी से खत्म हो रहे हैं , गोरे लोगों का ईश्वर कभी हमारे लोगों को स्नेह नहीं दे सकता और न ही हमारी रक्षा कर सकता है । हम उन अनाथों की तरह हैं जिनका कोई सहारा नहीं है । फिर हम और गोरे भाई कैसे हो सकते हैं ? आपका इश्वर हमारा इश्वर कैसे हो सकता है , वो कैसे हमें समृद्ध कर सकता है और हमारे अंदर उन सपनों को फिर से जीवित कर सकता है जो हमें हमारी प्राचीन कीर्ति और ऊँचाई तक फिर ले जाये ?अगर हमारा एक ही ईश्वर है तो उसे निष्पक्ष होना होगा क्योंकि वह अपने गोरे बच्‍चों के पास गया , हमने तो उसे कभी देखा ही नहीं । उसने आपको कानून दिये लेकिन अपने रक्तवर्णी बच्चों के लिये उसके पास कहने को शब्‍द नहीं थे ? , उन लोगों के जो एक वक्त इस विशाल महाद्वीप में उस तरह फैले हुये थे जैसे तारे आसमान में । नहीं, हम दो प्रजाति के हैं , हमारे स्त्रोत और उत्पत्ति भिन्न हैं हमारी संस्कृति भिन्न है और हमारा विधान भिन्न है । हमारे बीच कोई समानता नहीं है ।

हमारे लिये हमारे पुरखों की अस्थि पवित्र है और जहाँ वो दफनाये गये हैं वो हमारे लिये प्रतिष्ठित स्थान है । आप अपने पुरखों के कब्र से दूर भटक चुके हैं और आपको उसका अफ़सोस तक नहीं है । आपका धर्म पत्थरों की शिला पर आपके ईश्वर की लौह उँगलियों द्वारा खुदा है ताकि आप भूल न पायें । हम रक्तवर्णी लोग इसे समझ नहीं पाते । हमारा धर्म हमारे पुरखों की विरसे में दी गई परम्परा है .. हमारे बुज़ुर्गों का स्वप्न है जो महान देवता ने उन्हें दिया रात्रि के उन गंभीर प्रहरों में , हमारी दिव्यदृष्टि और हमारे गुण चिन्ह ..जो अंकित हैं हमारे हृदयों में ।

