12/18/2007

ज़िंदगी कितनी हसीन है !

पहले दिन मुझसे टकराई थीं तो अजीब कुड़बुड़ाहट हुई थी । देख कर चलना चाहिये । अपने गिरे लिफाफे समेटते बिना उनपर तव्वोज्ज्ह दिये फुर्ती से आगे हो लिया था । स्पेनसर में मेरे ठीक आगे । वही स्टील ग्रे बाल , आज खुले थे कँधों तक । वॉलेट से पैसे निकालने जोडने में खूब वक्त लगाया । मैं एक पाँव दूसरे पाँव बेचैन कदमताल करता रहा । इनकी वजह से आज पाँच मिनट , पूरे पाँच मिनट खराब हुये ।

हफ्ते भर बाद लांजरी शॉप में मुठभेढ़ हुई । तमाम रंगीन लेसी झालरदार लांजरीज़ को एक हाथ परे हठाकर स्पोर्ट्स ब्रा उठाया । मणिपुर की कार्मेन अपने सीधे बालों को झटकारती पूरा डब्बा काउनटर पर उलट दे इसके पहले उन्होंने सधे हाथों से एक सफेद स्पीडो उठाया और पेमेंट काउंटर पर चली गईं । मैं कुछ देर कारमेन से बतकही करता रहा , उसके सीधे भूरे बालों की और चिकने पीले गालों के कंट्रास्ट में मसकरा वाली पलकों की तरीफ करता रहा । कारमेन ब्लश करती रही जबकि ये हमारा पुराना खेल था ।

मादाम के लिये सेक्सी ब्लैक निकालूँ ? उसने मुझे छेड़ा । कारमेन को पता था मादाम ब्लैक नहीं पहनती । पहले मादाम इस शॉप में अकेले आती फिर मैं भी साथ साथ । सोचता कभी अकेला आ जाऊँ तो ? निकाल बाहर करेगी ये सब छोकरियाँ मुझे दुकान से या फिर हाय आयम निहारिका कहते दुकान मालकिन छ फूटी लचके तने सी लहरा कर पीछे के प्लश कमरे से बाहर आ जायेंगी । कैन आई बी ऑफ अनी अस्सिटैंस ? किसी एक जन्मदिन पर अपने को गिफ्ट देने का यही शानदार तरीका सूझा था । के के लिये दर्ज़नों सोने के कपड़े , अक्सेसरीज़ , अल्लम गल्लम । फिर उसके लिये ऐसी शॉपिंग मैं मज़े से गाहे बगाहे किया करता ।

पेमेंट करके नीचे सबज़ीरो में घुसे तो फिर निगाहें चार हुईं । थ्री स्कूप कोन पकड़े बच्चों की तरह आईसक्रीम खा रहीं थी कम , गिरा रहीं थीं ज़्यादा । मुझसे नज़र मिलते ही झेंप गईं । फिर उस दिन जॉगर्स पार्क में पाँव मुचक गया । बस यकबयक ढ़हराकर गिर ही पड़ा । पाँच बजे की अँधियारी अल्लसुबह में जो दो लोग दौड़ते हुये आये उनमें ये भी थीं । एड़ी के पास कोई टेंडन खिंचा था । क्रेप बैडैज और पंद्रह दिन बिस्तर आराम । चौथे दिन के दफ्तर चली गई । दिन बहुत बुरा बीता । पाँचवे दिन वो आईं । सीधे सफेद काले ब्लंट बाल , ढीला स्टील ग्रे घुटनो तक का कार्डिगन और नीले स्लैक्स । कँधों पर कत्थई मफलर । अच्छा तो ये था आज का के का प्रॉमिस्ड सरपराईज़ । दो पीले सूरजमुखी के फूल ले कर आई थीं । आज तुम्हें कुछ पढ़ कर सुनाऊँ । फिर एक पतली किताब सीमस हीनी की कवितायें

There are the mud-flowers of dialect /And the immortelles of perfect pitch/ And that moment when the bird sings very close/ To the music of what happens.

फिर

As a child, they could not keep me from wells /And old pumps with buckets and windlasses./ I loved the dark drop, /the trapped sky, the smells Of waterweed, fungus and dank moss.

और

And here is love /Like a tinsmith’s scoop/Sunk past its gleam /In the meal bin


उनकी आवाज़ में एक संगीतमय गूँज थी , ज़रा सी रेशेदार जैस्रे खूब सिगरेट पीने के बाद कुछ खराश हुई हो । फिर एकदम से उठकर चली गईं बिना ये कहे कि फिर आयेंगी या नहीं । छठा दिन बीता फिर सातवाँ । आठवें दिन थरमस से सूप ढाल कर पीने ही वाला था कि घँटी बजी । दरवाज़ा खोलते ही सर्द हवा के झोंके के साथ दाखिल हुई । ठंड से चेहरा ज़रा लाल था । बिना दुआ सलाम के कुर्सी खींच कर बैठ गईं । झोले से किताब निकाला । आज कवितायें नहीं है ऐसा आश्वासन दिया ।

