1/28/2009

मेरी यात्रा शुरु होती है अब ..

मेरा मन ऐसा क्यों हुआ ? जैसे दरवाज़े पर लटका भारी ताला ? और तुम्हारी
संगत के दिन ? ऐसे थे क्या कि धूप अब खत्म हुई सदा के लिये । मेरे दिन क्या ऐसे ही लाचार बेचारे थे ? अपाहिज़ ,जो तुम्हारी संगत के बिना एक पल धूप और रौशनी की तरफ चल न पायें ? उन दिनों का रंग माना चटक था , फिज़ाओं में खुशबू ऐसे घुली थी जैसे ज़ुबान पर हमेशा प्लम वाईन का स्वाद | मन में कोई जंगल पत्ते खोलता था , फुनगियाँ आसमान छूती सी थीं ..सही है वो दिन वैसे ही थे । फिर उनकी परछाई इतनी लम्बी क्यों पड़ी कि आज तक के दिन ठंडे , अँधेरे , बिना किसी ताप के हुये । किसी अच्छी चीज़ का बुरा कसैला आफ्टरटेस्ट ?

न ! मैंने स्वाद चखा और अब बस । बस । फिर इसके आगे दिन कुछ और होंगे । जीवन बहुत बड़ा है और तुम्हारा दुख ? दुख है लेकिन ऐसा तीखा नहीं कि पहाड़ों पर छाया सर्द हो गई हो । तुम्हारे साथ के दिन वो चाभी नहीं जो इस ताले को खोल दें । वो चाभी उस अल्बम में भी नहीं जिसके फोटो पीले पड़ गये हैं , उस पीलेपन में उन दिनों की रौशनी और खुशी कैद है । न चाभी उन यादों में है जिन्हें याद कर मैं हंसता तो हूँ पर छाती हुमहुम कर जाती है । पर ये हँसी भी उस तार की तरह है जिसके खिंचने पर अजीब ऐंठी हुई सी खुशी तड़क जाती है । किसी दोपहर में फर्श पर लेटे छत ताकते किसी दोस्त से , किसी पुराने दोस्त से बतियाने जैसा सुख । ऐसा है तुम्हें याद करना , सिर्फ ऐसा । न उससे ज़्यादा न उससे कम ।

मेरे मन में तुमने खिड़की खोली थी , किसी और प्यारी दुनिया की झलक दिखाई थी , जब तक थी सुहानी थी । उसका सुहानापन, दिनों के किनारे पर जड़ी किरणें और सितारे थे । उसकी चमक अब भी है मेरे अंदर चमकती हुई लेकिन मैं सिर्फ तुम्हारे साथ के दिनों से खुद को सीमित कैसे कर लूँ ? दुनिया बड़ी है , बहुत बड़ी और जीवन नियामत है , एक बार मिली हुई नियामत । और हज़ार चीज़ें करनी हैं इस एक जनम में। तुमसे मोहब्बत की , टूट कर इश्क किया , मेरी आत्मा में नये रंग भरे । उन रंगों का वास्ता , अब मुझे कुछ और करना है । सामने हरा मैदान फैला है , सड़क कहीं दूर जाती है , कोई अपहचाना छोर कूल किनारा दिखता है । मैं यायावर होना चाहता हूँ , उस नीले आसमान की चमक मुझे खींचती है । मैं तुमसे प्यार करता हूँ, अब भी। इसलिये तुम्हारे बिना जीना चाहता हूँ । दुख तकलीफ में नहीं । खुशी से जीना चाहता हूँ । जैसे कोई बच्चा सुबह उठते ही किलकारी से नये भोर को बाँहें फैला कर गले लगाता है ..वैसे । तुम कहती थीं मेरे बिना तुम टूट जाओगे न । मेरा टूट जाना मेरे प्यार को साबित करता था ? तुम्हारे लिये ?

मैं हैरान हूँ । मैं जीता हूँ , साबुत हूँ । इसलिये कि एक समय मैंने प्यार किया , बेहद किया । इसलिये , अब तक जुड़ा हूँ । अब शायद तुमसे प्यार नहीं करता । शायद बहुत करता भी होऊँगा , अब भी । प्यार , तुमसे । या प्यार से । प्यार । शायद पागल हूँ कि सफेद कैनवस को रंगना चाहता हूँ उँगलियों से , रीम के रीम कागज़ भरना चाहता हूँ शब्दों से , कैनवस के जूते पहन किसी तंग गलियों में लोगों के चेहरे देखता , घरों की खिड़कियों से भीतर झाँकता , चलना चाहता हूँ , दुनिया के हर कोने का खाना चखना चाहता हूँ , धूप में बैठकर अपने पसंद के लोगों से जी भरकर बात करना चाहता हूँ , कितना कितना करना चाहता हूँ । मैं अपने मन का ताला अपनी चाभी से खोलना चाहता हूँ । मैं जीना चाहता हूँ , तुम्हारे बिना भी ..खुशी से उमगना चाहता हूँ । एक समय मैंने प्यार किया था इसलिये..इसलिये भी कि उस पार जाने के लिये दरवाज़ा मेरे ही अंदर है जो है अगर मैं देख सकूँ , अगर खोल सकूँ ..मेरी यात्रा शुरु होती है अब ..

(कार्तिये ब्रेसों की 1975 रोमानिया )

8 comments:

PN Subramanian said...

बड़ी सुंदर कहानी है मज़ा आ गया. आभार.

vikram7 said...

अच्छी कहानी बधाई

neera said...

अरे वाह!
बिना दर्द विरह गीत लिख डाला!
प्यार करने वालों पर कहर ढा डाला!

हिमांशु said...

सुन्दर प्रविष्टि . धन्यवाद.

अमिताभ श्रीवास्तव said...

meri yatra shuru hoti he ab........

kahani ka ant ho aour lage ki ek nai yatra par jaana he..kahani ka safal hona mana jaata he..bahut khoob kiya jo ek behtar kahani padne ko di..dhanyvad..

अनिल कान्त : said...

बहुत ही प्यारी कहानी है ....और प्यारे शब्द .....


अनिल कान्त

मेरा अपना जहान

सुशील कुमार छौक्कर said...

मीठे शब्द चारों तरफ अपनी मिठास बिखरते हुए।

Bahadur Patel said...

bahut badhiya likha aapane. badhai.