6/24/2007

समानांतर दुनिया

किसी पुराने गाने को सुनते ऐसा नहीं लगता कि कहीं किसी तार पर किसी नट की कला कुशलता से पाँव जमा जमा , जरा डगमगाते हिचकिचाते , हाथों को फैला ,संतुलन असंतुलन के बीच , पंछी की तरह डैने फैला आप चल पडते हैं चाहे अनचाहे उस समय स्थान में , जो अब सिर्फ स्मृति भर में ही एक्ज़िस्ट करता है , या क्या पता कितने मल्टीपल युनिवर्स हों , कैसी समांनातर दुनिया जहाँ जीया हुआ हर पल बार बार दोहरा रहा हो अपने आप को ।

कोई साइंस फिक्शन पढी थी , ऐसे ही किसी सुदूर समय में जहाँ ऐसी ही हर घटना अपने हर पल के ढेरों निर्णायक क्षणों के भूलभुलैया में अलग अलग रास्तों पर अनवरत चलती रहती है। आप लौट कर उस समय में पीछे जाते हैं , देखते हैं कि अगर आपने उस पल का कोई और निर्णय लिया होता तो जीवन किस आसान या दुर्गम रास्तों की चढाई आपको चढाता ।

खैर , गानों की बात कर रहे थे । मेंहदी हसन की पत्ता पत्ता बूटा बूटा या फिर आगे बढे न किस्साये इश्के बुतां से हम , सुन कर मन पता नहीं कितना पीछे भाग जाता है , जाडों की कुहासे वाली सर्द सुबह , छुट्टियाँ , शुरुआत वाली जब मुट्ठी भरी हो , खज़ाना भारी हो , आधी नींद में आवाज़ तिरती हुई आये बहुत दूर से , बाहोश बेहोश से परे किसी तीसरी दुनिया में चेतना डूबती उतराती हो । अब भी मेंहदी हसन सुनते हुये चेतना उसी तीसरी दुनिया की स्मृति खींच बटोर लाती है , कोई भूला भटका अवशेष , काई के अंदर छिपी हरियाली सा आभास मात्र । बेगम अख्तर की , हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब , किसी झमझम बारिश में खिडकी के सिल पर सर टिका शीशे के अंदर के महफूज़पने से बरसात के दिल तोड देने जैसी कैसी तो टीस से भरा अवसाद का कसाईन स्वाद अब भी जीभ पर , नोक पर छलछला देता है । स्कूल कॉलेज के ज़माने में दिनकट्टन करते बीटल्स के ऐईट डेज़ अ वीक , या वाईल माई गिटर जेंटली वीप्स , नीम दोपहरी की अलमस्त फक्कडपने की याद दिलाता है ।

सिर्फ गाने ही क्यों , जार्जिया ओ कीफ के फूल देखकर अपना पहला बनाया कैनवस ,तेल और रंगों की महक ,सब की याद ऐसे झूम के मन में लहर जाती है । कोई देखे तो कहे क्यों मुस्कुरा रही हैं । करेले के कडवे भुजिये को देखकर बचपन की उस सख्ती की याद आती है जिसकी वजह से दवाई की तरह पानी के सहारे से उसे घोंटा जाता था । और कडवेपन की याद से ... बडे टैबलेट्स , बीमारी में दस दफे पानी से निगलने की कोशिश करना और नौ दफे उगल कर कहीं ज़मीन में गिरा देना , रोते रोते हिचकियाँ बँध जाना और दसवें दफे बीमारी के बावज़ूद डाँट सुनकर आँसू , थूक से चेहरा सना , अंतत टैबलेट निगलना । अब बडे बडे टैबलेट्स देखकर बचपन का ज़मीन पे गिरा ,उगला टैबलेट याद आता है ।

