3/30/2009

सफ़ीना ए ग़मे दिल

कभी आप इश्क़ में पड़ जाते हैं , कुछ पढ़ते हैं और मोहब्बत हो जाती है । क़ुर्तुल एन हैदर को पढ़ा था जब दस बारह साल की रही हूँगी । अपरम्परा एक पत्रिका थी जिसके सिर्फ तीन अंक निकले । बड़े लोग जुटे थे इस पत्रिका से और इसके छपने से घरैया संबंध भी था जो खैर महत्त्वपूर्ण नहीं। बस इतना था कि उसके दो अंक हमारे घर पर थे । पहले अंक में ऐनी आपा की ज़िलावतन थी । उस दस साल की उमर में मुझे पहला इश्क हुआ। फिर जहाँ जहाँ कहाँ कहाँ खोज कर उनको पढ़ा .. उनकी कहानियाँ , उनके कुछ उपन्यास , अपरम्परा के दूसरे अंक में रिपोर्ताज ।

आप किसी लेखक को प्यार करते हैं तो उसके बारे में उमग कर बात करना चाहते हैं , उनकी लिखी पंक्तियाँ आप हँस कर एक प्यार भरी हैरानी से दूसरों के साथ बाँटना चाहते हैं । आप इश्क में होते हैं और सबको बता देना चाहते हैं । शब्दों की दुनिया के चमकीले संसार की रौशनी आपकी आत्मा में भरी होती है । हैरानी होती है कि दूसरे उसे देख नहीं पा रहे , शब्दों के जादू की थाह नहीं पा रहे । कैसी नज़र है ? कैसी आत्मा है ? और कैसी गरीबी है । कुर्तुल ऐन हैदर के बारे में बात करते हमेशा ऐसा ही महसूस हुआ । लेकिन कहीं भी उनका नाम लिया , उत्साह से छलकते किताबों का ज़िक्र किया ..

ओह , अच्छा ..आग का दरिया हाँ हाँ , फिर बात बदल गई..। जैसे कोई दीवार खड़ी हो ।

उनकी "गर्दिशे रंगे चमन" पाँच सात साल पहले पढ़ी थी । कुछ बहुत कुछ पागल हुई थी । कुछ मित्रों से ज़िक्र किया । इस मुगालते में थी कि कुर्तुल की किताब है , कहीं भी मिल जायेगी । ऐसे भोलेपन का टूटना ही था । तब तक हिन्दी साहित्य समाज की गरीब दिशाहारेपन से वास्ता न पड़ा था । आग का दरिया तक जो उनका मैग्नम ओपस समझी जाती है , उस तक पहुँचने के लिये भी कम तकलीफ नहीं उठानी पड़ी । भला हो श्रीराम सेंटर की पुस्तक दुकान (अफसोस अब वो जगह भी बंद हुई )जिन्होंने मिन्नत करने पर कहीं से एक प्रति उठवाई । ये कहानी अलग है कि उसकी छपाई , कागज़ की क्वालिटी सब , कई कई बार अपने कंगलेपन में आपका दिल तोड़ दें और आप फिर याद करें कि किसी भी और विदेशी भाषा के क्लासिक्स कैसे चमकीले साज सज्जा में आपका दिल जुड़ाते हैं । खैर , वो उनके लिखे के प्रति मेरी अगाध अनुरक्ति है कि उस घटिया कागज़ के बावज़ूद उस दुनिया ने मुझे जकड़ पकड़ लिया , छू लिया । रंगे चमन अब तक खोज रही हूँ। तमाम लोगों को कह रखा , वैसे लोग भी जो उस दुनिया के हैं। हर जगह बड़ी ठंडक दिखी और मुझे इस बात से हैरानी भरी तकलीफ और न समझ में आने वाला गुस्सा ।

