प्रत्यक्षा
9/20/2011
रुकी हुई रेल
›
हिलते पर्दे से छनकर रौशनी आती है , शीशे के बोल में अरालिया की एक लतर , किताबों की टांड में एक ग्रॉसमन , रिल्के की ना समझी कोई कविता की एक अ...
40 comments:
8/03/2011
व्हेन यू ड्रीम अ ड्रीम
›
कहते हैं दिन का देखा सपना सच होता है । जब से सुना यही दिनमान रहा । इतना देखा और जो देखा उसका इन्दराज़ दर्ज करते रहे । नीले सपने पीले सपने , ...
9 comments:
7/18/2011
दोस्त
›
धीमे कोई गीत , ज़रा एक सुर, सूनी गलियों में तिरता बुदबुदाता है , दोस्त ? नशे में बहकती किसी लय पर थिरकती एक टूटी सी हिचकी, कोई आधे से साँस क...
14 comments:
‹
›
Home
View web version