कुछ संगीत रखते हो ? मेरे स्टीरियो डेक की तरफ इशारा करने पर चुपचाप उठीं , शुबर्ट की ऑव मारिया लगाई और अपनी किताब में मगन हो गईं । अरे ! कैसी अजीब औरत है , मैं हर्ट सोचता रहा । कुछ लेंगी ? मैंने अन चाहे भी औपचारिकता निभाई । नहीं ठीक है । फिर डूब गईं किताब में । मैंने ज़रा सा झाँक कर देखने की कोशिश की फिर बेमन अन्यमनस्क होता रहा फिर कुछ नाराज़गी , ठीक है मुझे उस दिन मदद किया , तो क्या । यहाँ इस तरह आने की ज़रूरत नहीं । आई डोंट नीड ऐनीवन । लगभग दो घँटे हमने शुबर्ट और फिर हाईडेन को चुपचाप सुना , बिना एक शब्द बोले । फिर जैसे धड़ाके से आईं वैसे ही गईं ।

रात मैंने के को शिकायत की , अजीब पागल औरत है , आती है चली जाती है । मैं बोलता रहा , के मुस्कुराती रही । मेरा पैर क्रमश: ठीक होता गया । एड़ी में थोड़ा बहुत दर्द गाहे बगाहे बना रहता । बावज़ूद उसके कुछ दिन खूब भागदौड़ के बीते । दस दिन बाहर रहा । मैं लौटा तब के निकल गई हफ्ते भर के लिये । मैं अनमना घर में अकेला डोलता रहा । पूरा शनिवार अपने बेंत के झूले को वार्निश करता रहा । इतवार रेड ज़िनफंडेल की एक बोतल और ऑर्किड का एक छोटा गुच्छा लिये मैं धमक गया था । ज़रा अचकचाई थीं फिर नारंगी दरी पर बिखरे गद्दों के ढेर की ओर इशारा किया था ।
वाईन ग्लास ले आई थीं । इस दिसम्बर मैं सड़सठ साल की हो जाऊँगी । उन्होंने ग्लास मेरी तरफ बढ़ाते हुये कहा । जॉगिंग कब शुरु करोगे ?
हम दो घँटे बतियाते रहे पर सीमस और शुबर्ट की बात नहीं की । इसबार हम सिनेमा की बात करते रहे । खूब हँसे । शायद वाईन का भी कुछ खुमार था ।

ज़िंदगी कितनी हसीन है , नहीं ? उनका चेहरा , थोड़े से झुर्रियों भरा चेहरा एक खूबसूरती से दमक रहा था । वाकई , वाकई !

(के ने मुझे कभी बताया था कुछ दिनों पहले । अकेली रहती हैं । पति नहीं रहे । बेटे के पास यूएस गईं । पहुँची ही थीं कि खबर मिली किसी हाईवे ऐक्सीडेंट का शिकार हुआ । फिर दोस्त अहबाब पर निपट अजाना शहर और दुख , तोड़ देने वाला व्याकुल दुख जिसका ओरछोर कूल किनारा नहीं । लौट आईं । अकेली रहती हैं बिलकुल अकेली । कितनी बहादुर ! कितनी हिम्मत , कैसी दिलेरी । दिस इज़ लाईफ , ब्लडी अनजस्ट बट ब्यूटिफुल ! दिस इज़ लाईफ )

5 comments:

पुनीत ओमर said...

शब्द विन्यास कमाल का.
वैसे कभी वाकई में अकेले जाकर देखें और बताये की क्या क्या हुआ फ़िर वहां पर...

Mired Mirage said...

मंत्रमुग्ध सी पढ़ती रही । कहानी कब खत्म हो गई पता ही नहीं चला ।
घुघूती बासूती

अजित वडनेरकर said...

जिंदगी सिर्फ और सिर्फ हसीन है और कुछ नही...कुछ अच्छा करने का , सोचने का , दिखाने का , दिखने का माद्दा हो। कभी बुद्ध बनने की , कभी बुद्धू बनने की बात हो।
सोच लें कि अब कुछ नहीं , तो सब कुछ ध्यान आता है। सब कुछ में आनंद है और इसके उलट में भी।

अनूप शुक्ल said...

क्या जिंदगी है!

Sanjeet Tripathi said...

परिकथा के जुलाई-अगस्त अंक में आपकी कहानी "कैसे कैसे दिन" अभी पढ़ी मैने।
बढ़िया, शब्द दर शब्द बुना हुआ, मन की एक तड़कन के बाद भी मन को जोड़े रखने के लिए।

आपके शब्द कुछ ढूंढते हुए से प्रतीत होते है, ऐसा क्यों, कथ्य मानों तलाश में हो अपनी या अपने मन की, शायद यह मेरा भ्रम हो। खैर………बाकी फ़िर कभी।
शुभकामनाएं