आमेर हुसैन, टाईम्स लिटररी सप्प्लीमेंट में लिखते हैं कि आग का दरिया उर्दू साहित्य में वो जगह रखता है जो हिस्पानिक साहित्य में वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलिट्यूड का है । और ये कि अपने समकालीन लेखकों, जैसे मिलान कुंडेरा और मार्खेज़ से उनकी तुलना की जाये तो उनके लेखकीय संसार की वृहत्ता , उनकी दृष्टि , उनका अंतरलोक . समय के पार और उसके परे जाता है । अमिताव घोष कहते हैं कि वो बीसवीं सदी की सबसे महत्त्वपूर्ण भारतीय आवाज़ हैं । फिर वो सबसे महत्त्वपूर्ण आवाज़ क्यों हमें उपलब्ध नहीं है ? क्यों जब हम महत्त्वपूर्ण किताबों की बात करते हैं तो कुर्तुल का नाम अमूमन उस आसानी से नहीं लिया जाता ? किसी ने कभी मुझे कहा था कि वो उर्दू की हैं , डोंट क्लेम हर ऐज़ योर ओन (यहाँ ओन मतलब हिन्दी साहित्य )

एक बार मैने किसी से शिकायत की थी क्यों नहीं उनकी सब चीज़ें एक जगह एकत्रित की जा सकती हैं । मुझे कॉपीराईट रूल्स और पब्लिकेशन के नियम बताये गये थे । मैं नहीं जानती उनकी चीज़ों के कॉपीराईट्स किसके पास हैं, मुझे नहीं पता कि पब्लिशिंग़ हाउसेस उन चीज़ों को नहीं छापता जो किसी और ने छापी हैं पहले से । मुझे सचमुच इन नियमों के बारे में कुछ नहीं मालूम। मैं सिर्फ एक अदना पाठक हूँ जिसको उनके लिखे से बेपनाह मोहब्बत है। मैं सिर्फ ये जानती हूँ कि उन जैसी लेखिका के लिये शायद ऐसे सब नियम तोड़े जा सकते हैं और इस बात का क्षोभ कि मैं सिर्फ अदना पाठक क्यों हूँ । मैं ऐसे किसी समाज का हिस्सा क्यों नहीं जहाँ एक पाठक की हैसियत इतनी महत्त्वपूर्ण हो कि किताबें उनके माँग को ध्यान में रखकर मुहैय्या करायीं जायें ।

मैं याद करती हूँ कि चाँदनी बेगम, सीताहरण या गर्दिशे रंगे चमन मे उन हिस्सों को जहाँ कहानी खत्म होती है और लूज़ली स्ट्रक्चर्ड बातचीत के ज़रिये वो हमें कहीं और ले जाती हैं , वहाँ जहाँ जीवन अपनी संपूर्णता में, अपने कच्चे पक्केपन में धड़कता है । उन हिस्सों को पढ़कर कई बार मुझे लगा है कि उनसे बात करना ऐसा ही होता , अगर मिल लेती तो और अगर वो मुझे प्यार से , ए लड़की इधर बैठो ..कहतीं ।

नेट पर खंगालते मुझे उनके बारे में बहुत कुछ नहीं मिला ..लेकिन रज़ा रूमी के उनसे मिलने की दास्तान मिली, उनकी कुछ औडियो लिंक्स , यहाँ भी , कुछ उनपर लिखे पुराने ब्लॉग लिंक्स मिले ..यहाँ

बस इतना सा ही । कुछ दिन पहले ज़ुबानबुक्स पर सीताहरण का अंग्रेज़ी तर्ज़ुमा अ सीज़न ऑफ बिट्रेयल्स देखकर मन प्रसन्न हुआ था । इस उम्मीद में हूँ कि ऐसे ही "कारे जहाँ दराज़" और "मेरे भी सनमखाने" कहीं मिल जायें ।

उनके बारे में कुछ यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

ये भी तकलीफ की ही बात है कि नेट तक पर उनसे संबंधित कितनी कम सामग्री है । ऐनी आपा होतीं अभी, कहतीं, अच्छा लड़की , तू इतना ही समझती है?

शी वुडंट हैव केयर्ड अ डैम ..

35 comments:

Parul said...

