9/17/2009

हाय गज़ब ! कहीं तारा टूटा

पलथी मार कर बैठीं मुन्नी दीदी के चेहरे पर हँसी दौड़ रही थी । जैसे कोई छोटा बच्चा चभक कर उनके चेहरे पर आ बैठा हो । कोई किस्सा सुना रही थीं और उस किस्से के होने की याद में , बोलने के पहले ही उनका शरीर उस हँसी में बार बार डोल जाता । मैं ज़रा मुस्कुराती , उस किस्से की मज़ेदारी से ज़्यादा उनकी भंगिमा पर आनंद ले रही थी । उनका लम्बा चिकना शरीर अब भी , इतने साल बाद भी वैसे का वैसा था , उनके बायीं आँख के नीचे गाल पर मस्से का निशान भी ।

तब मकान बन रहा था । प्लिंथ तक बना था । नल के पास बालू और ईंट का ढेर । नल से पानी लगातार सों सों आवाज़ से टपकता । ठीक पीछे मेंहदी की झाड़ से सटे पुदीने का फैलाव और उसके पीछे अमरूद का छोटा ठिगना सा पेड़ । पराठे और आलूमटर की मसालेदार तरकारी बनी थी और शेड की छाँह में बैठे पत्तल पर खाना पिकनिक था , हम बच्चों के लिये । बड़ों के लिये बनते मकान को देख लेने की गर्व भरी खुशी थी । सलवार का पायँचा उठाये और कमर पर दुपट्टा कसे मुन्नी दी सबको खाना खिला रही थीं , नल के पास फिसलीं थी , कुहनी तोड़ लिया था । कैसा बवेला मचा था । रात को क्लांत मुरझाई दीदी के पास बैठी फुआ उसाँस भर कर बोलीं थीं , अब हुआ महीने दो महीने का रोग , सब ठप्प । मरी किस्मत ! मुन्नी दी की शादी की बात चलती थी तब।

मकान बना था । बाहर धूप का साम्राज्य था , हवा और पानी और पेड़ और चिड़िया , गिलहरी , बिल्ली , नेवला , आवारा कुत्ता , गौरेया , कौव्वा और कभी कभार अमरूद के पेड़ पर तोता तक । पिछवाड़े पानी भरा होने की दुर्दशा में बरसाती घास , केंचुआ , मेंढक और बरसात के दिनों में जाने किस दैव योग से आई केवई मछलियाँ तक , जो पानी से निकाले जाने पर घँटों छटपटाती अधमरी , कीचड़ लिसड़ी जिन्दा रहतीं । घर के भीतर अँधेरी ठंडी दुनिया थी । दिन में भी आँख फाड़े गलियारे की दीवार हाथ से टोते एक कमरे से दूसरे कमरे जाने का सफर था । ईंट की जाली से मद्धम छायादार रौशनी छनछन कर आती और फर्श पर चौकोर डिजाईन बनाती । बाहर की दुनिया वही आम रोज़ की दुनिया थी । भीतर की दुनिया अलग अजूबा थी । चीज़ें थीं और नहीं भी थीं । जिनका उपयोग होता वो नहीं थी और जो थीं वो अपने होने की उपयोगिता को बरसों पहले छोड़ चुकी थीं । लकड़ी की बड़ी आलमारियाँ थी बैठने को ढंग की कुर्सियाँ नहीं थी । चीनी मिट्टी के दरके बेमेल बर्तनों के नफीस अधूरे सेट्स थे ठीक ठीक खाने को स्टील की साबुत बेपिचकी थालियाँ नहीं थीं । हरी चाय के पुराने काठ के छोटे बक्से थे , रोज़ चाय पीने की हाहाकार थी । घर घर नहीं अजायबघर था । हम सब दबे पाँव हथेलियों से दीवार टोते दम साधे घर में घूमते जैसे नींद में सपने तलाशते हों ।

लकडी की बड़ी आलमारियों में चीज़ें ठुँसी पड़ी थीं । उनकी दराज़ों में गये दिनों की महक कैद थी , समय रुका जमा था । बाबा की वर्दी , बर्मा से लाई गई काही खोल वाली मिलिट्री थर्मस , कोई ऐयरगन , भारी बूट , छर्रे , शेफील्ड नाईव्स , मोटे चमड़े के बेल्ट । रसोई की जाली वाली खिड़की से पनडुब्बी चिड़ियों का शोर सुनाई देता । दो ईंटे जोड़ कर खड़े होने से बाहर का नज़ारा सही सही दिखता । अँधेरे में रौशनी का एक टुकड़ा । मुन्नी दी की हँसी भी तो रौशनी का एक टुकड़ा थी ।