इस धरती का हर कण हमारे लिये पवित्र है । हर पहाड़ हर तराई , हर मैदान , हर वन उपवन किसी न किसी सुख या दुख की घटना की छाप अपने अंदर समेटे है , उन दिनों की स्मृति जो अब बीत चुकीं । वो पहाड़ जो कड़ी धूप में मौन खड़े हैं शाँत तटों के संग संग, सब उन स्मृतियों से गूँजते हैं जो हमारे लोगों ने जीये थे , और वो धूल जिसपर आज आप खड़े हैं वो हमारे पदचापों को को ऐसा स्नेह देता है जो आपने कभी महसूस नहीं किया होगा क्योंकि वो धूलमिट्टी हमारे पुरखों के रक्त से अमीर हुई है । हमारे नंगे पाँव धरती की सँवेदना महसूस करते हैं । हमारे शहीद हुये वीर, हमारी प्यारी माएं, हमेशा हंसती रहनेवाली लड़कियाँ और वो नन्हें बच्चे जो यहाँ एक ऋतु जीये और उल्लसित रहे , वो इस नितांत अकेलेपन को दुलार देंगे और सँधि वेला में उन लौटती छायायों सी आत्माओं का स्वागत करेंगे । और जब हमारे वंश का अंतिम व्यकि नष्ट होगा और हमारे कबीले की स्मृति आपकी याद में एक मिथक मात्र रह जायेगी , तब इन तटों पर हमारे अदृश्य मृत विचरेंगे , और जब आपके बच्चों के बच्चे इन खेतों खलिहानों , इन सड़कों और दुकानों , इन मौन बीहड़ जँगलों में सोचेंगे अपने आप को अकेले, तब वो अकेले नहीं होंगे । इस धरती पर कोई स्थान ऐसा नहीं होगा जो एकांत के लिये समर्पित होगा । रात को जब आपके गली मुहल्लों में शाँति होगी और आप समझेंगे कि सब निर्जन है तब वो हमारे उन मृतात्माओं से भरा होगा जो कभी यहाँ जीये थे और जो इस भूमि से अटूट मोहब्बत करते थे , तब भी करेंगे । गोरे लोग कभी भी अकेले नहीं होंगे । वो न्यायप्रिय हों और उदार हों , हमारे लोगों के साथ क्योंकि मृतत्मायें शक्तिविहीन नहीं होतीं । मृत ! मैंने कहा ? यहाँ मृत्यु कुछ नहीं होता सिर्फ एक संसार से दूसरे संसार में बदलाव होता है ।
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पूरे देश में आदिवासियों को अपने वनभूमि अपनी अजीविका से बेदखल किया जा रहा है । विकास के नाम पर अपनी जीवन पद्धति से मरहूम किया जा रहा है । बाँध , कारखाने , खदान , खनन , सेज़ ..हर बार आदिवासियों की ज़मीन है जिसे झपट लिया जाता है । आदिवासी अब संगठित होने लगे हैं । मुथंगा , केरल में जहाँ वो तीरधनुष से लैस सामने आये और लालगढ़ जहाँ उनके पास कोई हथियार तक न था । थी सिर्फ लाठी और कुल्हाड़ी । तो ये सब सिर्फ सतही अभिव्यक्तियाँ हैं दशकों की निर्मम , निरंकुश सभ्य आक्रामकता के खिलाफ ।
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वृत्तचित्र निर्माता के.पी. ससी द्वारा एक जागृत कर देने वाला संगीत वीडियो यू ट्यूब पर है । यह एक छह मिनट का आदिवासियों की दुर्दशा का संक्षेपित मोंताज़ है जिसमें मुख्य नारा है 'हम अपनी जमीन नहीं देंगे, हम अपने जंगल नहीं देंगे, न ही हम अपना संघर्ष छोड़ेंगे। यह मुख्यधारा की पूंजीवादी विकास मॉडल की आलोचना है जिसने सिर्फ कुछ दशकों में ही उन जंगलों और नदियों को नष्ट कर दिया जिसे आदिवासियों और उनके पूर्वजों ने सदियों से संरक्षित कर रखा था । यह लगभग एक सुझाव देता है कि क्यों देश को एक आदिवासी के नजरिए से पुनर्विचार करना चाहिये अगर उसे खुद को बचाना है । इसे एक गान के रूप में आने वाले दिनों के बड़े संकेत के रूप में देखना चाहिये।

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सामाजिक मानवविज्ञानी वेरियर एल्विन, जो 1940 के दशक में गोंड बस्तर मरिया और मुंडा आदिवासियों के बीच में रहे थे और उनके जीवन और संस्कृतिक मूल्यों के बारे में इतना हृदय स्पर्शी विवरण लिखा था, उनकी अंतर्दृष्टि ने भी राष्ट्रीय चेतना पर कोई प्रभाव नहीं बनाया । एल्विन के श्रमसाध्य काम करने के बाद, कोई भी भारतीय शिक्षाविद ने इस विषय के विस्तार का काम नहीं चुना । यह काम महाश्वेता देवी और गनेश एन देवी जैसे साहित्यिक हस्तियों के लिए छोड़ दिया गया । चाईबासा रिसर्च सैंटर के विस्तृत अनुसंधान कार्य पर भी ध्यान नहीं दिया गया। राष्ट्र राज्य ने आदिवासियों के खिलाफ एक विरोधात्मक रुख अपना लिया जिसकी वजह से पूर्वोत्तर और छोटानगपुर के पठारी इलाकों के आदिवासी क्षेत्रों में सामूहिक असंतोष की लहर फैल गई । राज्य झारखंड और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा की 1980 के दशक के आदिवासी संघर्षों को बेअसर करने में सफल हुई और उन्हें 'राष्ट्रीय' विकास के ढांचे में शामिल करने का प्रबंधन भी किया बावज़ूद इसके अभी भी एक वृहत संख्या उन गरीब शोषित प्राणियों की है जो हाशिये पर हैं और जिनके लिये इस दुर्दशा से निकलने का कोई अवलंब नहीं है ।