आप इश्क में होते हैं और सबको बता देना चाहते हैं । शब्दों की दुनिया के चमकीले संसार की रौशनी आपकी आत्मा में भरी होती है । हैरानी होती है कि दूसरे उसे देख नहीं पा रहे oh! kis bechaini ka zikr kar diyaa..lagta hai na ? kis ko paye..kis ko sunayen..

अफ़लातून said...

पत्रिका से 'घरैया' सम्बन्ध थे अथवा 'घरू' सम्बन्ध थे? खुद की जानकारी बढ़ाने के लिए पूछा ।

Geet Chaturvedi said...

आमेर हुसैन और अमिताव घोष की ही कड़ी में एक बात...
पिछली दिसंबर फ्रांसीसी लेखक ले क्‍लेजियो ने अपना नोबेल पुरस्‍कार क़ुर्रतुल ऐन हैदर (तथा कुछ अन्‍य) लेखकों को समर्पित किया था. बाद में एक इंटरव्‍यू में उसने कहा कि जिन लोगों को पहले ही नोबेल मिल जाना था, उनमें ऐन हैदर भी होतीं. वह अमूमन लोगों को रिवर ऑफ़ फ़ायर (जो कि आग का दरिया का अंग्रेज़ी अनुवाद या पुनर्रचना है, जिसके लिए ऐन हैदर को बरसों कोई ढंग का अनुवादक नहीं मिल पाया, और अंत में उन्‍होंने ख़ुद ही किया) पढ़ने की संस्‍त़ुति करता है.

यह सिर्फ उनके लेखन का महत्‍व बताने के लिए है. हम सब जानते भी हैं इसे, लेकिन किताबों का क्‍या बोलें, हिंदी में आग का दरिया ही नहीं मिल पाता, दूसरी किताबों का क्‍या ? और उनके संस्‍मरण सहित नॉन फिक्‍शन का एक ख़ासा महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा तो, संभवत:, हिंदी में आया ही नहीं है.

डॉ .अनुराग said...

क़ुर्तुल एन हैदर ओर आग का दरिया ...पहली बार यही सुना था जिक्र कही....उन दिनों उस उम्र में थे जो मिल जाता था पढ़ डालते थे ...दसवी में थे .कुछ चीजे समझ आयी .कुछ नहीं....वक़्त गुजरा .सूरत की नर्मद लाइब्रेरी में मंजूर अहेतेशाम की सुखा बरगद खूजने निकले हाथ आयी फिर आग का दरिया .समझ बढ चुकी थी ओर दुनिया भी ..उसके बाद उनको ढूंढ ढूंढ के पढ़ा ..पर उनके तजुर्मे ज्यादा हुए ..पिछले दो सालो में शायद "बया" में किसी ओर मेग्जिन में उनके बारे में किसी ने लिखा था ..आप जैसा इश्क उनसे तो नहीं हुआ पर हाँ उनके बगावती तेवरों का इल्म हमें हो गया ओर हमें लगा वक़्त से कई साल पहले टाइम की गयी लेखिका है...
.कनाट प्लेस पर एक संडे पुरानी किताबो के ढेर में हमें ऐसी ही कोई चीज अचानक हाथ लगी थी आप भी एक बार आजमाइश कीजिये शायद ......

neera said...

अगली बार के लिए दरियागंज की पटरी की धूल मेरे हिस्से में लिख दी है तुमने!

sanjaygrover said...

आप इश्क में होते हैं और सबको बता देना चाहते हैं । शब्दों की दुनिया के चमकीले संसार की रौशनी आपकी आत्मा में भरी होती है । हैरानी होती है कि दूसरे उसे देख नहीं पा रहे , शब्दों के जादू की थाह नहीं पा रहे । कैसी नज़र है ? कैसी आत्मा है ? और कैसी गरीबी है ।
Kamaal hai, kai anubhav jo aapko lagta hai ki sirf aapke hote haiN magar wo bahutoN ke hote haiN.
Blogs par ye anubhav kai baar hota hai.