मुन्नी दी हँसते हँसते दोहरी हो जाती हैं । इतना हँसती हैं इतना कि उनके आँख से पानी गिरने लगता है । थमते कहती हैं , कहाँ तुम्हें ये सब याद होगा तुम कितनी तो छोटी थी तब । फिर एकदम उदास हो जाती हैं । बड़ी तकलीफों वाले दिन थे नन्हीं , पैसों की तंगी , बाबू की मौत और नाना के पास आकर रहना । बस चावल और पानीदार दाल खाते थे हमलोग । फिर एकदम उमग कर बोलतीं हैं , लेकिन जानती हो कितना हँसते थे हम सब , मैं , बुलु , तुपु , अनु ..सब । उसी तंगी में कैसा उमगता उल्लास हमें ज़िन्दा बनाये रहता । दस दस रोटिय़ाँ हम दो आलू और अचार के साथ खा जाते । कितनी भूख लगती थी तब । गर्मी में फर्श पर मूड़ी जोड़े चित्त लेटे हाथ से पँखा झलते कितने गाने गाते थे .. हाय गज़ब कहीं तारा टूटा और बदन पे सितारे लपेटे हुये .. दीदी फिर गुनगुनाती हैं , सुहानी शाम ढल चुकी ... उनकी आँखें मुझे नहीं देख रहीं , दिन में सपना देख रही हैं

लोहानीपुर के उस छोटे से घर की याद है मुझे । बाबा के कमरे में किताबें ही किताबें । और वो टाईपराईटर .. द क्विक ब्राउन फॉक्स जम्प्स ओवर द लेज़ी डॉग । यादें अल्बम में लगी पुरानी फोटो जैसी ही है , खटाक और एक तस्वीर नीचे गिरती है । कॉर्नर्स में अटका एक पल , खत्म हुआ फिर भी ज़िंदा है , कितना तो अमूर्त है ।

मुन्नी दी की शादी के बाद खिंचवाई फोटो , उँगलियों में कमरधनी फँसाये , ठीक उसके बीच से झाँकती उनकी हँसती आँखें और हँसते दाँत , चमकते मोतियों जैसे । पर हँसने जैसा कुछ रहा नहीं था उनके जीवन में । कब रहा था ? और बाबा , अपने फौज़ी वर्दी में चुस्त सतर , बर्मा के मोर्चे पर । घुटनों के ऊपर गोली लगी थी । अस्पताल में सन्निपात में बौराते थे । मुझे नहीं पता पर जाने कितनी बार सुनी कहानियाँ हैं , जैसे अलमारी में बन्द वो दूसरी दुनिया । खाकी सोला हैट को पहनते माथे पर गरम गुनगुनेपन के एहसास जैसा । अँधेरे में डूब जाने जैसा । बाबा की महक पा जाने जैसा ।

मुन्नी दी के हाथ में पुरानी मुड़ी तुड़ी ब्लैक ऐंड वाईट फोटो है । कम रौशनी में चमकती आँखें हैं , चेहरे पर एक उत्कंठा भरी इंतज़ार जैसा मुस्कान है , पीछे घर की बिन पलस्तर वाली दीवार पर चौकोर ईंटो की जाल है , उनके गोद में लुढ़की हुई मैं शायद पाँच छ साल की रही होऊँगी । मेरा फ्रॉक उठंगा है । दीदी की सूतीसाड़ी के मुचड़े पल्ले को खींचती मैं बिसुरती दिखती हूँ । उनका कमसिन पतला चेहरा किसी नये खिले फूल सा ताज़ा है । अँधेरे में रौशनी की कौंध ।

एक पेंडुलम डोलता है आगे पीछे आगे पीछे । दीदी ने फोटो वापस बैग में डाल लिया है । जानती हो , वो धीमे उसाँस भरती कहतीं हैं , पिछली दफा गई थी वहाँ । घर नहीं था सिर्फ मलबा था । शायद वहाँ एक मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट बन रहा है । जिन्होंने मकान खरीदा था उनका बेटा कैनडा जा रहा है , तो सब बन्दोबस्त ... । उनकी आवाज़ बीच में थमती ठिठकती है । उस लकड़ी की आलमारी की याद है तुझे ? जाने कहाँ किसके पास होगा ? बुलु के पास क्या ? या तुपु ? और वो फ्रेम में नाना की वर्दी वाली तस्वीर ? और तेरा बनाया नदी और घर और नारियल के पेड़ वाली बचकानी पेंटिंग , मेरे स्कूल के मार्कशीट्स और जूट का वो झोला जो तेरे स्कूल के नीडलवर्क क्लास के लिये मैंने बनाया था ?

खिड़की से रौशनी छन कर उनके चेहरे पर पड़ती है , आधे चेहरे पर । ये वही फोटो वाली मुन्नी दी ही तो हैं , गज़ब ! गज़ब !

20 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

सरल और सुंदर शब्दों का आकर्षण बिछा पड़ा है आपकी रचना में..कहानी अच्छी है....धन्यवाद

Pankaj Mishra said...

नहूत ही कल्पना मयी कहानी

पारूल said...

याद न जाए बीते दिनों की .....

अनिल कान्त : said...

आपकी कई रचनाओं को पढ़ा और पढता हूँ ...तो उनमें कई जगह एक जैसा वातावरण पाता हूँ...शायद हर जगह मुझे किसी का बचपन दिखता है...और उसमें वो एक लड़की ना जाने क्यूँ हर जगह मिल जाती है...

mehek said...

sabdon ka khubsurat samohan,sunder kahani.

Pramod Singh said...