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अगर आप उन क्षेत्रों में कभी गये या आपने अखबारों और टीवी स्क्रीन पर देखा तो देखेंगे उनके चेहरे और शरीर .. कृश, दुर्बल, नंगे पांव, और चिथड़ों में । हज़ारों की तादाद में । किस अबूझ रसायन क्रिया द्वारा वे राष्ट्र या बंगीय वाम (लालगढ़ के संदर्भ में ) के दुश्मन घोषित हो गये ? क्या गरीब सर्वहारा वर्ग के विचार में फिट नहीं है? अगर आप उनके लिए बात नहीं करते, तो माओवादी करेंगे । लेकिन उस दिन के लिए इंतजार मत करें जिस दिन वे खुद के लिए बात करना शुरू करेंगे क्योंकि तब वो सचमुच कोई और ही दिन होगा।
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अठारह सौ तीस में, अमेरिकी दक्षिणी भाग के अधिकांश मूल निवासी अमेरिकियों को मिसिसिपी नदी के पश्चिम में उनके स्वदेश से हटा कर विस्थापित कर दिया गया इसलिये कि संयुक्त राज्य अमेरिका से यूरोपीय मूल के अमेरिकी विस्तार को समायोजित करना था । कुछ समूह रह गये अलबामा, फ्लोरिडा, लुइसियाना, मिसिसिपी, उत्तरी केरोलिना, और टेनेसी में ।
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 पुलिसकर्मी मरते हैं , नक्सल मरते हैं, गाँव वाले गरीब आदिवासी मरते हैं । जो पुलिसकर्मी मरे हैं वो भी उतने ही शिकार हैं सरकारी नितियों के जितने की अन्य । सरकार और निगमों के लिये वो भी उतने ही नगण्य हैं जितने कि आदिवासी । डिस्पेंसेबल । क्योंकि यहाँ खेल बहुत बड़ा है , इस खेल की बाह्य भूमिका रचने के लिये ये सब छोटे मोहरे हैं , गिरते रहेंगे ।

सरकार के भारी अन्याय के प्रतिकार में किया गये आंदोलन को उसके समकक्ष रखना जो अन्याय को लागू कर रहा है , बेतुका है । अहिंसक प्रतिरोध के सब दरवाज़े क्यों बन्द किये गये ? जब आमजन हिंसा की तरफ अग्रसर होते हैं तब हर किस्म की हिंसा सँभव बनाई जाती है , क्रांतिकारी , आपराधिक , दहशतगर्दी , गुँडागर्दी। ऐसी राक्षसी स्थितियों के लिये कौन ज़िम्मेदार है ?

सलवा जुड़ुम और नक्सल , इनके बीच आदिवासी .. जिनके लिये कोई रिकोर्स कहीं नहीं है।

बिना ज़मीन जंगल पानी के ..हम कहाँ जायें ..मछली मर गई , पंछी उड़ गई , जाने कहाँ कहाँ .... 
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 हाल ही में भारत में ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट जारी हुई जो छत्तीसगढ़ के भीतरी प्रदेश के अधिग्रहण का दोष सरकार और टाटा और एस्सार जैसी कंपनियों को देती है । यह रिपोर्ट दावा करती है कि यह ज़मीन की सबसे बड़ी हड़प है कोलंबस के बाद । और यह महज इत्तेफाक नहीं है कि भारत का खनन गढ़ माओवादी गढ़ भी है ।

कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं के कारनामों‘ पर हमारी कोई नज़र है ? हम चाहें उससे भविष्‍य का एक सबक ले सकते हैं, लेकिन सबक लेने की हमारी आदत है ?
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1885 और 1969 तक के वर्षों में आदिवासी बच्चों को उनके परिवारों से अलग ले जाया गया घरेलू नौकरों के रूप में काम करने के लिए और सफेद लोगों के सरकार द्वारा नियंत्रित मिशनों और भंडार पर रहने के लिये। यह सफेद ऑस्ट्रेलिया के शर्मनाक इतिहास की दास्तान है। न्यू साउथ वेल्स राज्य में आदिवासी जनजातियों को अपने आदिवासी भूमि छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और सरकार नियंत्रित सुरक्षित क्षेत्रों में खदेड़ दिया गया । आमतौर पर सफेद सेटलर्स द्वारा माना जाता था कि आदिवासी जल्द ही लुप्त हो जायेंगे और आरक्षित भूमि बेचा जाएगा और खेती के लिए इस्तेमाल किया जायेगा ।