ओम आर्य said...

आज आपने आसानी से समझ में आपने वाला कुछ लिखा है. हम जैसे पाठकों का ख्याल किया है. धन्यवाद स्वीकार करें पहले तो.

सचमुच कुछ किताबें जिंदगी को पाल पोस कर बड़ा करती हैं. सभी के लिए वे किताबें एक नहीं होतीं.
मेरे लिए भी एक अनमोल किताब है वो है अजीत कौर की 'खानाबदोश' जो की पंजाबी में लिखी उनकी आत्मकथा का हिंदी अनुवाद है. मैं बार बार पढता हूँ और जितनी बार पढता हूँ, थोडा न थोडा जरूर से रोता हूँ. आपने पढ़ी ही होगी क्यूंकि गहरा नाता रहा है आपका किताबों से, ऐसा लगता है.
हाँ अगर नहीं पढ़ा, तो जरूर पढें !

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक दिन अपनी पसंद के पत्रकार के इंटरव्यूह में पढा कि उन्होने आग का दरिया बहुत ही बार पढा है। हमने सोचा भी कि ऐसा इसमें क्या है फिर ढूढा तो मिला नही फिर लाईब्रेरी में ढूढा तो मिला फिर पढा भी और फोटोस्टेट कराके रख भी लिया। तब पता चला कि क्यों लोगो को वह इतना प्यारा है। मैं तो सोच में पड गया कि कितनी मेहनत से ये लिखा गया होगा। फिर अनुवाद किए हुए उपन्यास भी पढे। और हाँ यह सच है उनका लेखन जल्दी से मिलता नही।
आप किसी लेखक को प्यार करते हैं तो उसके बारे में उमग कर बात करना चाहते हैं
सच यह सच है।

swapandarshi said...

I can recall the first book of Anne which I bought "ek becharee LaDakee".

My first encounter in the blog world was with a Raza Rumi and his blog, now a website. I have link in my page.

Raza is wonderful. I think he will be the one who can help you finding those treasures. Other person can be Najma Walker, I do not know if she is still in JNU/delhi.

Pramod Singh said...

शायद ये न थी हिन्‍दी की क़ि‍स्‍मत कि आपा के पीछे जलेबी से घुले जाते. शायद वह साहित्‍य अकादमियों के हिन्‍दी ग्लितरातियों, नामवर बातियों के फॉलोअप नहीं करती थीं, न इन सत्‍ता के सितमख़ानों को उनके 'फॉल' की बहुत परवाह थी!
गंगा-जमुनी जो तहजीब थी वह तो बहुत पहले गयी, हिन्‍दी भी इन्‍हीं फटियारी राहों पर बिसरायेगा, कहीं नहीं जायेगा..
स्‍वप्‍नदर्शी की सलाह काम में लायी जाये, रज़ा रुमी तो ख़ैर पाकिस्‍तान बसते होंगे, जेएनयू की सैर लगायी जाये, नजमा वॉकर के सूराग ऊपरियाये जायें. दूसरी रचनाओं के संग, संभवत: 1790 में छपी हसन शाह की किताब की भी खबर लगे जिसे कुर्रतुल ने खोजा और अनुवाद किया था.
(वैसे हिन्‍दी में हैं नहीं) कोई शर्मख्‍वार पब्लिशर हो जो आपा की सब रचनायें एक जगह इकट्ठी करे, उनकी रचनावली छापे. साझे संस्‍कृति का मर्सिया गाती हिन्‍दी इतना तो कर सकती है. कर सकेगी?

Pratyaksha said...

रज़ा साहब को कल ही मेल भी किया था और उनके साईट पर अपनी बात भी छोड़ी थी । उनका फौरन जवाब भी आया ..जिसका एक हिस्सा
Her books are mostly in Urdu but have been translated into Hindi. The best place to check is in India - at Jamia Millia University.
You may have seen english translations:

River of Fire
Fireflies in the Mist
My Temples too
Sound of falling leaves
Street Singers of Lucknow
The Nautch Girl

तो , अब ये कि ट्रेल का पीछा किया जाये .. जामिया वाले किधर हैं ? मदद करें ...

