6/14/2008

साँप सेब और प्यार


उसके मेरे बीच प्यार शब्द कभी आया ही नहीं
हम शिकारियों के चौकन्ने पन से
पैंतरे बाँधते
कुशल फेंसर्स जैसे
चेहरे को ढके तलवार भाँजते
शब्दों को काटते
कभी गलती से भी
जीभ पर अगर
फिसल आता
कोई प्यार जैसा
या उसका पर्यायवाची शब्द
हम शर्मिन्दगी से
चेहरा छुपा लेते

हमने आपस के नये शब्द इजाद किये
सब ऐसे जो प्यार से कोसो दूर थे
जब हमारी उँगलियाँ तरसतीं
प्यार को
हमारा मन सुराखों के पार के आसमान को
ललक कर देखता
और उँगलियाँ शाँत हो जातीं

लेकिन इन सब के बीच
हमारी हज़ारों किस्से कहानियों के बीच
हम कई बार
बेवजह ठिठक जाते
जैसे कोई भूला शब्द
ज़ुबान पर आते आते फिसल जाता
हम बहुधा चौंक कर देखते एक पल को
एक दूसरे को
गो कि हमने कितने दिन साथ गुज़ारे
कितनी रात बतकहियाँ की
कितनी बारिश साथ भीगे
कितने मौसमों को एक खिड़की से
बदलते देखा
फिर भी हमने
ताउम्र कोशिश की
कि प्यार जैसा
कोई शब्द हमारे बीच
बिलकुल न आये

और हम इतने प्राण पण से जुटे थे
प्यार को भुला देने में
उसे बेवजह साबित कर देने में
कि मौसम कब खिड़की से बाहर गया
हम जान ही नहीं पाये
और जब हमारे बच्चे
हमारे पास आये
पूछा
तुम्हारे पास
हमारे लिये क्या है
हमने तब कहना चाहा
प्यार
हमारी जीभ इस शब्द के पहले अक्षर पर ही
लटपटाने लगी
हमारा दम फूलने लगा
गले की नसें भूली हुई कोशिश में टूटने लगीं
और हमारे सामने हमारे बच्चे हवा में धूँये की तरह
विलीन होने लगे
हम उजबकों की तरह उनको देखते रहे
देखते रहे क्योंकि हमारे बीच प्यार शब्द
कभी आया ही नहीं

उसने तब कहा
दोबारा शुरुआत करो
और हमने खुद को उस बगीचे में पाया
जहाँ मैं थी
वो था
सेब था
और साँप था


( स्केच मूल मिशेल मार्शंड पर कॉपी यहाँ मेरे द्वारा )

21 comments:

शायदा said...

प्रत्‍यक्षा, शायद इससे ज्‍़यादा खू़बसूरती से ये बात कभी कही नहीं जा सकती। बहुत-बहुत पसंद आया आपका अंदाज।
और हम इतने प्राण पण से जुटे थे
प्यार को भुला देने में
उसे बेवजह साबित कर देने में
कि मौसम कब खिड़की से बाहर गया
हम जान ही नहीं पाये ....

ऐसा बहुत सारे लोग करते हैं बिना इस बात का अंदाजा लगाए कि आखि़र में जवाब क्‍या होगा उनके पास। शायद हम सभी अपने खि़लाफ़ ऐसी साजि़शें रचते रहते हैं कभी न कभी। खै़र बधाई आपको, इतनी अच्‍छी और सच्‍ची बात लिखने के लिए।

Ghost Buster said...

बहुत ही सुंदर. बार बार पढ़ा, हर बार पहले से ज्यादा आनंद आया.

vijay gaur said...

जीभ पर अगर
फिसल आता
कोई प्यार जैसा
या उसका पर्यायवाची शब्द
हम शर्मिन्दगी से
चेहरा छुपा लेते
क्या इसे ऎसे कहा जा सकता है -
जीभ पर अगर
फिसल भी आता
कोई पर्यायवाची
हम शर्मिन्दगी से
चेहरा छुपा लेते.
अच्छी कविता है. पढवाने के लिये आभार.

Parul said...

kitno ka to sach hai ye..sketch bahut acchha hai aapkaa-

Lavanyam - Antarman said...

Beautiful sketch & even more beautiful verse Pratyaksha -
You say it with such bold & stark strokes.
Simply adore it -
rgds,
L

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

बहुत सुंदर वाकई लगता है कुछ रिश्ते खोल के रख दिए आपने.. बहुत बढ़िया

masijeevi said...

स्‍केच खूबसूरत है। बहुत अच्‍छा साध रही हैं आप पेंसिल को।

कविता पर कुछ कहने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ। प्रशंसा भी प्रेम की तरह का शब्‍द ही है तो कविता व पाठ के बीच आकर विचलन पैदा करता है अक्‍सर।

महेन said...

क्या यह सबकी साझी सच्चाई नहीं है? इससे ज़्यादा बेहतर शब्द इस बात को कहने के लिये हो ही नहीं सकते।
शुभम।

महेन said...

प्रत्यक्षा जी, मैनें आपके ब्लॉग का लिंक अपने ब्लॉग में जोड़ा है। यदि आपको आपत्ति हो तो क्रपया मुझे सूचित कर दें।

DR.ANURAG said...

मैं निशब्द हूँ....कई बार पढ़ चुका हूँ.....एक दो बार फ़िर पढने आयूँगा.....

Manish said...

अच्छा लगा पढ़ कर...

Sandeep Singh said...

"जहाँ मैं थी
वो था
सेब था
और साँप था"
....................सिर्फ भाषा ही नहीं सारगर्भित प्रतीकों से भी कितना गहरा रिश्ता है आपका वो उपरोक्त पंक्तियां बता देती हैं।...जब कुछ नहीं था तो उसे बताने के लिए आपने शब्दों की पूरी थाती उड़ेल दी....पर जब सब कुछ मिल गया तो उसे जताने के लिए आपने सांप और सेब का सहारा लिया।
वैसे तो इतनी संभावना छिपाये है ये कविता कि हर पाठक जाती अनुभूतियों के सहारे जाने क्या-क्या व्याख्या करे पर आपके लिए बस इतना ही कि...सचमुच यही अंत होना था इस खूबसूरत कविता का।
संदीप

sushant jha said...

अद््भुत...दिव््य...मेरे साथ आजकल कुछ कुछ बिल््कुल ऐसा ही हो रहा है..बधाई स््वीकार करें..।

jfmarcelo said...

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सुन्दर, बहुत सुन्दर ....

Pratyaksha said...

स्केच और लिखाई में जितना भी रस मिला आप सबों को ..और उसको मेरे साथ फिर बाँटने का ..आभार !

सुभाष नीरव said...

इतनी खूबसूरत कविता मन पर क्यों न असर करेगी? बहुत खूब प्रत्यक्षा जी ! अपनी भाषा, बिम्ब और प्रतीक में भी बहुत सुन्दर कविता है यह्। बधाई !

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