जब यह स्पष्ट हो गया कि आदिवासी खत्म नहीं होंगे तब संरक्षण बोर्ड ने सभी आदिवासी समुदायों को तोड़ने का फैसला किया। उनकी ज़मीन नव कृषि के लिए यूरोप पहुंचे लोगों को बेचा गया । बोर्ड ने आदिवासियों से उनके भूमि संबधित सभी अधिकार छीन लिये । उनका न सिर्फ अपनी ज़मीन पर से बल्कि सभी चीज़ों पर से स्वामित्व खत्म कर दिया गया । आरक्षित क्षेत्र आदिवासी बच्चों को नौकर बनने के प्रशिक्षण केन्द्र बन कर रह गया । बच्चों को उनके परिवार से हटा कर उनके सफेद मालिकों के नियंत्रण में रख दिया गया । और इस तरह ये हटाये गये बच्चे फिर दोबारा कभी घर नहीं लौटे ।

बीसवीं सदी के मध्य में, आदिवासी आटा, चीनी और चाय के बदले काम कर रहे थे , उत्तरी, मध्य और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के पशु स्टेशनों पर। आदिवासी महिलायें स्टेशनों पर अक्सर पुरुषों की तुलना में अधिक कठिन काम कर रही थीं । पुरुष मवेशियों के साथ काम कर रहे थे ।महिलाओं न सिर्फ घरेलू काम जैसे खाना पकाना , सफाई, धुलाई, और बच्चों की देखभाल बल्कि बाहर के काम भी जैसे पशुओं चालकों के रूप में , ऊँट की टीमों के साथ, चरवाहे के रूप में, सड़क मरम्मत, पानी वाहक, घर बिल्डरों, और माली के रूप में भी कर रहीं थीं । अगर वे भागने की कोशिश करते उन्हें पकड़ लिया जाता और निर्ममता से पीटा जाता ।

जनजाति मूल के बच्चों को ज़बरदस्ती हटाने का काम ऑस्ट्रेलिया के हर राज्य और क्षेत्र में हुआ ।बच्चों की जुदाई 1885 में विक्टोरिया और न्यू साउथ वेल्स में शुरू हुई और, कुछ राज्यों में, 1970 तक बंद नहीं किया गया। 85% आदिवासी परिवार इस योजना से किसी न किसी तरह से प्रभावित हुये । न्यू साउथ वेल्स में 1885 से 1996 तक आठ हज़ार बच्चों को उनके परिवार से अलग किया गया ।
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प्रश्न: नक्सली सहानुभूति रखने वाले को परिभाषित करें

जवाब: एक व्यक्ति जो आदिवासियों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवा प्रदान करता है, उनको आश्रय देनेके लिए आश्रम खोलता है, उन बैठकों में शिरकत करता हैं जहाँ नक्सल युद्ध में मारे लोगों के रिश्तेदारों का सम्मान होता है आपरेशन ग्रीनहंट पर स्वतंत्र जांच आयोजित करता है , उदाहरण के लिए, बिनायक सेन, हिमांशु कुमार, संदीप पांडे, नंदिनी सुन्दर

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जनजातीय समय सपना धरती के अस्तित्व को गाती हैं । आदिवासी और भूमि एक है । धरती को गाने से ही धरती का अस्तित्व है , पहाड़ का , रास्तों का ...

आदिवासी निर्माण मिथकों में वे पौराणिक प्राणी है जो स्वप्न समय में महाद्वीप पर फिरते थे गाते थे सभी उन चीज़ों को जो उनके सामने आते , पक्षी , जानवर , पौधे, चट्टान,पानी , और इन्ही गीतों से संसार का जन्म हुआ

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मैंने पहले कहा था पहाड़, जंगल, आदिम जीवन के ढेरों ‘नैरेटिव्स’ हैं, प्रताड़ना, तिरस्‍कार, घेराबंदी करके अमानवीयीकरण के यंत्रणाकारी किस्‍से, हम भूले नहीं उन्‍हें, उनकी रौशनी में भविष्‍य की तैयारी करें । अगर समाज और जीवन को हम  सफेद और काले के विभाजन में नहीं देखते , इतिहास और सभ्‍यता से अगर सीखना चाहते हैं । अंतत: सवाल यही बनता है कि सीखना चाहते हैं ? लोकतंत्र को उसकी समूची गरिमा में इज्जत देने का नैतिक बल रखते हैं?











साभार

सदानंद मेनन का लेख


अबॉरिजिनल चिल्रेन ,”अ लॉस्ट जेनेरेशन “ रेबेका बर्क और ट्रेसी ले


चीफ सियेटल का 1854 का भाषण


ब्रूस चैटविन सॉंग लाईंस


नेहा दीक्षित तहलका



11 comments:

Suman said...

nice

Suman said...

nice

सुशीला पुरी said...