बवाल said...

बहुत सुन्दर आलेख रहा प्रत्यक्षा जी आपका। बहुत सी जानकारियों से युक्त । ख़ासकर सीताहरण का अँग्रेज़ी तर्जुमा।

anurag vats said...

main hasi hasi men kahta bhi hun ki jis jamia nahin dekya wo janmiya hi nahin...maine jamia men hi eni aapa ko dekha, suna aur padha bhi...intzar huasian se ko bhi mamle men bhi mere liye jamia hi kam aaya...bahrahal...yahan ki library men aapa ki kuch kitaben maujood hain...halanki ab wahan ka chatr to nahin raha main...par yar dost hain...aapke ishq ko parwan chadhane ke liye...itna kar sakta hun ki 15 din ki miyad par kitaben issue kara laun...

डॉ .अनुराग said...

वैसे तो आखिर -ए -शब् के हमसफ़र का ज्ञानपीठ वालो ने हिंदी अनुवाद "निशांत के सहयात्री "नाम से पबिलिश कर दिया था ,साहित्य अकादमी द्वारा प्रुस्कृत उनका कहानी संग्रह पतझड़ की आवाज भी उपलब्ध है ,उनके एक आत्मकथात्मक उपन्यास कर -ए -जहाँ दराज है को जरूर ढूंढ रहा हूँ .पर उनकी कुछ रचनाये आप
जे -१४०
जलवायु विहार
सेक्टर -२५
नॉएडा २०१३०१ से ले सकते है.

swapandarshi said...

Raza, se pichhalee baar jab meree baat huyee thee to vo Phillipines me the. Aksar vo pak se bahar rahate hai. Aur apanee yaatraao me bhee rahate hai, jab rozee-rotee kee maar se fursat miltee hai.

I was thinking, ki ye jo tool hai kaee blogo par ki Hindi can be read in gujraatee, panjaabee etc. script.

Can some software similar to this, can convert urdu into hindi. Really Hindi and urdu do not need translation. Only the script reading is problem. The first tool that should be installed in the hindi-urdu blog should be the one, which gives possibilities to read the content in these two scripts.

Does any one know where is that tool?

Manish Kumar said...

हैदर साहिबा के नहीं पढ़ा पर अब आग का दरिया पढ़ने की इच्छा जाग्रत हुई है। मुझे भी आशापूर्णा जी का लेखन वैसे ही प्रभावित करता था .

महामंत्री - तस्लीम said...

हैदर जी के बारे में पढकर उनकी रचनाएं पढने की उत्‍कंठा हो रही है।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

Anonymous said...

बहुत बाड़िया... वाकई मे पड़कर आनंद आगय..

मे कुछ जान ना चाहता हूँ वो ये हे की.. आप कौनसी टाइपिंग टूल यूज़ करते हे…?

रीसेंट्ली मे यूज़र फ्रेंड्ली टूल केलिए डुंड रहा ता और मूज़े मिला “क्विलपॅड”…..आप भी इसीका इस्तीमाल करते हे काया…?

सुना हे की “क्विलपॅड” मे रिच टेक्स्ट एडिटर हे और वो 9 भाषा मे उपलाभया हे…! आप चाहो तो ट्राइ करलीजीएगा…

http://www.quillpad.in

इरशाद अली said...

आपको सिर्फ हल्के से पढ़कर ही समझा जा सकता है कि आपको लोग इतना मान क्यांे देते हैं। जो जगह आपने हिन्दी ब्लाॅगिंग मंे अपनी बनाई है वहां तक लोगांे को पहंुचने के लिये क्या कुछ नही कर गुजरना होगा।

Vidhu said...

कुर्तल एन हेदर पर कुछ सामग्री ,अखबारों की कटिंग मेरे पास सहेजी हुई है ...देखना पडेगा वो क्या क्या है .....आपने सटीक लिखा है उनके बारे मैं कुछ नै जान कारी भी ..आभार,

साहिल said...

