8/21/2009

गली के पीछे

कौन सा पुराना बाजा बजता है , पता नहीं पर रात बीतते नस पर चढ़ता है दर्द , और कोई धीमे से पूछता है , डर तो नहीं लग रहा ? तिरती खामोशी में खुद की साँस का शोर बेशर्म बेढपपने में छूटता गिरता है । एक सुबुक सिसकी दम तोड़ती है , हँसी फुसफुसाती है दबी शैतानी में और पीछे से कोई बुदबुदाता है , कितना सताया तुमने , ऐसे ही बिलावज़ह ? आवाज़ में शिकायत नहीं दमतोड़ उदासी है जैसे शाम का चुक जाना । किस पागलपने में मन बिफरता है , क्यों शाम का चुक जाना ऐसा नियत हो ? क्यों क्यों । किसी खाई के मुहाने पर खड़े नीचे गिरने के डर का नशा ? आखिर किस बात का मोह ? बेकली एक तार खींचती है , एक सर्द आह पर मन बिखरता है , कोई हिचकी कोई याद करता है भला ?


किसी पहचानी आवाज़ की खनक दिखा जाती है एक बार , वही समय , वही दुलार । दिल अब भी धड़कता है मेरी जान , अब भी ..

उस बन्द गली के बाद एक गली और है , एक सड़क और , और मैं हूँ और शायद तुम भी हो । उँगलियों के पोरों पर साँसों को सजाये , बेचैन लड़खड़ाहट में थमते थामते हम चलते हैं साथ शायद सिर्फ मेरी ही स्मृति में । करवटों की कराह पर चाक होते दिल का चूर चूर होना कौन देखता है । नदी का पानी तब भी बहता था , अब भी .. आश्चर्य ! दोस्त को दिल का हाल कहते देखते हो तुम, एक बार फिर तुम्हारे आवाज़ की उदासी छूती है जबकि तुम कहते हो वो दिन खत्म हुये अब । खत्म ! तुम हँसते हो अजीब सी बेमन सी हँसी फिर दोहराते हो .. खत्म खत्म ।

दोस्त देखता है खत्म होते दिन की रंगत कैसी फीकी होती है , जान निचुड़ जाने जैसी , छूटती हिचकी के अंतिम उठान की तरह ...बदहवास , बा हवास !



(पॉन नफ के आगे रू द नेवर की पिछले दिनों ली हुई एक तस्वीर )

8 comments:

रंजना said...

गद्य में पद्य की प्रवाहमयता.....एक ऐसा ले जो हर उतार चढाव के साथ मन को विस्मृत मुग्ध करता जाय.......यही है आपका लेखन.....

इससे गुजरना एक सुखद अहसास से गुजरना है........

अनूप शुक्ल said...

बदहवास , बा हवास !---झकास!

अनूप शुक्ल said...

बदहवास , बा हवास !---झकास!

M VERMA said...

दिल अब भी धड़कता है मेरी जान , अब भी ..
और फिर
छूटती हिचकी के अंतिम उठान की तरह ...बदहवास , बा हवास !
प्रवाहमय आपकी यह रचना लीक से हटकर है.
बहुत खूब

गजेन्द्र बिष्ट said...

प्रत्यक्षा जी आपकी रचनाएं मुझे बहुत अच्छी लगती हैं सचमें दिल की गहराइयों में उतर जाती हैं
आभार - गजेन्द्र बिष्ट gajesingh@gmail.com

विनोद कुमार पांडेय said...

सुंदर तरीके से शब्दों को भावों मे पिरोया है..
अच्छी रचना...बधाई!!

neera said...

हमेशा की तरह नफीस!

डॉ .अनुराग said...

बंद गली की फुसफुसाहट जैसे ...शोर बन कर फ़ैल गयी है .....