यह बेहद भयावह है !!!

Rangnath Singh said...

सबसे पहले तो यह कहुंगा कि इस पोस्ट से किंचित आश्चर्यचकित हूं। दूसरे यह कि आपने बहुत ही प्रभावी ढंग से बात रखी है।

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रभावशाली पोस्ट

अशोक कुमार पाण्डेय said...

जनता का पक्ष इतने साफ़ तरीके से रख कर आपने लेखक होने का धर्म निभाया है…सलाम!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

जनपक्ष पर इस पोस्ट की विशेष लिंक दी है…देखियेगा…http://jantakapaksh.blogspot.com/

डॉ .अनुराग said...

विचारधारा हाईजेक हो कर ....बन्दूक के पाले में ..है.......प्यादे वही है... .बस खेलने वाले लोग बदल रहे है ....चेक ओर मेट ....
..कई तस्वीरे है .. बस्तर में टी.बी का प्रतिशत बहुत ज्यादा है ...ओर इन्फेंट मोर्टेलिटी का भी....शिक्षा तो खैर भूल जाइए .....
लोकल माफिया ओर सरकारी नुमाइंदे अपने हिस्से का शोषण करके उबासिया लेते तमाशा देख रहे है ..
..शहीद हुए सी आर पी ऍफ़ के एक जवान घर में एक जवान बहन है ..छोटा भाई दसवी में पढता है ...बूढ़े मां बाप .ओर खुद के दो बच्चे .... उसके तबके का आईडेनटीफिकेशन शायद मुश्किल है ..ना ..नक्सलवाद में फिट होता है ना सभ्य समाज में......
कल तक किसी जगह सरकारी स्कूल की एक ईमारत उड़ा दी गयी....जिसके बाहर ढेर सारे मायूस बच्चे है.......

... अब वो गाँव भी दहशत में खाली हो रहा है जहाँ मुठभेड़ हुई है...इसके एक निवासी के सामने टी.वो रिपोर्टर कैमरा रख कर प्रतिक्रिया जानना चाह रहा है .अधनंगे बच्चे को गोद से लटकाए औरत टुकर टुकर ताकती है ....उसकी फ़रियाद करने वाली भाषा का अनुवाद किसी के पास नहीं है.......
ओर कंप्यूटर पे लोग "nice " लिखकर सामाजिक सरोकार निभा रहे है......

Anonymous said...

अर्थ पुर्ण रीपोर्ताज......
मेहनत एवम बुद्धिमता पुर्ण किया गया सन्कलन.....
गम्भीर ,खोजी और जीवित लेख्ननी /

Hemant Pol said...

प्रस्तुत संकलन पढ़कर कुछ भर आया अन्दर सो प्रस्तुत है ,
मेरे अन्दर की रंगी से भरी तितली का छोटा सा संकल्प.

शीर्षक : जब चाहू तब पंख पसरू , जब चाहू तब उड़ जाऊ.

तितली
जब तक पंख रंगीले होंगे, तब तक ही प्रश्वास है ,
उड़ना मेरी ज़िन्दगी, रुकना मेरी प्यास हैI

दुनिया एक शिकारी जैसी, मै तो उडती दूर दूर,
उसको मेरी खबर तो है, मुझको उसकी तलाश है,

बस तब तक ही यह श्वास है, बस तब तक ही यह श्वास हैइ

सानंद रहे,
हेमंत

Hemant Pol said...

प्रस्तुत संकलन पढ़कर कुछ भर आया अन्दर सो प्रस्तुत है ,
मेरे अन्दर की रंगी से भरी तितली का छोटा सा संकल्प.

शीर्षक : जब चाहू तब पंख पसरू , जब चाहू तब उड़ जाऊ.

तितली
जब तक पंख रंगीले होंगे, तब तक ही प्रश्वास है ,
उड़ना मेरी ज़िन्दगी, रुकना मेरी प्यास हैI

दुनिया एक शिकारी जैसी, मै तो उडती दूर दूर,
उसको मेरी खबर तो है, मुझको उसकी तलाश है,

बस तब तक ही यह श्वास है, बस तब तक ही यह श्वास हैइ

सानंद रहे,
हेमंत