तकरीबन १२ वर्ष पहले क़ुर्रतुल-एन-हैदर की रचना "अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो" राजकमल प्रकाशन के पेपर बैक संस्करण में उपलब्ध हुई थी। तब से लेकर आज तक मलाल है कि उनकी कोई दूसरी रचना उपलब्ध न हो सकी।
प्रकाशकों कि व्यावसायिक नियमावली गरचे हमारे इश्क में रूकावट है, इस बात का इंतज़ार है कि शायद कभी रचनावली जैसी श्रृंखला में उनका लिखा हुआ मिल सके।

Santhosh said...

अच्छी लेखनी हे..../ पड़कर बहुत खुशी हुई.../ आप कौनसी हिन्दी टाइपिंग टूल यूज़ करते हे..? मे रीसेंट्ली यूज़र फ्रेंड्ली इंडियन लॅंग्वेज टाइपिंग टूल केलिए सर्च कर रहा था तो मूज़े मिला.... " क्विलपॅड " / ये बहुत आसान हे और यूज़र फ्रेंड्ली भी हे / इसमे तो 9 भारतीया भाषा हे और रिच टेक्स्ट एडिटर भी हे / आप " क्विलपॅड " यूज़ करते हे

अमिताभ श्रीवास्तव said...

आप किसी लेखक को प्यार करते हैं तो उसके बारे में उमग कर बात करना चाहते हैं..........................................

"गर्दिशे रंगे चमन" "आग का दरिया"..shukra he ki padhne valo me main bhi shaamil hoo..shukra isliye ki aasaani se prapt ho gai thi, mashakkat nahi karni padhi...bahrhaal fir vahi baat ki
आप किसी लेखक को प्यार करते हैं तो उसके बारे में उमग कर बात करना चाहते हैं , उनकी लिखी पंक्तियाँ आप हँस कर एक प्यार भरी हैरानी से दूसरों के साथ बाँटना चाहते हैं । आप इश्क में होते हैं और सबको बता देना चाहते हैं । शब्दों की दुनिया के चमकीले संसार की रौशनी आपकी आत्मा में भरी होती है ।

भूतनाथ said...

अरे वाह...इस जगह तो बड़ी गहराई है..
यह जगह अब तक मेरी पकड़ में क्यूँ नहीं आई है.....
यहाँ दिखाई पड़ रही हैं बहुत सी मुकम्मल बातें.....
इन बातों में भी प्यार की रौशनाई है.....!!
हम तो हैं गाफिल कभी जल्दी से फिसला नहीं करते
आज प्रत्यक्षा की बात पर तबियत फिसल आई है.....!!
"अरे यार.......!!.....ये प्रत्यक्षा कौन है ??"
"क्यूँ तुझे क्या पड़ी है उससे....??"
"अबे पड़ी नहीं यार.....वो लिखती है बड़ा लाज़वाब.....!!"
"तो.....!!मैं क्या करूँ.....??.....लिखने दे....तेरे बाप का क्या जाता है.....??"
"यार तू आदमी है कि घनचक्कर.....मैं उसकी तारीफ़ कर रहा हूँ और तू है कि मुझे गालियाँ दे रहा है....!!"
"हाँ दे रहा हूँ.....पता है क्यूँ....??"
"मुझे कैसे और क्यूँ पता होने लगा.....??"
"वो लाज़वाब लिखती है....यही मेरी उससे जलन का का कारण है....और कभी-कभी तो ईतना अबूझ कि बाप-रे-बाप.....!!"
"तो इसमें जलने की क्या बात हो गयी.....??"
"मैं क्या करूँ यार.....मैं खुद ऐसा नहीं लिख पता....कैसे लिखूं....कैसे लिखूं....कैसे लिखूं मैं उसके जैसा....!!"
"अबे ओ गधे तू जैसा है वैसा लिख....तू अपने जैसा बन....किसी दुसरे के जैसा बनाने की कोशिश मत कर....!!
"वही कर रहा हूँ यार.....जा ना अब मैं इस प्रत्यक्षा को पढ़ना ही छोड़ दूंगा....!!"
"अबे ओ लल्लू.....!!तू यह समय उलटी बात ही क्यूँ सोचता है.....??"
"अभी मेरा दिमाग ठिकाने पर नहीं है....अभी-अभी मैंने प्रत्यक्षा को पढा है....!!"
"तो जा पहले अपने दिमाग को ठिकाने पर धर....फिर तुझसे बात करेंगे....!!"
..........दोस्तों....यह दो लोग थे.....मेरा मन और मेरा अंतर्मन.....!!