तो ऐसी कितनी छोटी बडी स्मृतियाँ हमारे अंदर कुंडली मारे बैठे रहती हैं । किस महक , किस रंग , किस अवाज़ की लहक पर कुछ भरभरा कर भसकने लगता है , किस स्वाद की बिसराई हुई स्मृति ,लहसुन हींग से छौंका हुआ दाल , किसी आँवले का कसा तीखा तेज़ आचार , कब कहाँ ले जाये , शायद हम इसी इंतज़ार में रहते हैं । मन से भले ही न माने लेकिन सेरीब्रम सेरीब्रेल्लम के किस कोने में ग्रे सेल्स के अंदर घात लगाये , चुपके बैठे ये हैं कौन आखिर जिसके हम ऐसे गुलाम हैं ? आप भले कह लें न , हम इतने भावुक नहीं लेकिन पडने दीजिये कोई मौका , सुनने दीजिये कोई आवाज़ की खनक , आने दीजिये कोई दाल भात चोखे की खुश्बू , फिर देखियेगा कौन दबोच लेता है आपको , किस पुराने समय के तार पर आप हो जाते हैं एक कुशल नट , कौन सा बीता हुआ समय , कैसा देज़ावू , क्या क्या समय । सब चल रहा है आपके ही अंदर ,कितनी तो सामानांतर दुनिया ।

8 comments:

काकेश said...

गुजरे समय को याद करता आप का एकालाप खूबसूरत है.दुनिया के समानांतर दुनिया या फिर मन के भीतर मन.अनेक तहों में लिपटा सीला सा कोई ख्वाब या फिर जड़ों को तलाशने की कोई कोशिश ..कुछ तो है जो सजग है सचेत भी..पर जैसा भी है अच्छा है.

अनामदास said...

अभी आभासी दुनिया में अतीत के गुत्थियाँ ही थोड़ी और उलझाई जाएँगी, सुलझने से तो रहीं. सही राग छेड़ा है आपने, झिंझोटी है शायद.

समानांतर ही नहीं बल्कि परतदार भी है सब कुछ. कई कई परते हैं, उलझती, गुँथती, जानी-अनजानी, भूली हुई...सपने मैं कई बार ऐसी चीज़ें या ऐसे लोग आते हैं जिनके होने का ट्रेस आपकी रोज़मर्रा ज़िंदगी में कहीं नहीं बचा था.
और लिखिए, इंतज़ार है....

masijeevi said...

अब आपने ये सब इसलिए तो लिखा होगा न‍हीं कि कोई कहे कि ठीक लिखा हैं, क्‍योंकि अब ये ठीक है कि गलत ये तो वहीं बताए जिसने देखा हो आपको कड़वी टेबलेट्स निगलते-
यानि लिखा इसलिए कि सभी अपनी अपनी जिंदगी की कड़वी टेबलेट्स की मीठी स्‍मृति में खो जाएं, बस सिर्फ इतना कि ये और याद करें कि जब किसी बड़े को इस तरह अपने अतीत की याद करते देखते थे - तो कैसा मुँह बनता था- ऐसे ही कोई कर रहा होगा हमारे भी आस पास...
:)

Divine India said...

फ्रायड कहता है कि अवचेतन मन का संसार सबसे विस्तृत और वृहत होता है…और हमारा पूरा जीवन इसी के द्वारा संचालित होता है… इसकारण आज बहुत दिनों बाद आपकी लेखनी बहुत पसंद आई…।
Simply Gr8.

Udan Tashtari said...

सत्य है. यह समानन्तर दुनिया की उथल पुथल तो सबके साथ है मगर उसे इतनी सुन्दरता से कागज पर आपने उतारा है बिल्कुल जीवंत-बधाई!!

Pramod Singh said...

ओह, आप इतना टेढ़ा-टेढ़ा क्‍यों लिखती हैं? प्‍लीज़, निर्मल वर्माओं के असर से बाहर आकर सीधा लिखना सीखिए. हद है! एंड वॉट इज़ दिस गिटर दैट जेंटली वीप्‍स? क्‍लैरिफाई. वॉट इफ़ सर मैकाटर्नी सीज़ इट एंड इट गेट्स ऑन हिज़ नर्व्‍स? यू थॉट ऑफ़ दैट? और छौंका हुआ दाल होता है, या छौंकी हुई? क्‍या आप बिहार से हैं?

Pratyaksha said...

काकेश और अनामदास जी , परतदार कोई भी चीज़ मन को खींचती ही है , सीधे सरल का लिनीयर आकर्षण कितनी देर टिकेगा ।

मसिजीवी ऐसी कडवी सच्चाई , हम तो भूले हुये थे :-)

डिवाईन इंडिया और समीर जी , शुक्रिया

प्रमोदजी , अब आपने इतनी गल्तियाँ निकाल दी ,सर जी , इन्हें अब रहने ही देना पडेगा वरना आपकी टिप्पणी सुपरफ्लुअस नहीं हो जायेगी ?

metamorphosis said...
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