8/22/2005

बरसात की दीवानगी

खिडकी के शीशे से
चेहरा सटाये
मैं देखती हूँ
एक एक करके
बून्दों का टपकना,
पत्तों से होकर
शाखों पर
और फिर नीचे
हरी घास में मिल जाना

मेरे अंदर भी
निष्ठुर अकेलापन
बून्द बून्द ट्पकता है
शिराओं से होकर
आँखों से बाहर
निकल जाता है

शीशे पर बून्दे
बजाती हैं मद्धम संगीत
बून्दों की पायल पहने
हवा नाचती है
अलमस्त , बेपरवाह
मेरे अंदर की उदासी भी
सिमट जाती है
मन के किसी वीरान कोने में

न जाने कब
पैर थिरकते हैं
गीली नर्म घास पर
बून्दें सज जाती हैं
बालों पर
किसी अनाम मस्ती
के आलम में, मैं
हवाले कर देती हूँ
अपने आप को
बरसात की दीवानगी के नाम

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

बड़ी बढ़िया कविता है। मजा आ रहा है भीगने का घर बैठे!

sarika saxena said...

ये भीगी हुई सी नज़्म बहुत अच्छी लगी।