ओहोहो.. एक तारा मुनक्‍के का.. मोरक्‍को जाके टूटे, फिर? कुछ दिन हुए मुन्‍नी दी मिली अपने लव-लेटर मांगने आई थीं, मैंने पूछा, 'आपनार पोरिचय?' तो मुंह फेरकर हंसने लगी थीं..

कितनी तो चिढ़ हुई थी कि अबे, हरामख़ोर सपने, दक्खिन अमेज़न के अंधरों जाके टूटते, यहीं, हमारी आंखों में फूटना था?

Udan Tashtari said...

सुन्दर प्रवाहमयी!!

डॉ .अनुराग said...

एक पेंडुलम अब भी डोलता है आगे पीछे आगे पीछे.वक़्त का .......ओर सारे चित्रों को कई बार अपनी नोक से लटकाकर इधर उधर रखता है .....सारे साल यूँ झूलते है .........
क्या कहूँ ...वही हमेशा की तरह बेमिसाल .......

AlbelaKhatri.com said...

वाह !
बहुत अच्छा लगा.........
बधाई !

VaRtIkA said...

yaadon ki kirchon se jaane hi kitne hi rang chitak kar bikhar pade... sunder lekhaan ...sadaa ki tarah...

महफूज़ अली said...

khoobsoorat rachna hai........ flow ke saath kahi gayi hai.....immediate effect.........

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

गज़ब ! गज़ब !

creativekona said...

बचपन---गांव ---घर से जुड़ी यादों का सन्स्मरण्।बहुत ही खूबसूरती के साथ शब्दों में पिरोया हुआ।वैसे आपके शब्द चित्र हों या संसमरण--या फ़िर लघुकथायें --सभी में एक काव्यात्मकता --लयात्मकता का पुट रहता है ।यही विशेषता आपके लेखन को दूसरों से अलग करती है।
शुभकामनायें।
हेमन्त कुमार

डॉ. अमिता नीरव said...

प्रवाह नदी की लहरों का कभी उदास करने वाला तो कभी उत्साह से लबरेज.... हँसी और आँसू का इंद्रधनुष जैसे कोई लंबी कविता, जिसके हाथ जो सिरा लगे.... पकड़ लें और फिर बुन ले जो जी चाहे...

Rakesh said...

pratyksha
nirmal verma ke baad mene kuch acha padha hai to us shreni ki taraf aati tumahri ye rachna dhrasya ko samne chalchitra ke bhti le aati hai
lagta hai munni di meri hai kabhi lagta hai mein munni di hun ...aur sab kuch jo ho reha hai meri aankho ke samne ho reha hai....bahut acha esko vistrit ker bante hue charitra ke bhitre ke antradwand ko aap agar chitrit kerti to aur bhi shresth hota ...badhai....acha laga aapko padhker

कथाकार said...

प्रत्‍यक्षा जी
आज आपकी गली की तरफ आ निकला। खूब खूब सारी रचनाएं एक साथ पढ़ डालीं। टिप्‍पणी इसी पोस्‍ट के‍ हिस्‍से में आ रही है।
आपकी रचनाओं से गुज़रना हमेशा बहुत सारी चीजों से एक साथ साक्षात्‍कार क रादेता है। स्‍मृतियां, अधूरे रह गये सपने, ठिठकी यात्राएं, भोगे ऑर न भोगे गये अनमोल पल। जैसे किसी दोहपरी को जंगल से हो कर गुजर रहे हों। कभी न खत्‍म हो ये सफर

Pradeep Jilwane said...

कुछ ही देर पहले भेजा Comment हो सके तो delete कर दें. दरअस्‍ल Computer refresh नहीं हो पाया था और आपका पुराना लेख 'सफीना ए गमे...' सामने आया. जल्दबाजी में दिए अपने कमेन्‍ट के लिए क्षमा करें. खैर नया लेख 'हाय गजब ....' पढ़ा. लगता है किसी आत्‍मकथा या उपन्‍यास की तैयारी है...

Anonymous said...

yaadon ke sab jugnu ...jangal me rehte hai..:-)
P.S.she wouldn't hav cared a damn...but few fans do.

AK said...

Oye pratyaksha...
Tume wo jo likha tha na ki "kya baat karen? har baat kar chuke hote hain ham..." aisa kuchh tha.
Mujh me jaise kisi ki rooh utari aur boli :
"We have exchanged ourselves with our words and have become dead as words, as result. The moment I use a word, I convert myself into the word. We never know ourselves except the words we have given to us and to the world.

Let us think... Language is our first and last bondage?
Khud se kahte rahen ham ki Shabdon ka khoob istemaal karen, magar shabdon ki sharaarat aur badmaashiyon ko samajhte rahen.

Pichhle saal Snowa ne tumhen Kullu Valley ke sare Seb diye the; is baar mai tumhen Himalayas me aane waali taaza Barf ki pahli parat deta hoon.
Tumhara apratyaksh falega...
Ye jazba Chalega?

Sainny Ashesh

Rahul Singh said...

शब्‍द समूह और छोटे वाक्‍यों से बना सुंदर 'भाव-कोलाज'.