अरविन्द श्रीवास्तव said...

बधाई………शुभकामनाएं………। मधेपुरा से…

रवि कुमार, रावतभाटा said...

आपकी टिप्पणी का धन्यवाद...इसलिए की उसने मुझे इतनी सुलभ, दिमाग़ की संज़ीदा खुराक से महरूम होने से बचा लिया....

पहले भूख खत्म कर लूं..
शायद फिर कुछ कह पाऊं....

dhireshsaini said...

mujhe bhee unkee bahut see kahaniyan aur kai upnyas pasand hain.

दीपा पाठक said...

प्रत्यक्षा, बहुत सुंदर पोस्ट। कुर्तुल एन हैदर मेरी भी पसंदीदा लेखिका हैं। हालांकि मैंने उनकी आग का दरिया और अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो ये दो ही किताबें पढीं हैं। बहरहाल आपसे यह जान कर बहुत निराशा हुई कि श्रीराम सेंटर की किताबों की दुकान बंद हो गई। दिल्ली जाने पर वह एक जरूरी जगह होती थी जाने के लिए।

महामंत्री - तस्लीम said...

आग का दरिया तो जिसने भी पढी, वह उसका फैन हो गया।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

भूतनाथ said...

क्या कहूँ...??क्या लिखूं....??इस जगह आकर अक्सर बेज़बान हो जाता हूँ मैं.....!!

रंगनाथ सिंह said...

पहली बार जामिया मिल्लीया में होने का सीधा फायदा नजर आया। यहाँ पर कुर्तुलैन हैदर की किताबें उपलब्ध है। खासतौर पर वह किताब आग का दरिया का जिसे पढ़ने के लिए सभी बेचैन हैं, यहाँ उपलब्ध है। 2005 के बाद वो जब भी जामिया आई उन्हें देखने, सुनने का अवसर मिला। कुर्तुलैन हैदर की व्यक्तिगत छवियाँ मेरे मन में अच्छी नहीं है। एक कर्कशा स्त्री के रूप में ही उनके दर्शन हुए। यह अलग बात है कि बड़े-बड़े साहित्यिक दिग्गज लोगों को मैंने उन से दबते देखा।

अनूप भार्गव said...

अरे ! श्रीराम सैन्टर की पुस्तक वाली दुकान बन्द हो गई ? मेरी पसन्दीदा जगह थी जहां हर भारत यात्रा में जाना होता था । चुनी हुई हिन्दी पुस्तकों का अच्छा स्थान था ...

Anonymous said...

She wouldn't have cared a damn.....but few fans do :-))
please try your luck at:-

paridrashya prakashan
sorabji-santuk lane
opp. sterling house,
anmol building,
Marine Lines'
mumbai-2
Ph:022-22068040

Pradeep Jilwane said...

काफी लम्‍बे समय से 'ब्‍लाग' में कुछ नया नहीं आ रहा है, सम्‍भवतः आपकी व्‍यस्‍तता होगी. यूं ही आपके ब्‍लाग को पढ़ने की अब आदत सी बन गई है.
प्रदीप जिलवाने, खरगोन म.प्र.

प्रज्ञा पांडेय said...

apani priya qartul en haider saahiba ke baare aapka aalekh pyaas badhaanewaala hai .. unhen salaam aur aapko is prastuti keliye shukriya kahate hain .